कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(४७२)
कवीरपंथी—
रमैनी तीसवीं ॥ ३० ॥
औ भूले षष्ठ दरशन भाई । पाखण्ड भेष रहा लपटाई ॥ जीव शीवका आयन सोना । चांरिउ वेद चतुर्गुण मौना ॥ जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देव घर आना ॥ दवना मरूआ चम्पा फूला । मानो जीव कोटि समतूला ॥ औ पृथ्वीको रोम उचारे । देखत जन्म आपनो हारे ॥ मनमथ बिंदु करे असरारा । कलपे बिन्दु खसैं नहिं द्वारा ॥ ताका हाल होय अघकूचा । छौ दरसनमें जैन विगूचा ॥
सा०—ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि । जो जाने तेहि निकट है, रह्यो सकल घट पूरि ॥३०॥
रमैनी इकतीसवीं ३१ ॥
सुम्रिति आहि गुणनको चीन्हा । पाप पुण्यको मारग लीन्हा ॥ सुम्रिति वेद पढै असरारा । पाखण्ड रूप करै हंकारा ॥ पढै वेद ओ करै बड़ाई । संशय गांठि अजहुं नहिं जाई ॥ पढिकै शास्त्र जीव बध करई । मूढ़ि काटि अगमनकै धरई ॥
सा०—कहहि कवीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ।
अनुभव भाव न दर्शई, जियत न आपु लखाय ॥३१॥
रमैनी बत्तीसवीं ॥ ३२ ॥
अंध सो दर्पण वेद पुराना । दरबी कहा महारस जाना ॥ जस खर चंदन लादे भारा । परिमल बास न जानु गँवारा ॥ कहहि कवीर खोजै अस्माना । सो न मिला जो जाय अभिमाना ॥३२॥
रमैनी तैतीसवीं ॥ ३३ ॥
वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि करि लेतै आई ॥ आपुहि बरी आपु गर बन्धा । झूठी मोह कालको धंधा ॥ बंधवत बंधा छोरि नहिं जाई । विषय स्वरूप भूलि दुनियाई ॥ हमरे लखत
१ चारोबद्ध चतुर्गुण मौना ।
शब्दावली
(४७३)
सकल जग लूटा । दास कवीर राम कहि छूटा ॥
सा०-रामहि राम पुकारते, जिभ्या परिगौ रौम ।
मुधाजल पीवे नहीं, खोद पियनकी होस ॥ ३३ ॥
रमैनी चौतीसवीं ३४ ॥
पढि पढि पंडित करहु चतुराई । निज सुक्तिहि मोहि कहु समुझाई ॥ कहां बसे पुरुष कवन सो गाऊँ । सो मोहि पण्डित सुनावहु नाऊँ ॥ चारि वेद ब्रह्मे निज ठाना । सुक्तिक मर्म उन्हीं नहि जाना ॥ दान पुत्र उन बहुत बखाना । अपने मरनकी खबरि न जाना ॥ एक नाम है अगम गँभीरा । तहवाँ अस्थिर दास कवीरा ॥
सा०-चिउटी जहां न चढि सके, राई नहि ठहराय ।
आवागमनकी गम नहीं, तहँ सकलो जग जाय ॥ ३४ ॥
रमैनी पैंतीसवीं ३५ ॥
पंडित भूले पढि गुणि वेदा । आपु अपनपौ जानु न भेदा ॥ संध्या तर्पण औ षट कर्मा । ई बहु रूप करहि अस धर्मा ॥ गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय सुक्ति किन पाई ॥ औरके छुये लेतहौ सींचा । तुमते कहहु कौन है नीचा ॥ ई गुण गर्व करो अधिकाई । अतिके गर्ब न होय भलाई ॥ जासु नाम है गर्व प्रहारी । सो कस गर्वहि सके संहारी ॥
सा०-कुल मर्यादा खोइकै, खोजिनि पद निर्वान ।
अंकुर बीज नशाइकै, भये विदेही थान ॥ ३६ ॥
रमैनी छत्तीसवीं ३६ ॥
ज्ञानी चतुर विचच्छण लोई । एक स्यान स्यान न होई ॥ दूसर स्यानको मर्म न जाना । उत्पति परलय रैनि विहाना ॥ बानिज एक सबन मिलि ठाना । नेम धर्म संजम भगवाना ॥ हरि अस ठाकुर तज्यो न जाई । बालन भिस्ति गांव दुलहाई ॥
( ४७४ )
कवीरपंथी-
सा०-ते नर मरिके कहाँ गये, जिन दिन्हा गुर घोटि । राम नाम निज जानिकै, छाडहु बस्तू खोटि ॥३६॥
रमनी संतोषवी ३७ ॥
एक सयान सयान न होई । दूसर स्यान न जाने कोई ॥ तीसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहाँ ले जाई ॥ पँचये सयान न जाने कोई । छठये महाँ सब गये विगोई ॥ सतये सयान जो जानहु भाई । लोक वेदमें देहु देखाई ॥
सा०-बीजक बतावै बितको, जो बित गुता होय । शब्द बतावै जीवको, बूझे विरला होय ॥३७॥
रमनी अदतीसवी ३८ ॥
