भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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उत्थानिका ।]

(३५)

है, उसी शाखाके किसी पुरुषकी की हुई टीकाको सर्व श्रेष्ठ कहकर, चाहे वह किसी दूसरी टीकाकी नकलही क्यों नहो, उसीको यह पढ़ेगा। और ठीक उसी प्रकारकी दूसरी टीकाको बुरा बतलायगा इस प्रकारकी बात, श्रद्धेय पूर्णसाहबकी टीका तथा मेहीदास और प्रागदासकी टीकावालोंसे मिलनेसे साफ २ प्रगट हो जाती है। यद्यपि मेहीदासजी और प्रागदासजीकी टीका पूर्ण साहबकी टीकासेही बनायीं गयीं हैं और रद्दीके भाव विककर पंसादीकी दूकान पर पुडिया बांधी गयी है तथापि जिनके पास वे टीकाएँ हैं वे पूर्ण साहबकी भी भूल निकाल कर अपनी मानी हुई टीकाको सर्व श्रेष्ठ बतलाते हैं।

इसके अतिरिक्त पाठके उलट फेरने भी खासा साम्प्रदायिकताका तांडव नाच नचवा दिया है। साम्प्रदायिक नशामें चूर सब अपनी अपनी शाखाकेही पाठ को सर्व श्रेष्ठ बतलाकर दूसरोंकी सत्यताकी भी उपेक्षा करते हैं इसका कारण मिथ्या पक्षपात ही है। आज कवीर साहबके उपदेशोंका-आश्रय लेकर दूसरे लोग संसारमें बहुत कुछ कर रहे हैं और उनके कामोंको देखकर कुछ समझ-बूझवाले कवीरपंथियोंके मुहमें पानी भर आता है किंतु ऐसा होनेपर भी उनको अपने घरकी पवित्र वस्तुका ध्यान नहीं है और दूसरोंके जूठनको देखकर ललचा ललचा मरते हैं।

प्यारे भाइयो ? सद्गुरुके इस वचन पर जरा गौर करो फिर आपको पता लग जायगा कि, आपके घरमें कैसे २ अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं—

सद्गुरु कहते हैं—

“सब सँग रसिये सबसँग बसिये, सबका लीजे नाम ।

हांजी हांजी सबकी कीजे, रहिये अपने ठाम ॥”

अर्थात्—

“वेद आदि विद्या सबै, बोध हेत हिय धार ।”

अथवा—

“सब मत महरम करू, तब देखू निज सैन”

सब कुछ पढ़ो, सब कुछ देखो सब सुनो, सबके साथ प्रीतिके साथ बर-तावा करो, किसीके दिलको मत दुखाओ “आत्मवत्सर्वभूतेषु” के न्यायसे, सबकी सहायता करो किंतु “रहिये अपने ठौर” को मत भूलो; यही गुरुकी