कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(३७४)
कवीरपंथी—
पूर्वी । (समय वर्णान्धुः)
पीले प्याला हो मंतवाला प्याला प्रेम अंमी रसकारे ॥टे०॥ पाप पुण्य भुगतंतनको आया, कौन तेरा और तूं किसकारे ? । जहँलग स्वाँस नाम ले प्रभुका धन यौवन स्वपना निझिका रे ॥ बालापन सब खेलि गँवाये । तरुण भयो नारी वशकारे । बृद्ध भयो तन काँपन लागै, फिर न जाय कतहूं सरकारे ॥ नाभिक- मलमें है कस्तूरी, वन वन मृग डोलै भटकारे । बिन सतगुरु इतना दुख पायो, कैसे भयं मिटै पशुकारे ॥ जन्म मरणसे बचना चाहो, तौ छोड़ो कामिनी चसकँारे । कहैं कवीर सुनौ भाई साधो, नखंशिख रूप भरा विषकारे ॥ १ ॥
करन मंतैसो करै करतारे । और सबनको झूठ मतारे ॥टे०॥ कबहुँक शैलें शैलपर सागर, कबहुँक शोषै सब सरितारे । कबहुँक नृपको करत है भिक्षुक, कबहुँ रंक शिर क्षत्र धरतारे ॥ पूतना कौन सुकृत करि आई, गुन अवगुन तजि करि प्रभुंतारे । ताहि मारि वैकुण्ठ पठायो, बलिराजामें कौन खंतारे ॥ एक पुत्रको नृप पचिहारे, जाके हती सहस्र वनिंतारे ॥ साठ पुत्र नारदको दीन्यो, माया त्यागि विरंति रहतारे ॥ पञ्चभैतारीको व्रत राख्यो, दोष लगायो पतिवरतारे । कहैं कवीर कर्ताकी गसि को, दूजा जगमें लखि सकतारे ॥ २ ॥
वसन्त ( समय, वसन्तच्छु)
वन्दों सतगुरु साहिब कृपाल । जासे छूटे भवद्वैन्द जाल ॥ टे०॥ धरि ध्यान हृदय ध्यावे महेश । पदपङ्कज सेवैं अज सुरेश ॥ नारद सारद अरु श्रुति अशेष, मुख सहस्र करत गुणगान शेष ॥ अभिमान नांग मृगंपति प्रचण्ड । त्रयताप अनल पावस अखण्ड ॥
१ सांसारिक ज्ञान शून्य, उन्मत्त. २ अमृत. ३ प्रोगकरनेको. ४ प्राण. ५ उठा बैठ. ६ अभ्यास. ७ नखते चोटी पर्यंत. ८ इरावा. ९ पर्वत. १० सोखे. ११ एवयव. १२ अपराध. १३ स्त्री. १४ उपराज. १५ द्वीपदी. १६ जन्म मरणादि मुख दुःख. १७ हन्त. १८ वेद. १९ हस्ती. २० सिंह.