यहि विधि कहाँ कहा नहि माना । मार्ग मांहि पसारिनि ताना ॥ राति दिवस मिलि जोरिनि तागा । ओटत कातत भर्म न भागा ॥ भर्म सब घट रह्यो समाई । भर्म छाडि कतहुँ नहिं जाई ॥ परै न पूरि दिनौ दिन छीना । तहाँ जाय जहाँ अंग विहीना ॥ जो मति आदि अन्त चलि आया । सो मति उन सब प्रगट सुनाया ॥
सा०-वहै संदेश फुर मानिकै, लीन्हो सीस चढाय । संतो है संतोष सुख, रहहु हृदय जुडाय ॥३८॥
रमनी उत्तालीसवी ३९ ॥
जिन्ह कलमां कलि माह पढाया । कुदरत खोज तिन्हुँ नहिं पाया ॥ करमत कर्म करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥ करमत सो जो गर्भ औतरिया । करंमत सो निमाज गुजरिया ॥ करमत सुन्नति और जनेऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥
सा०-पानी पवन संजोयकै, राचयाई उत्पात । शून्यहि सुरति समानिया, कासों कहिये जात ॥३९॥
१ करमत सो जो नामहि धरिया ।
शब्दावली
(४७५)
रमैनी चालीसवीं ४० ॥
आदम आदि सुद्धि नहिं पाईं । मामा हउआ कहांते आईं ॥ तब नहिं होते तुरुक औ हिन्दू । मायाके रुधिर पिताके बिन्दू ॥ तब नहिं होते गाय कसाई । तब विस मिल्लाः किन फरमाईं ॥ तब नहिं रह्यो कुल औ जाती । दोजरव भिस्त कहां उतपाती ॥ मन मसलेकी खबरि न जाने । मति मुलान दोइ दीन बखाने ॥
सा०-संयोगेका गुण रवे, विन योगे गुण जाय ।
जिभ्या स्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥ ४० ॥
रमैनी इकतालीसवीं ४१ ॥
अम्की रासि ससुद्रकी खाई । रवि मसि कोटि तैंतीसौ भाई ॥ भैवर जालमें आसन माडा । चाहत सुख दुख संग न छाडा ॥ दुखको मर्म काहु नहिं पाया । बहुत भांतिके जग भर्माया ॥ ( बौराया ) ॥ आपुहि बाउर आपु सयाना । हृदय बसत राम नहिं जाना ॥
सा०-तेई हरि तेइ ठाकुरा, तेई हरिके दास ।
न जम भया न जामनी, भामिनी चली निरास ॥ ४१ ॥
रमैनी बयालीसवीं ४२ ॥
जब हम रहल रहा नहिं कोई । हमरे माँहिं रहल सब कोई ॥ कहहु हो राम कौन तोरि सेवा । सो ससुझाय कहौ मोहि देवा ॥ फुर फुर कहउँ मारु सब कोई । झूठेहि झूठा संगति होई ॥ आंधर कहे सबै हम देखा । तहें दिठियार बैठि सुख पेखा ॥ यहि विधि कहौ मालु जो कोई । जस सुख तस जो हृदया होई ॥ कहहि कवीर हंस मुसकाई । हँमरे कहल दुष्ट बहु भाई ॥ ४२ ॥
रमैनी तैंतालसीवीं ॥ ४३ ॥
जिन्ह जिव कीन्ह आपु विश्वासा । नरक गये ते नरकहिं बासा ॥ आवत जात न लागहि बारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥
१ मुस्ताई । २ हमरे कहल छुठिही भाई ।
( ४७६ )
कवीरपंथी—
चौदह विद्या पढि समुझावै । अपने मरनकी खबर न पावै ॥ जाने जिवको परा अंदेसा । झूठहि आनिकै कहा संदेसा ॥ संगति छोडि करै अस रागा । उब है मोट नरक कर भारा ॥ ४३ ॥
सा०—गुरु द्रोही औ मन सुखी, नारि पुरुष विचार ।
ते नर चौरासी अप्रि है, जौलौ शशि दिनकार ॥ ४३ ॥
रमैनी चौवालीसवी ॥ ४४ ॥
कबहुँ न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ बहुरि न पैहौ ऐसो थाना । साधु संग तुम नहिं पहिचाना ॥ अब तोर होइ नरकमें बासा । निस्त्र दिन बसे लबारके पास ॥ ४४ ॥
सा०—जात सबन कहैं देखिया, कहहिं कवीर पुकार ।
चेतवाहोहु तो चेतिले, दिवस परत है धार ॥ ४४ ॥
रमैनी पैतालीसवी ॥ ४५ ॥
हिरण्यकुश रावण गौ कंसा । कृष्ण गये सुर नर मुनि बंसा ॥ ब्रह्मा गये मरम नहिं जाना । बड सब गये जो रहे सयाना ॥ समुझि परी नहिं राम कहानी । निरबक दूध कि सरबक पानी ॥ रहिगौ पंथ थकित भौ पवना । दशो दिशा उजारि भौ गवना ॥ मीन जाल भौ इ संसारा । लोहकि नाव पषानको भारा ॥ खेवे सबै मरम नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥ ४५ ॥
सा०—मछरी मुख जस केंचुवा, मुखवन मुँह गिरदान ।
सर्पन मुँह गहेजुवा, जात सबनको जान ॥ ४५ ॥
रमैनी छयालीसवी ॥ ४६ ॥
विनसै नाग गरुड गलि जाई । विनसै कपटी औ सतभाई ॥ विनसे पाप पुण्य जिन्ह कीन्हा । विनसे गुन निर्गुन जिन चीन्हा ॥ विनसे अग्नि पवन औ पानी । विनसे सूछि कहाँ लौ गानी ॥ विष्णु लोक विनसे छन माहीं । हौ देखा परलैकी छाँही ॥ ४६ ॥
