कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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जुलाहा गमन लिये घर जाय, सरोवरके तट पहुँच्यो आय, देखि बालक तिय गई लोभाय, धायके लीन्हो गाद उठाय ॥
देखत बालक गोदमें, जुलहा कह्यो सरोष ।
धरु जहँ ते लाई तहाँ, लोग लगावें दोष ॥
तबे तिय बोली उर धरि धीर । प्रगट भये० ॥
देखि यह बालक मोहि सुसकात । मनो कुछ कहन चहत है बात ॥
पिया मोहि ताते अधिक सोहात । ले चलो घर सब तजि उतपात ॥
सुनत बात यह नारिकी, काढ़ि लई तलवार ।
धरि चलु बालकको यहाँ, नहिं तो डारूं मार ॥
कह्यो यहि विधि त्रास दिखाय । नाय शिर रहगई तिय सकुचाय ॥
हाय अब कहूं मैं कौन उपाय ? । जायके दूबपै दियो सोवाय ॥
सजैल नयन अति विकल तन, कहि न सकै कुछ बात ।
धरणि परी जिमि माँछली, विन जलके अकुलात ॥
भई तब नभसे गिराँ गँभीर । प्रगट भये० ॥
तोहि तारण कारण सर्वेश । धन्यो निज बालरूप यहि देशँ ॥
धामलै जागकै सुनु उपदेश । मिटे सब जन्म मरण भवकेश ॥
सुनि अकाशवाणी विमल, चकित भयो चितमाहिं ।
तियहि कह्यो ले चलु घरे, अब मैं बरजौं नाहिं ॥
बहन लगी सुदमय मलय समीर । प्रगट भये० ॥
प्रभू जुलहाके घर आये । सन्त सब दर्शनको धाये ॥
सुमन सुर नभसे वरषाये । विरद यश बन्दीजन गाये ॥
दीनबन्धु करुणा भवन, समन सकल दुखद्वन्द्व ।
पन्थ चलायो जगत्में, करि गुरु रामानन्द ॥
मेठि धर्मदासकी भवनिधि पीर । प्रगट भये० ॥
१ बखेडा. २ अबू मरे हुए. ३ मच्छी. ४ आकाश. ५ वाणी. ६ स्थान. ७ स्त्रीको. ८ मना करता हूँ.
९ पुनः.