कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 968 में से
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सुरंतरु विशाल फल प्रद यथेष्टं, भवरोग हरण वर भिषग् श्रेष्ठ ॥ अनुरोधरहित गति मति उदार । कश्मेल अरण्य तीक्ष्ण कुठार ॥ अद्वैत अखिल पति संप्रमेय रागादि व्यालंगण वैनतेय ॥ वैरबन्ध विगत मल अति स्वच्छन्द । अनवद्य अनघ आनन्दकन्द ॥ धर्मदास और तजि सकल आस, राखत कवीरको हँठ विश्वास ॥ ३ ॥
ऋतुराज आज आयो वसन्त । सतगुरु यश जग प्रगटचो अनन्त ॥ टे० ॥ चहुँ दिशि अनुशासन मय समीर । लगि बहन हरण भवजाल पीर ॥ तेहि पैरसि बुद्धि कलिकै अन्तुप । भई विकैशि सुमुशु सुप्रसन्नरूप ॥ श्रद्धा रसैलतरु धर्म मौर । झौरनैपर झूलत भक्त भौर ॥ पतिझौर भयो कर्मनको सर्व । बहु जन्म २ कृत धारी गेर्व ॥ अति प्रीतिसहित सत मत विधीन । करि कोकिलें साधू करत गान ॥ करुणानिधान मुख चन्द्र ओर । चित्तवत सज्जन जन चित्त चैकोर ॥ सतसंगनि उपैवनमें विचार । पल्लवित भयो सिद्धांत सार ॥ लखि शान्त होय उर जेहि प्रताप । धर्मदास नाश होय त्रिविध ताप ॥ ४ ॥
मोरे सतगुरु खेलैं नित वसन्त । मिलि सन्त विशौरद मति महन्त ॥ टे० ॥ अनुराग भक्तिको घोरि रंग । छिरकें एकपर एक करि उर्मैङ्ग ॥ उर झोरीमें समता गुलाल । भरि वचन मूठि मारै कृपाल ॥ नहिं सुर दुर्लैभ तन बारबार । ताते भजिले सतनाम सार ॥ ना तो भवसागरकी धार जाय । तन कीट कुमी योनिनमें पाय ॥ दुख भूख प्यास तप शीत द्रन्द । अति कठिन क्लेशके परहिं फन्द ॥ औघटमें करि हो कहैं उपाव । जहाँ नाहिं खेवैयौं
१ कल्पवृक्ष. २ इच्छानुसार. ३ वैद्य. ४ निर्बन्ध. ५ पाप. ६ पैनो. धारवार. ७ प्रमाणसहित. ८ सर्प. ९ गद्द. १० निश्चय. ११ उपदेशरूप १२ स्वर्गकरि. १३ कलि. १४ फूलिक. १५ फूल. १६ वास्वके वृक्ष १७ गुच्छोपर. १८ पत्र गिरना. १९ अभिमान. २० दर्शन. २१ कोपल. २२ पक्षी विशेष. २३ बाण. २४ कोपल फूटे. २५ पंडित. २६ उत्साह. २७ बुझाय. २८ पार करनेवाला.