सा०—मछ रूप माया भई, यमरा खेलै अहेर ।
इहिर ब्रह्म न उबरे, सर नर मुनि केहि केर ॥ ४६ ॥
शब्दावली
(४७७)
रमैनी संतालीसर्वो ॥ ४७ ॥
जरासिंधु शिशुपाल संहारा । सहस्राञ्जै छल सो मारा ॥ बड छल रावन सो गौ वीती । लंका रही कंचनकी भीती ॥ दुयोंधन अभिमानहिं गयऊ । पांडव केर मरम नहिं पयऊ ॥ मायाके दम्भ गैल सब राजा । उत्तम मध्यम बाजन बाजा ॥ छौ चकवे सब धरनि समाना । एको जीव परतीति न माना ॥ कहाँ लौ कहौ अचेते गयऊ । चेत अचेत झगर एक भयऊ ॥ ४७ ॥
सा०-ई माया जग मोहिनी, मोहिंसि सब जग धाय ।
हरिचंद्र सतके कारने, घर घर गये बिकाय ॥४७॥
रमैनी अडतालीसर्वो ॥ ४८ ॥
मानिक पुरहि कवीर बसेरी । महति सुनी शेख तक्रि केरी ॥ ऊजे सुनी जमन पुर धामा । झूसी सुनी पिरनको नामा ॥ इकइस पीर लिखै तेहि ठामा । खतमा पढै पैगम्बर नामा ॥ सुनी बोल मोहि रहा न जाई । देखि सुकरवा रहे भुलाई ॥ हवीव औ नबीको कामा । जहांलों अमल सो सबै हरामा ॥ ४८ ॥
सा०-शेख अकरदी शेख सकरदी, मानो बचन हमार ।
आदि अन्त औ जुगहि जुग देखहु दृष्टि पसार ॥४८॥
रमैनी उन्चासर्वो ॥ ४९ ॥
दूरकी बात कहौ दवैसा । बादसाह है कौने भेसा ॥ कहाँ कूच कहां करे सुकामा । कौन सुरतिको करो सलामा ॥ मैं तोहि पूछों सुसलमाना । लाल जूद की नाना बाना ॥ काजी काज करो तुम कैसा । घर घर जवह करावौ भैसा ॥ बकरी मुर्गी किन फुरमाया । किसके कहे तुम छूरी चलाया ॥ दर्द न जानै पीर कहावै । बैता पठि पठि जग भर्मावै ॥ कह कवीर यक सय्यद कहावै । आप सरीखा जग कबुलावै ॥ ४९ ॥
सा०-दिनभर रोजा रहत है, रात हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्यों कर खुशी खोदाय ॥ ४९ ॥
(४७८)
कबीरपंथी—
रमैनी पद्मासवी ५० ॥
कह इत मोहिं भयल जुग चारी । समझत नाहीं मोहि सुत नारी ॥ बंस आग लगी बंसै जरिया । अम भुलाय नर धंघे परि्या ॥ हस्तीके फन्दे हस्ती रहई । मृगीके फन्दे मृगा परई ॥ लोहै लोह काटु जस आना । तियाके तत्व तिया पहिचाना ॥५०॥
सा०—नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नारि ।
पुरुषहि पुरुषा जो रचे, ते बिरले संसार ॥ ५० ॥
रमैनी इत्यावनवी ॥ ५१ ॥
जाकर नाम अकहुआ भाई । ताकर कहा रमैनी गाई ॥ कहैको तातपर्य है ऐसा । जस पंथी वोहित चढि वैसा ॥ है कछु रहनि गहनिकी बाता । बैठा रहै चला पुनि जाता ॥ रहै बदन नहिं स्वांग सुभाऊ । मन अस्थिर नहिं बीलै काऊ ॥ ५१ ॥
सा०—तन रहते मन जात है, मन रहते तन जाय ।
तन मन एकै है रहै, हंस कवीर कहाय ॥ ५१ ॥
रमैनी वावनवी ५२ ॥
जेहि कारन शिव अजहुँ वियोगी । अंग बिभूति लायभै जोगी ॥ सेष सहस मुख पार न पावै । सो अब खसम सहित समुझावै ॥ ऐसी विधि जो मो कहँ धावै । छठयें मास दरस जो पावै ॥ कौनेहु भांति दिखाई देऊँ । गुप्तहि रहौं सुभाव सब लेऊँ ॥५२॥
सा०—कहहिं कवीर पुकारिके, सबका उहै हवाल ।
कहा हमार मानै नहीं, किमि छूटै भ्रमजाल ॥ ५२ ॥
रमैनी तिरपनवी ५३ ॥
महादेव मुनि अन्त न पाया । उमा सहित उन जन्म गंवाया ॥ उनहुते सिद्ध साधक होई । मन निश्चै कहु कैसे कोई ॥ जब लग तनयै आहै सोई । तब लग चेत न देखो कोई ॥ तब चेतिहो जब तजिहो प्राना । भया अन्त तब मन पछताना ॥ इतना सुनत निकट चलि आई । मनके विकार न छूटे भाई ॥
१ उनसे सिद्ध साधक नहिं कोई । मन निश्चय कहु कैसे होई ।
शब्दावली
(४७९)
सा०-तीनलोक मुआ कौआयके, छुटि न काहुकी आस । यक अंधरे जग खाइया, सब जग भया विनास ॥५३॥
रमनी चौवनवी ५४ ॥
मरिगो ब्रह्मा काशीके वासी । शिव सहित मुये अविनाशी ॥ मथुरा मरिगो कृष्ण गुवारा । मरि मरि गये दसो अवतारा ॥ मरि मरि गये भगति जिन ठानी । सर्गुण मां जिन दुर्गुण आनी ॥
सा०-नाथ मछंदर बांचे नहीं, गोरखदत्त औ व्यास ।
