भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

गाई । सद्ग्रन्थ अनेकन, रचे करी प्रभुताई ॥ निजपंथ चलायो, वीतरांग निष्कामी । अघ ओघ० ॥ जिस समय सिकन्दर, काशीजीमें आया । बावन परिचय सतगुरुने जाय दिखाया ॥ यह कौतुक लखिकै शेखतकी चवराया । जीता करवावो, सुरदेको फरमाया ॥ कीन्हो कँमाल जिन्हँदा, तबहीं सतनामी । अघ ओघ० ॥ ऐसी अनेक लीला, प्रभुने बहु कीनी । नहिं जाने मूरख जिनकी बुद्धि मँलीनी ॥ बांधो गढमें धर्म दासको दीक्षा दीनी । कहैलंग गुण वरणे इन्द्र मती मति हीनी ॥ सत रूप सत्य संकल्प, सत्य सुख धामी । अघ ओघ० ॥

झूठे झगडेमें पडि, क्यों जन्म गमावै । यह मनुष्य देह फिर, बारबार नहिं पावै ॥ टे० ॥ मति मूरख इतनी वेसरँमाई धारे । हित अनहित अपनो, तू नहिं जरा विचारे ॥ यह वृथा डुबोवै, आई नाव किनारे । विषयोके वशपरि जीती बाजी हारे । अब कहांतलक, तुझको कोई समुझावै ॥ यह मनुष्य० ॥ वे भूली बातें तुझे, सकल दुखदाई । जो गर्भवासमें, तूने यातना पाई । अब चढी आय तेरे तनपर तरुणाई । मर्ग चलत निहारे सुन्दर नारि परौई ॥ करकै गुमान ले तान, रागिनी गावै । यह मनुष्य० ॥ छल कपट त्यागि भजु, सत्य नाम सुखदाई । जिससे कुछ होवे, तेरी मूढ भलाई ॥ सुख संपत्ति माया, दो दिनकी है भाई । बन सके सो कर ले, परमारथ जग आई ॥ जब काल अचॉनक, आय तुझे ले जावे । यह मनुष्य० ॥ सत संगति कर सन्तोकी, शरणमें जाके । वे कहैं सो सुन उपदेश, तू ध्यान लगाके ॥ है तेरा यही कर्तव्यै, जगतमें आके । कहते कवीर गुरु है, तुझको

१ बैराग्यवान्. २ तिद्धि. ३ नामविशेष, अद्भुतता. ४ जीता. ५ वृषित मँलो. ६ निर्लज्जता. ७ दुःख. ८ मार्ग. ९ दूसरेको १० एकाएकी. ११ काम.