कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ता कहँ कैसी करह जमराजा । देह धरै तो गुरु कहँ लाजा ॥ बिना लगन मगन भयौ जानी । ऐसो अहै शिष्य सहिदानी ॥ ४ ॥ पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावे सोई ॥ अथवा जो गुरु अंतर राखै । गुरु में धोख संतमें भाखै ॥५॥ लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥ जस बाना तस होवै करनी । ता गुरुके सम और न बरनी ॥ ६ ॥ सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥ पांचमें करे पच्चीसों नारी । जे बस किये योग अधिकारी ॥ ७ ॥
जो ऐसी बनि आवै, औरो बनिहै सार ।
तातैं ग्रेही थापिया, कडिहारी संसार ॥ १३ ॥
मरत तजो जस कांचरि साँपा । तातैं सबको मेटब दापा ॥ करो शिष्य जो यहि विधि कोई । पुरइनि पान रहै जनु सोई ॥ ११ ॥
गुरुवाके लक्षण ।
आप स्वार्थी भेष बनावै । मनकी दशा ताहि चित लावै ॥ तृष्णा युक्त करै गुरुवाई । जमसों बाँचे कौन उपाई ॥२॥ निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥ आप अबूझ औरन समझावै । साखि रमैनी झगरो लावै ॥ ३ ॥ सेवा साधु नहीं बनि आवे । तृष्णा कारण भेष बनावे ॥ अहै न सीहँ स्वान सियारा । परचै बिना कैसे कडिहारा ॥ ४ ॥ पर नारी औ मन्थन कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥
गुरुवाको सिखावन ।
मारह मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥५॥ गिरही माहिं मुक्ति कर भेवा । गुरुकी भक्ति साधुकी सेवा ॥ जोपे सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका का अधिकारा ॥ ६ ॥ साँचा हो गुरु भगती साधे । साधु संतसो प्रीति अराधे ॥ साधु संत संग रहनी आवे । विन रहनी नहिं जीव तरावे ॥ ७ ॥