कहहि कवीर पुकारिके, परे कालके फांस ॥५४॥
रमनी पचपनवी ५५ ॥
गये राम औ गये लछमना । संग न गई सीता असधना ॥ जात कौरवन लागु न वारा । गये भोज जिन्ह साजल धारा ॥ गये पांडव कुंतीसी रानी । गये सहदेव जिन्ह बुद्धि मति ठानी ॥ सर्व सोनकी लंक बनाई (उठाई) । चलत बार कछु संग न लाई ॥ कुरिया जासु अंतरिक्ष छाई । सो हरिश्चन्द्र देखि नहीं जाई ॥ मूरख मानुष अधिक सँजोवै । अपने सुवल और लगि रोवै ॥ ई न जाने अपनो मरि जैवे । टकादश विठै और ले खेवै ॥
सा०-अपनी अपनी करिगये, लगी न काहुकी साथ ।
अपनी करिगये रावणा, अपनी दशरथ नाथ ॥५५॥
रमनी छप्पनवी ५६ ॥
दिन दिन जै जरलके पाऊ । गाड़े जाइ न उमगे काऊ ॥ कंध न देई मसखरी करई । करहु धौँ कौनि भांति निस्तरई ॥ अकरम करै करमको धावै । पठि गुनि वेद जगत समुझावै ॥ छूछे परे अकारथ जाई । कहैं कवीर चित चेतहु भाई ॥ ५६ ॥
रमनी सत्तावनवी ५७ ॥
कृतियासूत्र लोक यक अहई । लाख पचासकी आगे कहई ॥
१-तीन लोक मो आइके, छूटी न काहुकी आश ।
यक अंधार जग खाइया, सब जग भया निराश ॥
(४८०)
कबीरपंथी—
विद्या वेद पढे पुनि सोई । बचन कहत परतच्छे होई ॥ पहुँची बात विद्याकी वेता । वाहुके भर्म भयो संकेता ॥
सा०—खग खोजनको तुम परे, पीछे अगम अपार ।
बिन परचे किमि जानिहौ, झूठा है हंकार ॥६७॥
रमैनी अदृष्टावनी ५८ ॥
तै सुत मानु हमारी सेवा । तो कहैं राज देऊँ हो देवा ॥ अगम द्विगम गढ देहैं छुड़ाई । ओरो बात सुनहु कहु आई ॥ उत्पति परलै देउँ दिखाई । करहु राज सुख बिलसहु जाई ॥ एको बार होइहै बाँको । बहुरि जन्म न होइहै ताको ॥ जाय पाप हुइहैं सुख घाना । निश्चय बचन कबीरको माना ॥
सा०—साधु संत तेइ जना जिन, माना बचन हमार ।
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखहु दृष्टि पसार ॥६८॥
रमैनी उनसठवी ५९ ॥
चढ़त चढावत भंडहर फोरी । मन नहिं जनिको करि चोरी ॥ चोर एक मूसल संसारा । विरला जाने कोइ बूझन हारा ॥ स्वर्ग पताल भूमि लै बारी । एके राम सकल रखवारी ॥
सा०—पाहन है है सब गये, अन भितियनके चित्त ।
जासो किये भिताइया, सो धन भया न हित्त ॥६९॥
रमैनी साठवी ७० ॥
छाड़हु पति छाड़हु लबराई । मन अभिमान टूटि तब जाई ॥ जिनहले चोरि जो भिच्छा खाई । सो विरवा पलुहावन जाई ॥ पुनि संपति औ पतिको धावै । सो विरवा संसार लै आवै ॥
सा०—झूठ झूठ कै डारहु, मिथ्या यह संसार ।
तेहि कारण मैं कहत हौं, जाते होय उबार ॥ ६० ॥
१ पंटी बात विद्याकी पंदा ।
शब्दावली
(४८१)
रमनी यकसठबी ॥ ६१ ॥
धर्म कथा जो कहते रहई । लबरी नित उठि प्राते कहई ॥ लबरि विहाने लबरी संझा । एक लाबरि वस द्विदया मांझा ॥ रामहु केर मर्म नहि जाना । ले मति ठानी वेद पुराना ॥ वेदहु केर कहा नहि करई । जरते रहे मुस्त नहि परई ॥
सा०-गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ।
माटी तन माटी मिलो, पवनहि पवन समाय ॥ ६१ ॥
रमनी वासठबी ॥ ६२ ॥
जो तोहि करता बरण विचारा । जनमत तीन दण्ड अनुसारा ॥ जनमत शूद्र सुये पुनि शूद्रा । कृत्रिम जनेउ घालि जग दुंद्रा ॥ जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मणी जाये । और राह तुम काहे न आये ॥ जो तुम तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काहे न सुनति कराये ॥ कारी पीरी दूहौ गई । ताकर दूध देहु बिलगाई ॥ छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कवीर भजु शारंगपानी ॥ ६२ ॥
रमनी तिरसठबी ॥ ६३ ॥
नाना रूप बरण यक कीन्हा । चारि वरण वै काहु न चीन्हा ॥ नष्ट गये कर्ता नहि चीन्हा । नष्ट गये औरहि मन दीन्हा ॥ नष्ट गये जिन वेद बखाना । वेद पठै पै भेद न जाना ॥ विमल्लख करै नैन नहि सूझा । भौ अजान तब कछुव न बूझा ॥
सा०-नाना नाच नचाइके, नाचे नटके भेष ।
