भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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समझाके ॥ करि चतुराई मति, बातें बहुत बनावे। यह मनुष देह फिर बार बार नहीं पावे ॥

मलार-समय वर्षा ऋतु.

उमड़ि घुमड़ि चहुँ दिशिसे आय, कर्मनके बादर वरषे ॥ टे० ॥ सस्त्रिंत अरु प्रारंभ विविध विध, और करत जो करसे। सो सब भोग हेतु शरीर धरि, जीव जगत्में संरसे ॥ विषयके सुख सब चमकि डुरंत पुनि, बुति दामिनिसे दृशे। ताको सूठ प्राप्ति इच्छा करि, देखि २ के तरेंसे ॥ त्रिविध ताप नाना अनर्थयुत, नाश करनको जरेंसे। अर्थ धर्म अरु काम मोक्षकी, करत याचना हरसे ॥ कोई लै वैराग त्यागि सब, निकरि चले निज घरसे। जप तप व्रत संयम आराधत, जन्म मरणके डरसे ॥ गुरु कवीर सब कर्म नाश करि, निजमति परख प्रवरसे। निश्चय करि सिद्धान्त लखायो, न्यारा क्षर अक्षरसे ॥

आज धैंन ज्ञान घटा घिरि आई। शीतल बहत संभौर, सुगन्धित मन्द २ सरसाई ॥ टे० ॥ सुमति दामिनीकी बुति दमकत, तम अज्ञान नशाई। बरषत विविध विचार सार पद, अखंड धार धरोंई ॥ सकल विकार रहित अस पावैंस, की ऋतु लहि सुखदाई। धर्म विटैप वन कुञ्ज, सुकृत तृणपुञ्ज उठे हरियाई ॥ लखि मयूर सुनि मनेनशील धुनि, प्रमुदित कूकभैंचाई। दाहुँर दीन अधीन हीनजन, बोले अति हरैंघाई ॥ चहुँ दिशि धर्मदास चित चाँत्रिक, चितैवत आस लगाई। स्वातिबुन्द सतगुरु बानो विन, नहिं मम प्यास बुझाई ॥

१ पूर्व. कृतकर्म जो एकत्रित हैं. २ फलोन्मुख कर्म. ३ प्रवृत्त हुए. ४ छिन्ती है. ५ अभिलाष करता है. ६ समूल. ७ मीगना. ८ नाशमान. ९ अविनाशी. १० बादर. ११ वायु. १२ गर्जना करि. १३ वर्षा. १४ वृक्ष. १५ लताच्छादित स्थान. १६ विचारमान १७ चिल्लाकर. १८ मंडक. १९ आनन्द हो. २० पीहा. २१ देखता है.