भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीररंथी-

सा०-भरमकी बांधा ई जगत, यहि विधि आवे जाय । मानुष जन्महिं पाय नर, काहेको जहँडाय ॥२३॥

रमैनी चौबीसवीं २४ ॥

चन्द चकोर अस बात जनाई । मानुष बुद्धि दीन पलटाई ॥ चारि अवस्था सपना कहई । झूठो फुरे जानत रहई ॥ मिथ्या बात न जाने कोई । यही विधि सिगरे गैल विगोई ॥ आगे दैदै सबन गँवाया । मानुष बुद्धि न स्वपनेहु पाया ॥ चौतिस अक्षर सो निकले जोई । पाप पुण्य जानेगा सोई ॥

सा०-सोइ कहंते सोइ होहुगे, निकरि न बाहर आव । हो हजूर ठाढे कहौं, कयों धोखे जन्म गवाव ॥२४॥

रमैनी पचीसवीं २५ ॥

चौतिस अक्षरका यही विशेषा । सहसरो नाम यहीमें देखा ॥ भूलि भटक नर फिर घट आयो । होय अजान सो सभन गँवायो ॥ खोजहिं ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । अनंत लोक खोजहिं शिव भगती ॥ खोजहिं गण गंधर्व सुनि देवा । अनंत लोक खोजहिं बहु भेवा ॥

सा०-यती सती सब खोजहीं, मनै न मानै हार । बड़े बड़े बीर बाँचे नहीं, कहहिं कवीर पुकार ॥२५॥

रमैनी छब्बीसवीं ॥ २६ ॥

आपुहि कर्तारा भय करतारा । ( कुलाला ) बहु विधि वासन गढे कुम्हारा ॥ विधिना सबै कीन यक ठाऊँ । अनेक यतनके बनक बनाऊँ ॥ जठर अग्नि मह दिये प्रजाली । तामहँ आपु भये प्रतिपाली ॥ बहुत यतनके बाहर आया । तब शिवशक्ती नाम घराया ॥ घरका सुत जो होय अयाना । ताके संग न जाहि सयाना ॥ साँची बात कहौं मैं अपनी । भया दिवाना औरकी सपनी ॥ गुप्त प्रगट है एके सुदरा । काको कहिये ब्राह्मण सुदरा ॥ झूठे गर्व भूलौ मति कोई । हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ॥