कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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व्यापारी हैं अथवा सीधे साधे संत। व्यापारी, पहले तो आपही इसके महान आशयको नहीं समझते और जो कोई थोड़ा बहुत ग्रन्थ पोथियोंसे समझता भी है, तो वह अपने रोजगारमें विघ्न पड़नेके डरसे सबक सतियोंको बतलाना नहीं चाहता और जो सीधे हैं वे कुल्हेडीकी रस्ती घसीटते चले जा रहे हैं, उनको जब स्वतःही खबर नहीं है, तब दूसरोंको क्या बतलायेंगे। और मेरे जैसे लोग जो खुल्लमखुल्ला भेद बतानेको तय्यार हैं। अधिकारी जित्तासुओंके अभावसे इस साखीका स्मरण कर करके निराशा अनुभव करते हैं—
परबत परबत मैं फिरा, नैन गवाँया रोय । सो बूटी पाऊँ नहीं, जोरे सजीवन होय ॥
तथापि यदि संत गुरुकी दयादृष्टि हुई तो सुझ अर्कचनसे जितना करते बन रहा है सेवा करता जा रहा हूँ और जो बनेगा करता जाऊँगा, इसका उपक्रम आरम्भ हो चुका है और कबीरधर्मदर्शन ग्रन्थमाला निकालना आरम्भ हो गया है। प्रथम भाग माहात्म्य दर्शन छप चुका है।
श्रीवैकटेश्वर प्रेसके मालिक रायबहादुर सेठ रङ्गनाथजी तथा लघुभ्राता परमसज्जन बुद्धिमान् धर्मपरायण श्री बाबू श्रीनिवासजीका कबीर मात्रको कृतज्ञ होकर, पंथी सदगुरुसे प्रार्थना करना चाहिये कि, वे धन जन और धर्मसे पूर्ण रहकर सत्यमार्गकी उन्नतिमें सहायता देते रहें ॥
सम्बत् १९५८ वि. से ही साकेतवासी सेठ खेमराजजीने मेरे दिये हुए ग्रन्थोंका, प्रकाशन करके सत्यधर्मका कितना उपकार किया है, वह किसीसे छिपा नहीं है।
इसका विषय विशेष प्रस्तावनामें लिखना है, इस लिये यहाँही समाप्त करता हूँ।
श्रीवैकटेश्वरप्रेस, बम्बई ता. ७-८-३१
भवदीय—
आप सबोंका पूर्व परिचित रसीपुर शिवहर वाले-स्वामी - श्रीयुगलानन्दविहारी. (कबीरआश्रम पो०, खरसिया.) (जि० बिलासपुर (सी० पी०)