कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(४२)
कबीरपंथी—
दुरयोधन परिच्छित राजा, फिर पाछे पछताई॥ सुर पण्डित औ नृपति बादशाह, ऊंची पदवी पाई ॥ भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ का भये वेद पुराण गुन गाये, सत्य दया नहिं आई ॥ अहंकारमें सबहिं भुलाने, अजगर जनम सो पाई ॥ हम तो कान राखी नहिं भाई, ज्यों का त्यों ठहराई ॥ भावे कोई दुख सुख करि माने, भक्ति के पंथ चलाई ॥ योग, यज्ञ, तीरथ, व्रत, संयम, करनी कोटि कराई ॥ नाम बिना सबही है खाली, कहैं कबीर समुझाई ॥ ३ ॥
संगीतरत्नमालामें यही पद इस प्रकार हैं— ध्वनी गौरी वृन्दावनी (समय सूर्यास्त)
॥ दास पर नाम ध्वजा फहराई ॥ काल जाल निकट नहिं आवे, माया देखि डराई ॥ जो कोई दाससो द्रोह विचारे, प्रभुको नाहिं सुहाई ॥ हरनाकुशकी वह गति हो गई, रावण धूर उड़ाई ॥ सुर ब्रह्मा नृप अरु इन्द्रकी, ऊंची पदवी पाई । भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ कहैं भयो वेद पुरान पढ़े से, घट महे दया न आई । अहंकारसे भवमें डूबे, अजगर तन धरि भाई ॥ हमनहिं कान करी काहू की, ज्यों को त्यों दर्शाई । चाहे कोई सुख कोई दुःख मानो, सत्य कहौं गोहराई ॥ योग यज्ञ तीरथ व्रत संयम, साधन कोटि कराई । विनु गुरु सफल होत नहिं कबहुँ, कहे कबीर समुझाई ॥
साखी ।
नाम लिया तिन सब लिया, सकल वेदका भेद । बिना नाम नरके गये, पढ़ि पढ़ि चारों वेद ॥
गौरी ४ ।
॥ बंदे नाम साहेब का ले रे ॥ एक लख पूत सवा लख नाती, संपति थिर ना रहे रे ॥ लंका ऐसे कोट विनशि गये, छिन