कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ज्ञान दुनियाँमें, कभी परमान होता है। बिना कोई गुरुके पास, जाकर कौन फुंकुंवाये ॥ ये सुन कौतुक किया ऐसा, धन्यो लंघु रूप बालकका, जाय गङ्गा किनारे घाट पर सोये ये शिर नांये ॥ नहानेके समय जातेमें, रामानन्द स्वामीकी। खड़ाऊँ आ लगी शिरमें, तो दैयाँ। कहके चिल्लाये ॥ दयालू सन्त ये स्वामी, उठाके गोदमें बोले। भजो श्रीराम मत रोवो, मिटै दुख हरिका गुण गाये ॥ करी ऐसी कई लीला, कहाँतक कह सके कोई। सुक्ति धर्मदास है जगमें, उन्हीकी शरणमें जाये ॥ १ ॥
लीला अनेक देखके, सतगुरु कवीरकी। भई अकृ परेशान है सुलतान मीरकी ॥ टे० ॥ सलंतनत् बादशाही थी उस वखत अंजीब। सब हो रहे थे हिन्दू, हरहाँलसे गरीब ॥ धर्मों करमसे रहना, था किसके तब नँसीब। यह बात सम्भव पन्द्गा, सौके कि है करीब ॥ फैली जगत्में चरचा, थी धर्मवीरकी। भई अकृ० ॥ होलीके दिनों वेश्याको, लैकै अपने साथ। फिरते फिरे काशीमें, डाले गलेमें हाथ ॥ रीवाँ नरेशें था वहीं, हाजिर बघेलैनाथ। आते कवीर देख, झुकाया न उसने माँथ ॥ चरणोंपै लगे ठारने, लै धार नीरकी। भई अकृ० ॥ बोला बघेल वीरसिंह, देखिये कल्लां। चरणोंमें वँरि डारिके, करते हौ क्या भला ? ॥ कहने लगे जगदीशमें, पण्डा जो लै चला। अँटका उठाके हाथसे, छूटा तौ पग जला ॥ पानीसे जलत उसके, बुझाई सरीरकी। भई अकृ० ॥ राजाने भेजा कॉसिद फौरन बुलायके। ला खँवर खाँस जलदी जगदीश जायकै ॥ कहते कवीर सच है, कि बातें बनायकै। झूठी हमारे सामने, दुर्गुण छिपायकै ॥ ठहरावो हाल
१ मंत्र सुने. २ चरित्र. ३ छोटा. ४ मस्तक नीचा किये. ५ मां. ६ रोये. ७ राज्य. ८ अबसृत.
९ सर्व प्रकार. १० प्रारब्धमें. ११ राजा. १२ क्षत्रीजातिविशेष. १३ मस्तक. १४ चरित्र. १५ जल. १६ वृत्त. १७ जलवी. १८ समाचार. १९ यथार्थ.