भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावला

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ग्राम ॥ नाम जाप जपि विमल होत जन, मननशील मुनिवत निष्काम । वांमदेव सम, प्रसन्न सेवत भवन्ति प्रभु पूर्ण काम ॥

धर्मधुरीण प्रवीण गति, मति अपार विशारदम् । अज्ञान हरण प्रधान, निर्गदित ज्ञान भव निधि पारदम् । वेद बोधित कर्म वर्म, विचार सार असारदम् । आपत्तिहर सम्पत्ति सुख, प्रतिपेत्ति प्रचुर प्रकारदम् । वरदायक वरदेश विनायक, विश्वविदित वर ब्रह्मचारी । अति उपकारी, कमल० ॥

अति अनरूप तरुकल्प, सत्य संकल्प अखिल अन्तर्यामी । अपैर त्रिविष्टप परात्पर प्रवर परमतरसुखधामी । अविनाशी अव्यक्त, अजर अज अमर चराचरके स्वामी ॥ अधम उधारण, तरण तारण कारण निज अनुगंामी ॥ ये विधिवरुणेन्द्र इन्द्र, सुराः स्तुवन्ति निरन्तरम् । चिद्घनं दिव्यं ह्यभूतिं, पुरुषेति परात्परम् । निराकार निरीह निरगुण, किञ्चिदस्ति न तत्परम् । कञ्च पर्ण ससुन्द्रवं, पारदं भवाब्ध्यति दुस्तैरम् ॥ धर्मदास दासानुदास, भवदीय दास आज्ञाकारी । अति उपकारी, कमल दल प्रगटे निजइच्छा० ॥

लावनी रंगत मोहिनी ॥

आनन्दकन्द अखिलेश्वर, अन्तर्यामी । अघ ओघ हरण तव, चरण कवीर नमामी ॥ टे० ॥ भव भ्रमित भ्रमित लखि, जीव दुखित अति भारी । करुणानिधि दीनदयाल परम उपकारी ॥ सब काम क्रोध मद, मोह द्रोह रिपु मारी । काशीमें कमल पत्र, पर स्वेच्छाचारी ॥ धरि बालरूप प्रगटे, त्रिभुवनपति स्वामी । अघ ओघ० ॥ जग श्रेष्ठाचार प्रचार, करनको भाई । गंगातटपै कियो रामानंद गुरु जाई ॥ तजि पक्षपात विज्ञान, विविध विधि

१ महादेव. २ विद्यान्. ३ कहा हुआ. ४ कवच. ५ प्राप्ति ६ बहोत. ७ इष्टर. ८ स्वर्ग. ९ अतीव १० सेवक. ११ जिसको. १२ स्तुति करते हैं. १३ उल्लज. १४ पार करनेवाले. १५ अपार. १६ आपका.