घटघटमें अविनाशी बसै, सुनहु तंकी तुम सेष ॥ ६३ ॥
रमनी चौसठबी ॥ ६४ ॥
काया कंचन जतन कराया । बहुत भांतिके मन पलटाया ॥ जो सौ बार कहौ समुझाई । तहिबो धरा छोडि नहि जाई ॥ जनके कहे जो जन रहि जाई । नव निधि सिधि तिन्ह पाई ॥ सदा धर्म तेहि द्विदया बसई । राम कसौटी कसते रहई ॥ जोरि कसावै अन्ते जाई । सो बाउर आपुहि बौराई ॥
कबीरपंथी शब्दावली १६
(४८२)
कवीरपंथी-
सा०-ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो सोच । जहां संत तहां संत सिधौवै, मिलिरहे पोचैपोच ॥६४॥
रमनी पैसठवीं ॥ ६५ ॥
अपने गुणके औगुण कहहू । इहै अभाग तुम न विचारहू ॥ तुम जियरा बहुते दुख पाया । जल बिनु मीन कवन सचुपाया ॥ चात्रिक जल हल भरे जो पासा । मेघ न बरसे चले उदासा ॥ स्वांग धरे भौसागर आसा । चात्रिक जल हल आसै पासा ॥ रामनाम अहै निज सारा । औरो झूठ सकल संसारा ॥ हरी उतंग तुम जात पतंगा । जम घर किये जीवको संगा ॥ किंचित है सपने निधि पाई । हिये न समाय कहैं धरे छिपाई ॥ हिय न समाय छोड़ि नहिं पारा । झूठा लोभ वै कछु न विचारा ॥ सप्ति किन्ह आपु नहीं माना । तरिवर छर छागर है जाना ॥ जिय दुर्मति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझे वार न पारा ॥
सा०-अन्ध भया सब डोलई, कोइ न करै विचार । कहौ हमार माने नहीं, किमि छूटै भर्म जार ॥६६॥
रमनी छाछठवीं ॥ ६६ ॥
सोई हीतु बंधु मोहि भावै । जात कुमारग मारग लावै ॥ सो सयान मारग रहि जाई । करे खोज कबहुँ न भुलाई ॥ सो झूँठा जो सुतके तजई । गुरुकी दया राम ( को ) भजई ॥ किंचित है यह जगत भुलाना । धन सुत देखि भया अभिमाना ॥
सा०-जियँ जो नेक पयान किय, मन्दिर भया उजार । मरे जे जियते मरि गये, बांचे बाचन हार ॥६६॥
रमनी सद्दसठवीं ॥ ६७ ॥
देह हलाय भक्ति न होई । स्वांग धरे बहुतै नर जोई ॥ धोंगा धींगी भलो न माना । जो काहू मोहि द्विदय न जाना ॥ सुख
१ हरिको भक्ति जाने बिना, भव बुदि मुग्धा संसार । २ किंचित है एक तेज भुलाना ।
३ दीन नख्ता किया पयाना, मंदिर भया उजार । मरि गया सो मरि गया, बांचे बाचन हार ॥
शब्दावली
(४८३)
किछु और हिदय कछु आना । सपनेहुँ कबहुँ मोहि न जाना ॥ ते दुख पावै यहि संसारा । जो चेतहु तो होय उबारा ॥ जो नर गुरुकी निंदा करई । सूकर स्वान जन्म सो धरई ॥
सा०-लख चौरासी जिव जंतुमें, भटकि भटकि दुख पाव । कहहि कवीर जो रामहि जाने, सो मोहिनीके भाव ॥६७॥
रमैनी वडसठवीं ६८ ॥
तेहि वियोगते भयउ अनाथा । परि निकुंज बन पाव न पाथा । वेदो नकल कहै जो जाने । जो सखुझै सो भलो न मानै ॥ नटैवत विद्या खेले जो जाने । तेहि गुणके ठाकुर भल मानै ॥ उहै जो खेले सब घट माहीं । दूसरको कछु लेखा नाही ॥ भलो पोच जो अवसर आवै । कैसंहुके जन पूरा पावै ॥
सा०-जेकरे शर लागे हिय, सो जानेगा पीर । लागे तो भागे नहीं, सुखसिंधु निहारु कवीर ॥६८॥
रमैनी उनहतरवीं ६९ ॥
ऐसा योग न देखा भाई । भूला फिरे लिये गाफिलाई ॥ महादेवको पंथ चलावै । ऐसो बडो महंत कहावै ॥ हाट बजारै लावै तारी । कबेसिधन माया प्यारी ॥ कब दत्ते मावासी तोरी । कब सुकदेव तोपची जोरी ॥ कब नारद बन्दूक चलाया । व्यास- देव कब बंब बजाया ॥ करहिं लड़ाई मतिके मंदा । ये है अतिथि कि तरकस बंदा ॥ भये बिरक्त लोभ मन ठाना । सोना पहिरि लजावै बाना ॥ घोरा घोरी कीन्ह बटोरा । गाव पाय जस चले करोरा ॥
१ लख चौरासी योनि जिव, भटकि २ दुख पावै ।
२ नटवर बन्द खेल जो जानै । ताकर गुण जो ठाकुर मानै ॥
३ कैसे कै जन पूरा पावै ।
(४८४)
कबीरपंथी—
सा०-तिय सुन्दरी न सोहई, सनकादिकके साथ । कबहुक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ६९ ॥
रमनी सत्तरवीं ७० ॥
