भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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रमैनी इक्कीसवीं २१ ॥

(७५२)

बहुत दुखै है दुखकी खानी । तब बचिहौ जब रामहि जानी ॥ रामहि जान युक्ति जो चलई । युक्तिहिं ते फंदा नहिं परई ॥ युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चै कहा न मानु हमारा ॥ कनक कामिनी घोर पटोरा । संपति बहुत रहै दिन थोरा ॥ थोरी संपति गौ बौराई । धर्म रामकी खबरि न पाई ॥ देखि त्रास सुख गौ कुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ॥

सा०- मैं सिरजों मैं मारहुं, मैं जारी मैं खाँव ।

जल थल मैही रमि रहौं, मोर निरंजन नाँव ॥ २१ ॥

रमैनी बाईसवीं २२ ॥

अलख निरंजन लखै न कोई । जेहि बंधे बंधा सब लोई ॥ जेहि झूठे सब बाँधु अयाना । झूठी बात साँचकै माना ॥ धंधा बंधा कीन व्यवहारा । कर्म विर्वर्जत बसे निनारा ॥ षट आश्रम षट दर्शन कीन्हा । षटरस वस्तु खोट सब चीन्हा ॥ चारि वृक्ष छौ शाख बखाने । विद्या अगणित गने न जाने ॥ औरो आगम करे बिचारा । तेहि नहिं सुझे वार न पारा ॥ जप तीरथ व्रत कीजै पूजा । दान पुण्य कीजै बहु दूजा ॥

सा०-मन्दिर तो है नेहका, मत कोइ पैठे धाय ।

जो कोइ पैठे धायके, बिन शिर सेती जाय ॥ २२ ॥

रमैनी तेईसवीं २३ ॥

अरुप सुख दुख आदिहु अंता । मन भुलान मैगर मैं मंता ॥ सुख विसराय मुक्ति कहैं पावै । परिहरि साँच झूठ निज धावै ॥ अनल ज्योति डाहे यक संगा । नयन नेह जस जरे पतंगा ॥ करहु विचार जेहि दुख जाई । परि हरि झूठा केर सगाई ॥ लालच लागे जन्म सिराई । जग मरन नियरायल आई ॥

१ जप तीरथ पूजे व्रत भूता । दान औ पुण्य किये बहूता ॥