कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(४७२)
कवीरपंथी—
रमैनी तीसवीं ॥ ३० ॥
औ भूले षष्ठ दरशन भाई । पाखण्ड भेष रहा लपटाई ॥ जीव शीवका आयन सोना । चांरिउ वेद चतुर्गुण मौना ॥ जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देव घर आना ॥ दवना मरूआ चम्पा फूला । मानो जीव कोटि समतूला ॥ औ पृथ्वीको रोम उचारे । देखत जन्म आपनो हारे ॥ मनमथ बिंदु करे असरारा । कलपे बिन्दु खसैं नहिं द्वारा ॥ ताका हाल होय अघकूचा । छौ दरसनमें जैन विगूचा ॥
सा०—ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि । जो जाने तेहि निकट है, रह्यो सकल घट पूरि ॥३०॥
रमैनी इकतीसवीं ३१ ॥
सुम्रिति आहि गुणनको चीन्हा । पाप पुण्यको मारग लीन्हा ॥ सुम्रिति वेद पढै असरारा । पाखण्ड रूप करै हंकारा ॥ पढै वेद ओ करै बड़ाई । संशय गांठि अजहुं नहिं जाई ॥ पढिकै शास्त्र जीव बध करई । मूढ़ि काटि अगमनकै धरई ॥
सा०—कहहि कवीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ।
अनुभव भाव न दर्शई, जियत न आपु लखाय ॥३१॥
रमैनी बत्तीसवीं ॥ ३२ ॥
अंध सो दर्पण वेद पुराना । दरबी कहा महारस जाना ॥ जस खर चंदन लादे भारा । परिमल बास न जानु गँवारा ॥ कहहि कवीर खोजै अस्माना । सो न मिला जो जाय अभिमाना ॥३२॥
रमैनी तैतीसवीं ॥ ३३ ॥
वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि करि लेतै आई ॥ आपुहि बरी आपु गर बन्धा । झूठी मोह कालको धंधा ॥ बंधवत बंधा छोरि नहिं जाई । विषय स्वरूप भूलि दुनियाई ॥ हमरे लखत
१ चारोबद्ध चतुर्गुण मौना ।