भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली ।

( ३६९ )

जुलाहा गमन लिये घर जाय, सरोवरके तट पहुँच्यो आय, देखि बालक तिय गई लोभाय, धायके लीन्हो गाद उठाय ॥

देखत बालक गोदमें, जुलहा कह्यो सरोष ।

धरु जहँ ते लाई तहाँ, लोग लगावें दोष ॥

तबे तिय बोली उर धरि धीर । प्रगट भये० ॥

देखि यह बालक मोहि सुसकात । मनो कुछ कहन चहत है बात ॥

पिया मोहि ताते अधिक सोहात । ले चलो घर सब तजि उतपात ॥

सुनत बात यह नारिकी, काढ़ि लई तलवार ।

धरि चलु बालकको यहाँ, नहिं तो डारूं मार ॥

कह्यो यहि विधि त्रास दिखाय । नाय शिर रहगई तिय सकुचाय ॥

हाय अब कहूं मैं कौन उपाय ? । जायके दूबपै दियो सोवाय ॥

सजैल नयन अति विकल तन, कहि न सकै कुछ बात ।

धरणि परी जिमि माँछली, विन जलके अकुलात ॥

भई तब नभसे गिराँ गँभीर । प्रगट भये० ॥

तोहि तारण कारण सर्वेश । धन्यो निज बालरूप यहि देशँ ॥

धामलै जागकै सुनु उपदेश । मिटे सब जन्म मरण भवकेश ॥

सुनि अकाशवाणी विमल, चकित भयो चितमाहिं ।

तियहि कह्यो ले चलु घरे, अब मैं बरजौं नाहिं ॥

बहन लगी सुदमय मलय समीर । प्रगट भये० ॥

प्रभू जुलहाके घर आये । सन्त सब दर्शनको धाये ॥

सुमन सुर नभसे वरषाये । विरद यश बन्दीजन गाये ॥

दीनबन्धु करुणा भवन, समन सकल दुखद्वन्द्व ।

पन्थ चलायो जगत्में, करि गुरु रामानन्द ॥

मेठि धर्मदासकी भवनिधि पीर । प्रगट भये० ॥

१ बखेडा. २ अबू मरे हुए. ३ मच्छी. ४ आकाश. ५ वाणी. ६ स्थान. ७ स्त्रीको. ८ मना करता हूँ.

९ पुनः.