कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(४६५)
सा०-अमृत वस्तु जाने नहीं, मगन भये कित लोय । कहहि कवीर कामो नहीं, जीवहिं मरण न होय ॥११॥
रत्नो ग्यारहवीं ११ ।
आंधरी गुष्ठि सृष्टि भई बौरी । तीन लोक महाँ लागि ठगौरी ॥ ब्रह्महिं ठग्यो नाग संहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ राज ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ आदि अन्त जेहि काहु न जानी । ताको डर तुम काहेक मानी ॥ ऊ उतंग तुम जाति पतंगा । यम घर किहेउ जीवको संगा ॥ नीम कीट जस नीम पियारा । विषको अमृत (मान) कहत गवारा ॥ विषके संग कौन गुण होई । किंचित लाभ मूल गौ खोई ॥ विष अमृत गौ एकै सानी । जिन जाना तिन विष के मानी ॥ कंहा भये नर सुय बेसुद्धा । बिन परचय जग बूढ़ न बुद्धा ॥ मतिके हीन कौन गुण कहई । लालच लागे आशा रहई ॥
सा०-भुवा है मरी जाहुगे, भुये कि बाजी ढोल ।
स्वप्न सनेही जग भया, सहिदानी रहिगो बोल ॥ ११ ॥
रत्नो नारहवीं १२ ।
माटिक कोट पषानक ताला । सोई बन सोई रखवाला ॥ सो बन देखत जीव डेराना । ब्राह्मण वैष्णव एक करि जाना ॥ (जोरी) ज्यों किसान किसानी करई । उपजे खेत बीज नहिं परई ॥ छाड़ि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु औ चेला ॥ तीसर बूड़े पारथभाई । जिन बन दाहे दवा लगाई ॥ भूंकि भूंकि कूकर मरि गयऊ । काज न एक सियारसे भयऊ ॥
साखी-मूस विलारी एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज यक देखो हो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥१२॥
१ कहां भये नल स्रक्ष बेस्रक्ष । बिन परिचय जग मूढ न बूझा ॥