बोलना कासो बोलिय रे भाई । बोलतही सब तत्व नशाई ॥ बोलत बोलत बाढु बिकारा । सो बोलिय जो परै विचारा ॥ मिलै जो संत वचन दुइ कहिये । मिलै असंत मौन है रहिये ॥ पंडित सो बोलिय हितकारी । मूरख सो रहिये झखमारी ॥ कहहि कबीर अथ घट डोलै । पूरा होय विचार लै बोले ॥७०॥
रमनी इकहत्तरवीं ७१ ॥
शोक बधावा सब करि माना । ताकी बात इन्द्र नहि जाना ॥ जटा तोरि पहिरावै सेली । योग युक्तिको गर्भ दुहेली ॥ उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चीन्ह मड़राई ॥ जैसे भिस्ति तैसी है नारी । राज पाट सब गने उजारी ॥ जस नर्क तस चंदन जाना । जस वाउर तस रहै स्याना ॥ लपसी लौंग गने यक सारा । खांडें छांडि मुख फांकै छारा ॥
सा०-यही विचार विचारते, गये बुद्धि बल चित ।
दुई मिलि एकै होय रहा, काहि लगाऊं हित ॥ ७१ ॥
रमनी बहत्तरवीं ७२ ॥
नारी एक संसारहि आई । माय न वाके बापहि जाई (बाप न जाई) ॥ गोड न मूंड़ न प्राण अधारा । जामै भरमि रहा संसारा ॥ दिना सात लो वाकी सही । बुध अथ बुध अचरज यक कही ॥ वाहिकि वंदन कर सब कोई । बुध अथबुध अचरज बड़ होई ॥
सा०-मूस बिलाई एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज एक देखो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥७२॥
१ खांडोपरी हरि फांकै छारा ।
शब्दावली
(४८५)
रमनी तिहत्तरवीं ७३ ॥
चली जात देखी यक नारी । तर गागरि ऊपर पनिहारी ॥ चली जात वह बाटहिं बाटा । सोवन हारके ऊपर खाटा ॥ जाइन मरे सुपेदी सौरी । खसम न चीन्है धरनि भई बौरी ॥ सांझ सकारै दिया ले बारे । खसमहिं छाडि सुमिरे लगवारै ॥ वाहिके संग निशिदिन रांची । पियासो बात कहै नहिं सांची ॥ सोवत छांड़ि चली पिय अपना । ई दुख अवधौं कहीं केहि सना ॥ सा०-आपनी जांच उधारिके अपनी कही न जाय ।
कि जाने चित आपना, की मेरो जन गाय ॥ ७३ ॥
रमनी चौहत्तरवीं ७४ ॥
तहिया गुप्त थूल नहिं काया । ताके सोग न ताके माया ॥ कमल पत्र तरंग यक माहीं । संगहि रहै लिप्त पै नाही ॥ आशा ओस अंडन महँ रहई । अगनित अंडन कोई कहई ॥ निराधार आधार लै जानी । रामनाम लै उचरी बानी ॥ धर्म कहै सब पानी अहई । जाती के मन बानी रहई ॥ ढोर पतंग सरे घरियारा । तेहि पानी सब करै अचारा ॥ फन्द छोडि जो बाहर होई । बहुरि पंथ नहिं जोहै सोई ॥
सा०-भर्मक बांधल ई जगत, कोई न करे विचार ।
हरिकी भगति जाने बिना, बूड़ि मुआ संसार ॥ ७४ ॥
रमनी पचहत्तरवीं ७५ ॥
तेहि साहबके लागहु साथ । दुइ दुख मेटिके होहु सनाथा ॥ दशरथ कुल अवतारि नहिं आया । नहिं लंकाके राव सताया ॥ नहिं देवकीके गर्भहिं आया । नहिं यशोदा गोद खेलाया ॥ पृथ्वी रमन दमन नहिं करिया । पैठि पताल नहिं बलि छलिया ॥ नहिं बलि राय सो माडी रारी । नहिं हिरण्यकुश बधल पछारी ॥ बाराह रूप धरणी नहिं धरिया । क्षत्री मारि निक्षत्र न करिया ॥
(४८६)
कवीरपंथी—
नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया । नहिं ग्वाल संग वन २ फिरिया ॥ गंडकी सालिग्राम नहिं सीला । मत्स्य कच्छ होय नहिं जल हीला ॥ द्वारावती सरीर नहिं छाडा । लै जगन्नाथ पिंड नहिं गाडा ॥ सा०—कहहि कवीर पुकारिके, वा पन्यै मति भूल । जेहि राखे अनुमान करि, शूल नहीं अस्थूल ॥७५॥
रमैनी छिहत्तरवीं ७६ ॥
माया मोह कठिन संसारा । यहै विचार न काहु विचारा ॥ माया मोह कठिन है फन्दा । होय विवेकी सो जन बन्दा ॥ राम नाम लै बेरा धारा । सो तो लै संसारहि पारा ॥ सा०—राम नाम अति दुर्लभै, औरै ते नहिं काम । आदि अंत और जुग जुगै, रामहिसे संग्राम ॥७६॥
रमैनी सतहत्तरवीं ७७ ॥
एकै काल सकल संसारा । एकै नाम है जगत् पियारा ॥ तिया पुरुष कछु कथो न जाई । सर्व रूप जग रहा समाई ॥ रूप अरूप जाय नहिं बोली । हलका गरुआ जाय न तोली ॥ भूख न त्रिषा धूप नहिं छाहीं । दुख सुख रहित रहै तेहि माहीं ॥ सा०—अपरम परम रूप मगुरंगी, रूप निहपन ताहि । बहुत ध्यानके खोजिया, नहिं तेहि संख्या आहि ॥७७॥ अपरम परम रूप मगु रंगी, नहिं तेहि संख्या आहि । कहहि कवीर पुकारि के, अदभुत कहिये ताहि ॥
