भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

ठीकं २, बेनंजीरकी । भई अक्क० ॥ उस बरुंत सिकन्दर कहीं, काशीमें था आया । संग अपने शेखतकी पीरकों भी था लाया ॥ लोगोंने जाके सारो, हाल उसको सुनाया । सुनतेही सिकन्दरसे, कहके उनको बुलाया ॥ देखो हुजूर कर्माता, इस फँकीरकी । भई अक्क ॥ आतेहि सिकन्दरको, रहँम न जरा आई । गरदनमें तौक हतकडी, हाथोंमें डलाई ॥ बेडी भराके पांवमें, सुशकें भी कसाई । फिकवा दिया गद्दामें, गठड़ीमें बँधाई ॥ पर थी उन्हें परवाह कब ?, लोहे जँजीरकी । भई अक्क० ॥ बुलवाके कँतिलोंको, टुकडे करा वदँनके । मँगवाके देगँ उगमें, भरवाके कँनके कनके ॥ चढवाके आगपै वहीँ हाजिर खडा था तँनके । सब कर लिये इरादे, पूरे जो कुछ थे मनके ॥ सतगुरु खड़े खड़े तखँत, नजर आये वजीरकी । भई अक्क० ॥ आर्यौ वजीर पास, बादशाहके धायके । कहने लगा करते हो क्या आतिशें जलायके ॥ बैठे कवीर तो हैं, वहाँ तख्त जायके । शरमाके सिकन्दर है, गिरा चरण आयके ॥ गति धन्य धर्मदास है, अति गुणगँभीरकी । भई अक्क० ॥ ८४ ॥

लावनी ध्वनि गारो.

चलो सखी दरशनको सरतीर ।

प्रगट भये सतगुरु सत्य कवीर ॥ टे० ॥

समय अरुणोदयके परभात । विमल है जल बिच पुरइनके पात, अवतरे बालरूप मृदुगात । देखि सुन्दरता काम लजाय ॥

परम मनोहर रूप अति, शोभा वरणि न जाय ।

उपमा काह त्रिलोकमें, जो कोई देवे लाय ॥

मनो रवि उदय भयो तम चीर । प्रगट भये० ॥

१ सत्य. २ अपूर्व. ३ समय. ४ गुरु. ५ संवर्ण. ६ सिद्धि. ७ साधु. ८ क्या. ९ चिन्ता. १० चांडाल. ११ शरीर. १२ हंटा. १३ बारीक टुकड़ा, १४ वृद्ध होकर. १५ सिंहासन. १६ मंत्रो. १७ अग्नि. १८ सूर्योदय.