भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी-

सखी संग आई, तिनको रँगमें बोरी॥ घूँघट खोलि खेलु सन्मुख होय, अपने पिय सँग गोरी । कहैं कबीर फोरि नहिं पड़हो, ऐसो दौंव बँहोरी ॥ १० ॥

काहूको मारैगी, हग अन्न नयन सँवार ॥८०॥ भौंह कमान तानि तनकहु जो, तिरछी देत निहार । विरहबान लागत जहरीले, होत करेजे पार ॥ चन्द्रवंदनि मुर्गलोचनि माया, करि सोरह शृङ्गार । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तीनों देव बनाये जाँर ॥ नरसे नारी कियो नारदको, आप बनी भर्तार । साठ पुत्र तिनके उपजाये, करिके कपट अपार ॥ विश्वामित्र पराशर आदिक, वायू करत अहार । शृंगी ऋषिसे और अनेकन, तपसी छले हजार् ॥ जीव उबारन हम जग आये, हमरेहु लागी लाँर । कहैं कबीर सुनौ भाई साधो, यासे रहो हुशियाँर ॥ ११ ॥

होरीके खिलारीने, कैसी ? मजा करडारी ॥८०॥ भारी भर-मकी सारी फारी, वरवश पकर हमारी । त्रिगुण तनी अँगियाकी तोरी, शब्द कुम्कुमा मारी ॥ ज्ञान गुलाल पन्यो नयननमें, मिटिगइ सब अँधियारी । एकहि भाव विलैंस करत हैं, कौन पुरुषको नारी ? ॥ नित्यानित्य देत है गारी, लोकलाज सब टारी । मोहकी वेसँरि कुमतिके कंगना, मानकी वेदी उतारी ॥ पूरण लखि मन भुलि गयो है, ऐसी न देखी धर्मारी । साहिब कबीर परख रँग रँगिया, परखिके कीनी न्यारी ॥ १२ ॥

सतगुरु प्रियतम पाऊं, हरषि हिय होरी खेलाऊँ ॥ ८० ॥ प्रवृति पन्थमें जात सखिनको, दै २ सयन बुलाऊँ । हिलमिल धाय जाय कृपालको, लै अपने गृह आऊँ ॥ चरण गहि फाग मचाऊँ । सतगुरु ० ॥ प्रेमप्रीतिकी करि पिचकारी, भक्तिको रंग

१ दुबाई. २ पुनः ३ अवसर. ४ पुनः फिरसे ५ चंद्रमुखी. ६ मृगनयनी. ७ उपपति. ८ पति. ९ भोवन. १० अनन्त. ११ पीछे. १२ सावधान. १३ केलि. १४ नव. १५ होरी.