रमैनी अठहत्तरवीं ७८ ॥
मानुष जन्म चूके अपराधी । यही तन केर बहुत है उपाधी ॥ तात जननि कहै हमरो बाला । स्वारथ जानि कीन्ह प्रतिपाला ॥ कामिनी कहै मोर पिय आही । बाचिनि रूप ग्रासे चाही ॥ पुत्र कलत्र रहै लव लाई । जम्बुक नाई रहै सैह बाई ॥ काग गीध दोउ मरन विचारै । सूकर स्वान दोउ पंथ निहारै ॥ अग्नि कहै मैं
शब्दावली
(४८७)
ई तन जारों ॥ सो न कहै जो जरत उबारौ । धरती कहै मोहिं मिलि जाई । पवन कहै मैं लेउं उड़ाई ॥ जेहि घरको घर कहैं गंवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ सो तन तुम आपन के जानी । विषय स्वरूप भूले अज्ञानी ॥
सा०-इतने तनके साझिया, जन्मो भरि दुख पाय ।
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ ७८ ॥
रसैनी उमासिनी ७९ ॥
बढवत बाढ़ि घटावत छोटी । परखत खरी परखावत खोटी ॥ केतिक कहौ कहाँ लों कही । औरो कहौं परे जो सही । कहे बिना मोहिं रहो न जाई । विरहिनि ले ले क्रूर खाई ॥ साखी-खाते खाते जुग गया, अजहूँ न चेतो आय ।
कहहि कवीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ७९ ॥
रसैनी अस्तिनी ८० ॥
बहुतक साहस करि जिय अपना । सो साहेबसे भेट न सपना ॥ खरा खोट जिन नहिं परखाया । चाहत लाभ सो मूर गवांया ॥ समुझि न परै पातरी मोटी । आछी गाढी सब भौ खोटी ॥ कहहि कवीर केहि देहौ खोरी । जब चलिहौ झिन आशा तोरी ॥ ८० ॥
रसैनी इत्यासिनी ८१ ॥
देव चरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नसाई ॥ दूजे सुनी मंदोदरि तारा । जेहि घर जेठ सदा लगवारा ॥ सुरपति जाय अहिल्यहिं छलिया । सुर गुरु धरनि चन्द्रमा हरिया ॥ कहैं कवीर हरिके गुण गाया । कुंती कारण कुंवारिहि जाया ॥ ८१ ॥
रसैनी व्यासवी ८२ ॥
सुखके वृक्ष एक जगत उपाया । समुझि न परी विषय कछु माया ॥ छौ छत्री पत्री जुग चारी । फल द्वै पाप पुत्र अधिकारी ॥ स्वाद अनन्त कछु बरनि न जाई । करि चरित्र सो ताहि समाई ॥ नट वट साज साजिया साजी । सो खेलै सो देखै वाजी ॥ मोहा
(४८८)
कवीरपंथी—
वपुरा जुगति न देखा । शिव शक्ती विरंचि नहिं पेखा ॥ सा०-परदे परदे चलिया, समुझि परी नहिं बानि । जो जाने सो बांचिहै, होत सकलकी हानि ॥ ८२ ॥
रमैनी निरासीवी ८३ ॥
छत्री करै छत्रिया धर्मा । वाके बढै सवाई कर्मा ॥ जिन अवधू गुरु ज्ञान लखाया । ताकर मन तहैंदैं लै धाया ॥ छत्री सो जो कुटुम्ब सो जूझै । पांचो मेटि एक करि बूझै ॥ जीवहि मारि जीव प्रतिपालै । देखत जन्म आपनो घालै ॥ हालै करै निशाने धाऊ । जूझि परे तहां मनमत राऊ ॥
सा०-मनमत मरे न जीवई, जीवहि मरन न होय । शून्य सनेही राम बिन, चले अपन पौ खोय ॥ ८३ ॥
रमैनी चौरासिनी ८४ ॥
ऐ जिय आपन दुखहि संभार । जेहि दुख व्यापिरहो संसार ॥ माया मोह बंधा सब लोई । अल्पै लाभ मूल गो खोई ॥ मोर तोर में सबै विगुता । जननि उदर गर्भ मई सूता ॥ ई बहु रूप खेलै बहु बूता । जन भौरा अस गये बहुता ॥ उपजि विनसि फिर जोनी आवै । सुखको लेश सपनेहुं नहिं पावै ॥ दुख संताप कष्ट बहु पावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ॥ मोर तोरमें जर जग सारा । ध्रिंग स्वारथ झूठा हंकारा ॥ झूठो आश रहा जग लागी । इन्हते भागि बहुरि पुनि आगी ॥ जे हितकै राखे सब लोई । सो सयान वाचा नहिं कोई ॥
सा०-आपु आपु चेतै नहीं, कहो तो रूसावा होय ।
कहै कवीर जो आपु न जागे, निरास्ति अस्ति न कोय ॥ ८४ ॥
इति रमैनी मूल बीजकको संपूर्ण ॥
१ धृग जीवन झूठी संसारा ।
२ आपु आप चेतै नहीं कहो तो रिसहा होय ।
कहै कबीर सपने जगें निरास्ति अस्ति नहिं कोय ॥
शब्दावली
(४८९)
निरख परमोधकी ।
रमैनी १ ।
