भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४३)

में ऐसो बाव बहे रे ॥ न कोई तेरा तू ना किसी का, पैडोई खलक बहे रे ॥ नदी नाव संयोग जुरो है, ऐसो मिलना हैरे ॥ मातु पिता सुत बंधू तिरिया, कोई न संग चले रे ॥ ये सब हैं स्वारथ के संगी, गुरु विन सुख न लहे रे ॥ छिनकमाहिं तन विनशि जायगा, फिर कछु करिना सके रे ॥ ताते वेग सम्हार अपनपौ, साहेब कबीर कहे रे ॥ ४ ॥

साखी ।

साहब से सब होता है, बन्दे से कछु नाहिं ॥ राई सो परवत करे, परवत राई माहिं ॥

  • गौरी ५ ।

॥ अवधू कुदरत की गति न्यारी ॥ रंक निवाज करै वह राजा, भूपति करै भिखारी ॥ एते लौंग फल नहिं लागे, चंदन फूल न फूला ॥ मच्छ शिकारी रमे जँगल में, सिंह समुद्रहिं झूला ॥ रेंड-हख भयो मलयागिर, चहुँदिशि फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मण्ड खण्डमें, अंधा देख तमासा ॥ पंगुल मेरु सुमेर उलंघे, त्रिभुवन मुक्ता डोले ॥ गुंगा ज्ञान विज्ञान प्रकासे, अन-हद बानी बोले ॥ अकाशहिं बांधि पताल पठावै, शेष र्वर्ग पर राजे ॥ कहैं कबीर राम हैं राजा, जो कछु करे सो छाजे ॥ ५ ॥

आरती प्रारम्भ ।

आरती ॥ १ ॥

जय जय सत्य कबीर । सत्यनाम सत मुक्त; सत रत सत कामी । विगत क्लेश सत धामी, त्रिभुवनपति स्वामी ॥ टेक ॥ जयति जय कबीरम्, नाशक भव भीरम् । धरचो मनुज शरीरम्, शिशु वर सरतीरम् ॥ जय २ ॥ कमल पत्र पर शोभित, शोभाजित कैसे । नीलाचल पर राजित, मुक्तामनि जैसे

  • नोट -और बहुतसी गौरी आगे दिया है सो देखना चाहिये सूचीमें देखनेसे पता मिलेगा ।