भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 480

(४६६)

कवीरपंथी—

रमनी तेरहवीं १३ ॥

नहिं परतीति जो यह संसारा । द्रव्यक चोट कठिन को मारा ॥ सो तो शेषै जाय लुकाई । काहूके परतीति न आई ॥ चले लोग सब मूल गँवाई । यमकी बाढ़ि काटि नहिं जाई ॥ आजु काज जिय काल्हि अकाजा । चले लादि दिरगंतर राजा ॥ सहज बिचारत मूल गँवाई । लाभ ते हानि होय रे भाई ॥ ओछी मती चन्द्र गो अथई । त्रिकुटी संगम स्वामी बसई ॥ तबहीं विष्णु कहा समुझाई । मैथुन अष्ट तुम जीतहु जाई ॥ तब सनकादिक तत्त्व बिचारा । जैसे रंक धन पाव अपारा ॥ भौ मय्यादि बहुत सुख लाग। यहि लेखे सब संशय भागा ॥ देखत उत्पति लागु न बारा । एक मरे यक करै विचारा ॥ सुये गयेकी काहु न कही । झूठी आश लागि जग रही ॥

सा०-जरत जरतसे बाचहू, काहे न करहु गोहार ।

विष विष्याकै खायहू, राति दिवस मिलि झारि ॥ १३ ॥

रमनी चौदहवीं १४ ।

बड सो पापी आहि गुमानी । पाखण्ड रूप छल्यो नर जानी ॥ बावन रूप छल्यो वलि राजा । ब्राह्मण कीन्ह कौनको काजा ॥ ब्राह्मणही सब कीन्हो चोरी । ब्राह्मणही को लागी खोरी ॥ ब्राह्मण कीन्हो वेद ( ग्रन्थ ) पुराना । कैसेहु कै मोहि मानुष जाना ॥ यकसे ब्रह्महि पंथ चलाया । यकसे हंस गोपालहिं गाया ॥ यकसे शम्भू पंथ चलाया । यकसे भूत प्रेत मन लाया ॥ यकसे पूजा जैन विचारा । एकसे निहुरि निमाज गुजारा ॥ कोइ काहुको हटा न माना । झूठा खसम कविर न जाना ॥ तन मन भजि रहू मोरे भगता । सत्य कवीर सत्य है वक्ता ॥ आपुहि देव आपुही पाती । आपुहि कुल आपुहि है जाती ॥ सर्व भूत संसार निवासी ।