भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४७१)

सा०-जिन्ह यह चित्र बनाइया, साँचा सो सूत्रधार । कह कवीर ते जन भले, चित्रवंतहि लेहि विचार ॥ २६ ॥

रमनी सताईसवीं २७ ॥

ब्रह्माको दीन्हो ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पुहुमी नौ खण्डा ॥ सत्य सत्य कहि विष्णु दृढाई । तीन लोक मई राखिनि जाई ॥ लिंग रूप तब शंकर कीन्हहा । धरती कील रसातल दीन्हहा ॥ तब अष्टंगी रची कुमारी । तीन लोक मोहा सब झारी ॥ दुतिया नाम पार्वती भयऊ । तप करता शंकरको दयऊ ॥ एकै पुरुष एक है नारी । ताते रचनि खानि भौ चारी ॥ शर्मन वर्मन देवो दासा । रज सत तम गुण धरणि अकाशा ॥ २७ ॥

सा०-एक अण्ड ओंकार ते, सब जग भयो पसार ।

कहहि कवीर सब नारिरामकी, अविचल पुरुष भतार ॥ २७ ॥

रमनी अठ्ठाईसवीं २८ ॥

अस जोलहाका मर्म न जाना । जिन जग आइ पसारल ताना ॥ धरति अकाश दोऊ गाड बनाई । चंद्र सूर दुइ नरा भराई ॥ सहस तार लै पूरिन पूरी । अजहू विनय कठिन है दूरी ॥ कहहि कवीर करम सों जोरी । सूत कुसूत बिने भल कोरी ॥ २८ ॥

रमनी उन्तौसवीं २९ ॥

वज्रहुते त्रिन छनमें होई । त्रिने वज्र करै पुनि सोई ॥ निझरू नरू जानि परिहरई । कर्मक बांधा लालच करई ॥ कर्म धर्म बुद्धि मति परिहरिया । झूठा नाम साँचलै धरिया ॥ रजगति त्रिविधि कीन्ह परगासा । कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ॥ रविके उदय तारा भौ छीना । चर बेहर दोनोमें लीना ॥ विषके खाये विष नहिं जावै । गारुड सो जो मरत जिआवै ॥

सा०-अलख जो लागी पलकमें, पलकहिमें ढसि जाय ।

विषहर मंत्र न मानई, गारुड काह कराय ॥ २९ ॥