भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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६-मांसं मदिरां, व्यभिचारं, चौरी, हिंसां, चूर्तं, (जुवा) मिथ्यां और पिशुनता (चुगली) इन अष्ट महा दोषोंको सर्वथा त्यागना चाहिये.

७-परीक्षापूर्वक सत्यकी धारणा और असत्यके परित्याग करनेमें कदापि विलम्ब न करना चाहिये.

८-विनयभावसे अत्यन्त प्रेम पूर्वक मनुष्यमात्रको सत्य-मार्गमें चलनेका सदा उपदेश देना चाहिये.

९-नित्यप्रति नियमपूर्वक स्वाध्याय द्वारा विद्या वृद्धि करनेमें कदापि आलस्य न करना चाहिये.

१०-तिलक कंठी सहित अपना वेष सभ्य और पवित्र रखना चाहिये.

११-स्वधर्म तथा अपनी आत्माके विपरीत कभी कोई काम न करना चाहिये.

तीसरे खण्डके विषयमें सूचना-

इस ग्रन्थके प्रथम खण्डमें संज्ञासुमिरनका विषय आया है, उसके दो विभाग हुए हैं-१ सर्व साधारण कवीर पन्थियोंका संज्ञासुमिरण, २ बुरहानपुरी संज्ञासुमिरण ॥

दूसरे खण्डमें-जहांतक मिला है स्तोत्रोंका संग्रह है ।

तीसरे खण्डमें-चौका आरती विधान चार विभागमें दिया है । १ विभागमें छत्तीस गढी चौका आरती का विधान, २ में सर्वदेशी चौकाविधान रोसडा कवीर मन्दिरके पाठसे दिया है, ३ रे चौकामें गानेके विशेष राग रागनियोंसे संयुक्त हैं, ४ में आरती चौका माहात्म्य है ॥

इस खण्डमें दूसरा विभाग छपनेसे रह गया है उसे पाठक गण पृष्ठ ४२२ से दूसरे खण्डका तीसरा विभाग आरंभ समझलें ।

इसके आगे शब्दकुंजी मूल रमेनीसे चौथा खण्ड प्रारंभ.

भवदीय-श्री युगलानन्द बिहारी.