भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

( ३६ )

[शब्दावली-उत्थानिका]

आज्ञा है, यही अपने आत्माको प्रवंचानेसे बचानेका मार्ग है; इस आदर्शको ही सामने रख कर, अपने मानव जन्मको सफल कर सकते हो, यही आदर्श तुम्हें सब प्रकारकी गुलामीकी परतंत्रतासे छुड़ाकर मुक्ति और स्वतंत्रता अर्थात् जीवन मुक्तिका मार्ग दिखा सकता है । सद्गुरु कहते हैं—

अपने अपने धर्ममें, सब सुखलह सब काल ।

निज धर्म जिन अपने गह्यो, सहजे भये निहाल ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—

“स्वधर्मं निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”

इस लिये प्यारो ! आपकी विद्या और सब दौड धूपकी सफलता इसीमें है कि, आप वर्तमान कालका ध्यान रखते हुए अपने धर्मके भोलेभाले सांप्रदायिक पक्षमें डूबे हुओंको-सत्य कवीरके सच्चे उपदेशके द्वारा बाहर निकालने का प्रयत्न कीजिये. क्योंकि, यह सांप्रदायिक पक्षपात ऐसा बुरा है कि, इसमें पड़े हुए बडी कठिनाईसे सीधे रस्ते पर लाये जा सकते हैं.

उत्थानिका का कलेवर बहुत बड़ाहो गया है. इसलिये विशेष न लिखकर मैं इसे यहाँही समाप्त करता हूँ और आशा करता हूँ कि, सत्य धर्मके अनुयायी महात्मागण इस शब्दावलीको अपनाकर और इसके गुण दोषका विवेचन कर अपना कर्तव्य निबाहेंगे और मुझपर अनुग्रह करेंगे ।

सर्वं सज्जनोंका परमार्थी-कृपाकांक्षी—

बम्बई.

मिति आषाढवदी

१४ सम्बत १९८६. वि

ता० ५।७।२९.

श्रीयुगलानन्दविहारी.

कबीराश्रमाचार्य—

कबीराश्रम (खरसिया.)

विलासपुर