कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
दास आपका, मैं बिचारा नहीं ॥ टे० ॥ मैं तो अनाथ मेरे, कौन दूसरा धनी । एक छोड़ तुम्हे और मुझे सहाँरा नहीं ॥ मेरी तौ दौड़ें फँत, तुम्हींतक कृपानिधे । तीनों भुवनमें और, कहीं गुजारा नहीं ॥ कई एक दफे जो आफतें, भक्तोंपै आं पड़ी । तो आपने क्या उनके, दुखको निवारा नहीं ? ॥ क्या मुझसंरीके पातकी, तुमने कभी कोई । भवसिन्धु डूबतैसे, पार उतारा नहीं ? माना की मैंने पाप, मेरे है प्रबल सही । पर कम्भी भी तुम्हारी, दयाको इशारा नहीं ॥ दरशन जो अवतलक, न दिये आपने कबीर । क्या लैके धर्मदास, नाम पुकारा नहीं ? ॥ ३ ॥
गजल ध्वनि पीलू.
जगत् जिसका ये कुँल, बनाया हुआ है । वही सब घटोंमें, समाया हुआ है ॥ टे० ॥ नहीं दूसरा कोई, है उससे न्यारा । वो अपनेमें, आपी भुलाया हुआ है । हरैएक शै जो हैगी, वो रङ्गोबैरङ्गी । ये जलैवा उसीका दिखाया हुआ है ॥ उसीकी अकँलमें, ये आती है बातें । शरण सद्गुरुकी, जो आया हुआ है । है ताकैत उसीमेंही, मँखोलनेकी । जो कुछ भेद सन्तोसे, पाया हुवा है । धरमदास अपनी, उसीकी फिंकरमें । करोड़ोंकी दौलत लुटाया हुआ है ॥ १ ॥
गजल ध्वनि कहरवा.
कृपा करनेको भक्तोंपर, प्रभू सतलोकसे आये । कमलदलपर प्रगट, काशीमें हो कबीर कहवाये ॥ टे० ॥ बनाके वेष साधूका, लगे फिरने घरोघरमें । कहैं हमसे करो चर्चा, ये सुन विद्वान घबरायें ॥ चली नहिँ और कुछ युक्ति, तौ सब पण्डित लगे कहने । बतावो ये हमें पहले कि, दीक्षा किससे तुम लाये ॥ न हँरगिज
१ दीन. २ आश्व. ३ प्रयत्न. ४ कबल. ५ निवाह. ६ प्रातहुई. ७ मेरे समान. ८ सत्य. ९ कटाक्ष. १० यह संपूर्ण. ११ प्रत्येक पदार्थ. १२ नाना प्रकारके. १३ जोति, प्रकाश. १४ बुद्धिमें. १५ शक्ति. १६ कहनेको. १७ विचारमें. १८ चर्कित हुए. १९ कभी.