कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
लावनी रंगत लंगडी.
करुणा भवन कवीर, समन भवपीर वीर विग्रह धारी । अति उपकारी, कमल दल प्रगटे निज इच्छाचारी ॥ ८० ॥ कुन्द इन्दु अनुरूप, देखि वंपु अति अनूप मनमंथ लाजे । करत पराजय, कौमुदा दिव्य वसन भूषण साजे ॥ दिपंति अमित मणि जड़ित, तड़ित आर्भाजित शीश सुकुट राजे । तिलक मनोहर, माल सुचि सुमन माल उरमं आजे ॥
निरविकार अकार निरमल, नित्यसुक्त निरामयम् । निजानन्दानन्दकन्द, स्वच्छन्दमद्भुतमद्भयम् ॥ निरनिमित्त्य परमार्थकारी, निरममंत्त्व मुदालयम् । निरविवाद विषाद निरगत, निष्ठप्रपञ्चस निरभयम् ॥ आन्ति ध्वान्त ध्वंसक प्रधान, निरआन्ति विमल विद्या धारी । अति उपकारी, कमल० ॥
मुद मङ्गल मय वेष, सुखद सर्वेश सर्वविद विज्ञानी । निर- अभिमानी, विगत मल द्वेष क्लेश हत निरबौनी ॥ ध्यावत सन्त महन्त, अन्त नहि पावत है ज्ञानी । परम सयानी, भारैती चकित होत वरणत वानी ॥ यस्य विविध चरित्र, चारु विचित्र सुरसरि निरमलम् ॥ वकनि मंजि मरौल, काकः पिक्के भवन्ति निरैर्गलम् ॥ सिद्ध मुनि योगिन्द्र, यति सुरवृन्द वन्द्य पदुत्पलम् । शेष वदत अशेष सुख, गुण शक्यते न कथेत्यलम् ॥
योगदण्ड धारी अखण्ड पाखण्ड प्रचण्ड खण्डन कारी । अति उपकारी, कमल० ॥
सेवक सुखद कृपाल, काल कलि व्याल खगेश्वर अति अभिराम । धाम सुधामय, सौम गावत निशिवासर जेहि गुण
१ शरीर. २ सदृश. ३ शरीर. ४ कामदेव. ५ चन्द्रमा का प्रकाश. ६ प्रकाशित. ७ विद्युत. ८ प्रकाशकोठीतनेवाला. ९ अभिमानरहित. १० अंधकार. ११ मोक्षरूप. १२ सरस्वति. १३ स्नान करि १४ हंस. १५ कोयल. १६ सत्य. १७ पूर्ण. १८ गल्ल. १९ सामदेव.