भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४६७)

आपुहि खसम आप सुखरासो ॥ कहते मोहि भयल युगचारी । काके आगे कहौं पुकारी ॥

सा०-सांचे कोइ न मानई, झूठेके संग जाय ।

झूठे झूठा मिलि रहा, अहमक खेहा खाय ॥ १४ ॥

रमैनी फन्तहवीं १५ ॥

उनई बदरिया परिगौ सँझा । अगुवा भूले बन खंड मंझा ॥ पिय अन्ते धन अन्ते रहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥

सा०-कुलवा भार न ले सकै, कहै सखिनसों रोऽ ।

ज्यों २ भौजै कामरी, त्यों २ भारी होइ ॥ १५ ॥

रमैनी सोलहवीं १६ ॥

चलत चलत अति चरण पिराने । हारि परे तहँ अति खिसि- याने ॥ गण गन्धर्व मुनि अन्त न पाया । हरि अलोप जग धन्धे लाया ॥ गहनी बन्धन बंध न सूझा । थाकि परे तहँ कछुन न बूझा ॥ भूलि परे तब अधिक डेराई । रजनी अंध कूप है जाई ॥ माया मोह उहां भर भूरी । दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥ वरवै तपै अखंडित धारा । रौने भयावनि कछु न अधारा ॥

सा०-सबै लोग जहँ डाइया, अन्धा सबै भुलान ।

कहा कोइ नहि मानही, (सब) एकै माहि समान ॥ १६ ॥

रमैनी सत्रहवीं १७ ॥

जस जीव आपु मिलै अस कोई । बहुत धर्म सुख हृदया होई ॥ जासुं बात रामकी कही । प्रीति न काहुसों निर्वही ॥ एकै भाव सकल जग देखी । बाहर परे सो होय विवेखी ॥ विषय मोहके फंद छोड़ाई । जहां जाय तहँ काटु कसाई ॥ है कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ मानुष बड़े बड़े है आये । एकै पंडित सबै पढाये ॥ पढ़ना पढ़उ धरहु जनि गोई । नहिं तो निश्चय जाहु विगोई ॥