कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 968 में से
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कराल झाल, मेरो प्रभु हरो ॥ टे० ॥ वह इन्द्रमतीकी पुकार, सुनि उदार हो । कीन्ही सहाय जायकै, तक्षंक बहोत डरो ॥ जब सेतु बांधनेको, पुकारा था रामने । तब धाय आये कौनसो, संकट तुम्हे परो ॥ पुनि जाय जगन्नाथमें, तुम योगदण्डसे । सागर हटाया आपने, अति कोपसे भरो ॥ साहिब कवीर मेरी पीरके, बखत कहाँ ? । सोयेहौ आप जायकै, कुछ मनमें अब धरो ॥ १ ॥
गजल ध्वनि ईमन
विषयोंसे मनको तृप्त, कराना नहीं अच्छा । जलती अगिनको, घीसे बुझाना नहीं अच्छा ॥ टे० ॥ सुख भोग ये जगतके, सबी होंगे नाशमान । तृष्णाको बढा, जीको फँसाना नहीं अच्छा ॥ ये स्वप्रका तमाशा, है झूठमूठका । रंग रंगके खेल, देख लुभाँना नहीं अच्छा ॥ धन धाम पुत्र कलत्र, रूप जो पाया । हैरगिज गहूर, इनका है लाना नहीं अच्छा ॥ पल २ अमोल जाती है, कहते हैं ये कवीर । मानुष शरीर मुँफत गँवाना नहीं अच्छा ॥ १ ॥
प्रबल ये सेर्न मायाने, चलाई है कृपासिन्धू । बचाले जालसे, तेरी दुहाई है कृपासिन्धू ॥ टे० ॥ गर्भमें कौलँ था मेरा, न झूलूँ ध्यान मैं तेरा । वो बातें उसने छल बलसे भुलाई है कृपासिन्धू ॥ हमेशा लोभसे रहता है, मन मैला बना बेशंक । दिखानेको ये ऊपरकी सफाई है कृपासिन्धू ॥ पड़ा अज्ञानके वशमें, तडँफता हूँ मैं मुहँतसे । तेरेही हाथमें मेरी, रिहाई है कृपासिन्धू ॥ त्रिविध कर्मोंसे जो पैदा, जन्म अरु मरण बीमारी । वो तेरेही कृपा इसकी, दवाई है कृपासिन्धू ॥ अजैब ढँगकी यह दुनिया जो, दुँरंगी देख पडती है । सो सब तेरीही कुदँरतने, बनाई है कृपासिन्धू ॥
१ एक प्रकारका सर्प. २ आसा. ३ मोहित होना. ४ स्त्री. ५ कदापि. ६ अभिमान. ७ व्य. ८ कटाक्ष. ९ वचन १० यथार्थ. ११ स्वच्छता. १२ व्याकुल. होना. १३ बहुत कालसे. १४ मोक्ष. १५ अक्षुत प्रकारकी. १६ इन्द्रसहित. १७ माया.