कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
साधु संतकी अधिक महिमा, रहनि कुण्ड नहाइये ।
काम कोध विकार परिहरि, बहुरि न भवजल आइये ॥ १४ ॥
येही साधु मुक्ति फल बासा । सो सब बचन कहौ परकासा ॥ नाम गहै राखे सत करमा । गहि सुकृत छोडे सब भरमा ॥ १ ॥ मद अरु मांम सदाको त्यागे । जीवदया सब विधि अनुरागे ॥ पाछल चूकको एक उपाऊ । साधु सेवा अरु सवै सतभाऊ ॥ २ ॥ करे आरती मन बिच करमा । पर घर तजे जान निज भरमा ॥ गिरही माहिं जो रहैं उदासा । निश्चय सत्तलोकमें बासा ॥ ३ ॥ नाम पाइ जो अवज्ञा करई । भाव विहीन जग अनुसरई ॥ जो कोइ चूके साधुन सेवा । ताकर फल भाखों कछु भेवा ॥ ४ ॥ जाई सो लोक नाम परतापा । तजे देह जिमि कांचरि साँपा ॥ देख जाई हंसनक पांती । ता मध्ये अस बैठ अजाती ॥ ५ ॥ जाते चूक परे सिवकाई । ताते शोभा हीन लजाई ॥ जो कोई याकी करे उछेदा । ताते मैं समझाऊं भेदा ॥ ६ ॥ यही तरे सो कौन विशेषा । गुरुको अचरज यौ बड़ देखा ॥ गुरु नहीं कोई थहि भवसागर । सतगुरु आप अजरमनि आगर ॥ ७ ॥
ऐसी महिमा प्रकट है, जैसे सिंधुका नीर ।
सरिता सब कडिहार भये, सतगुरु सिंधु कवीर ॥ १५ ॥
जपत आहिं जो नाम हमारा । तातें नाम धरा कडिहारा ॥ ले कडिहार जिवनका भारा । तेहि न सूझ किमि उतरे पारा ॥ १ ॥ सरिता माँहि बारि जो होई । जीव जन्तु सुख पावे सोई ॥ सरिता लहै पुण्य परमारथ । सत कडिहारी परस्वारथ ॥ २ ॥ अथव नीर अथाह न होई । सहज योग भाखौ पुनि सोई ॥ नदीमें सोह सदा जो वारी । ऐसी उत्पति आहि हमारी ॥ ३ ॥ प्यासा जाय नदीके पासा । बिन पानी सो जाय पियासा ॥ प्यासा पानी नदी न पावे ।