कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यनाम ।
अथ चौका आरती माहात्म्य प्रारम्भः ।
सत्यनाम स्वकृत विभू, अदली आदि अचिन्त । अजर पुरुष सुनीन्द्र प्रभू, मायापार अनन्त ॥ १ ॥ करुणामय कवीर कही, ज्ञानी पुरुष सुजान । योगजीत सतगुरु सही, मेटे काल गुमान ॥ २ ॥ सुरति शब्दको योग जो, परगट कीन जहान । योग सैंतायन नामते, कहते ताहि सुजान ॥ ३ ॥ जाकर शिष धर्मदासजू, पूरण सुकृत रूप । पायी दया कवीरकी, भये सो आप अनूप ॥ ४ ॥ सत सुकृत प्रतापते, भये जगत आदर्श । नाम देह भव काटई, मिटे काल उत्कर्श ॥ ५ ॥ कह कवीर धर्मदाससे, बचन मोर समरथ्य । ताहि गहे सो वंश है, चढे मुक्ति के रथ्य ॥ ६ ॥ वंश व्यालिस जगतमें, माने बचन हमार । आप तरे जग तारई, देवे शब्द अहार ॥ ७ ॥ शब्द अहार जो छाडई, अखज काल ढिंग जाय । गुरु सीढि ते ऊतरे, काल निरञ्जन खाय ॥ ८ ॥ दुखित जीव जग जानिके, प्रगट भये गुरु देव । चौका विधि प्रगट करी, तत्त्व लखाये भेव ॥ ९ ॥ सत्यलोकको याँन है, आत्म ज्ञानको मूल । काल जालते काढिके, हरे सकल भव झूल ॥ १० ॥ ता महिमा निज मुख कही, सत्य गुरु सत्य कवीर । पूछी सो धर्मदासने, जीव लगावन तीर ॥ ११ ॥
इति मंगला चरण ।
अथ चौका आरती-
माहात्म्य (अनुरागसागरसे) धर्मदास बचन ॥
धर्मदाम पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन सुभागा ॥ हे प्रभु नहीं रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण बरनि न जाई ॥ १ ॥ महिमा अमित अहै तुव स्वामी । केहि विधि बरनों अन्तर्यामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहि
१ विमान.