अमर लोकते हम चलि आवा । तीन लोक जम लूटत पावा ॥ जम लूटे जिवको नासे । दसौ दिसा सबहुनको फाँसे ॥ १ ॥ सुर- नर असुर कोई नहिं बाँचे । बहु विधि भेष धरे धर नाचे ॥ जने तीन परपंची देवा । उनहु न जान्यो जमको भेवा ॥ २ ॥ गरभ वासमें रहे भुलाई । अगम पन्थ जानो नहिं जाई ॥ ब्रह्मा वेद पढै अधिकाई । वरण चारि मिलि बांध दिढाई ॥ ३ ॥ विरन्त आपन पंथ चलावा । अविगत मरम काहु नहिं पावा ॥ त्रिपु- रारी आसन आरंभा । तीनों मिलकर आसन थंभा ॥ ४ ॥ सो पारखंड षटदर्शन भूले । फिर फिर जोइनि संकट झूले ॥ करै डिंभ जो मूल गमावे । धोखेई धोखे डहकावे ॥ ५ ॥ एक न पूजे देई देवा । बोल झूठ बूढे यह खेवा ॥ एक न चण्डी मन चित लावा । स्वारथ काजे जीव हतावा ॥ ६ ॥ एक न तीरथ वरत फल ताका । कहैं विराने आगम भाखा ॥ एक बरतकी आशा लाई । औसर हमको होइ सहाई ॥ ७ ॥ एक दान पुन सर्वस देहीं । जीवन जन्म सुफल करि लेहीं ॥ ऐसे करि करि सब जग बन्धा । जस संपुटमें लै कुछ रन्धा ॥ ८ ॥ कहा हमार न कोई मानै । मनुष एक हमहूँको जानै ॥ मनुष रूप होय हम दिखलावा । बहुत भाँति कर नर समुझावा ॥ तऊं न अन्ध मोहि पतियावा । धाई धाई जस उन विष खावा ॥ ९ ॥ खसम न चीन्हे मूढ गवाँरा । हारे ठोकै माथ लिलारा ॥ १० ॥ झूठ नात सबही मन माना । साँच बातकी निन्दा आना ॥ हंस होइ सो मुहि पतिआई । और न मुहि पतिआवे भाई ॥ ११ ॥ तज कुल कानि करे उजियारा । यह तो मता कालको मारा ॥ जुग जुग आजं कह समझाऊं ।
(४९०)
कवीरपंथी-
जो मानै तिहिं लोक पठाऊं ॥१२॥ अजहुं कहुं जो कोई माने । अच्छर माहिं मोहि पहिचाने ॥ जिहि घट अच्छर होय हमारा । सो ठठ खोजै आप विचारा ॥१३॥ अच्छर यहैमें कहुं विचारा । जो कोई बूझे आन सवारा ॥ अच्छर की प्रतीत कराई । आन उपाय छाडिदे भाई ॥१४॥ अच्छर मध्ये बास हमारा । जो कोई बूझे आन सवारा ॥ आन उपाय विज्ञानी होई । अच्छर विना न छूटे कोई ॥१५॥
सा०-कहैं कवीर सब हंस से, कुल टूटे ते हंस ।
तिनसे हमसे भेद नहीं, काटे जमके फंस ॥ १ ॥
रवैनी २ ।
मोर कहा कोई विरले माना । सत्य लोकको दीन पयाना । सत्यलोक सत्यहिते भयउ । जुरा मरण कागज गल गयउ ॥१६॥ जुरा मरण रहित घर पावा । जिन माना मोर ससुझावा ॥ और न कोई समझावन हारा । और न कोई राखन हारा ॥१७॥ सो का राखे आपुहि भूले । आपुहि बानी संकट झूले ॥ आपुहि झूले और झुलावे । आपा माड़ सबन डहकावे ॥ १८ ॥ हमहुं से जो आपा माड़े । उलट चोर कोतवाले ढाँड़े ॥ जस नट विद्या नटवे चीन्हा । रात दिवस जिव पालन कीन्हा ॥ १९ ॥ बहुतक बृक्ष जो लाय दिखाये । तिसके फल सब तोड चखाये ॥ काहूको सन्तोष न भयउ । खाली दिखाय और कछु लयउ ॥२०॥ अस लालच जुग जुग चलआवा । लालच आगे जीव गवाँया ॥ अम्सर घर को कोई न धावे । करामतकी सेवा लावे ॥२१॥ एक कहे संपत मैं पाई । मान बढ़ाई बहुत दिटाई । एक कहे फुर शब्द हमारा । जोरे कहैं सो होय सवारा ॥ २२ ॥ इन बातन बूझे बड़ ज्ञानी । एक कहे जो सिद्ध कहानी ॥ सिद्ध कहानी अंजुली पानी । घट
शब्दावली
(४९१)
छूटे की काहु न जानी ॥ २३ ॥ घटकी किया रहनि रहाई । कालहुते तिनहु डहकाई ॥
सा०-बन्दिछोर मम शब्द है, काटे जमके बन्द ॥ लैराखे सतलोकमें, चले काल कटि फन्द ॥ २ ॥ ऐसे कारजको शब्द है, जो तोड़े कुलकान ॥ लै राखे सतलोकमें, करै शब्द पहि- चान ॥ ३ ॥ शब्द हमारा जो लहै, चले न जमका जोर ॥ काले मारे छय करै, हंसा पहुँचै ओर ॥ ४ ॥ सतलोकमें पहुँ- चिया, अमरित भोजन पाइ ॥ जोग जुगंतर रम रहै, कहैं कवीर समझाइ ॥ ५ ॥
रमैनी-यह दुनिया झूठे रंगराची । झूठौ उपाई करे कर नाची ॥ २४ ॥ झूठेसे परतीत कराई । ताते सृष्टी काल सुख जाई ॥ कालक काहु मरम न पावा । काल सबन मिल खसम दिठावा ॥ २५ ॥ काल रूप बरते घट मांही । काल लगन नर आवै जाहीं ॥ काल सबनपै भेष धरावै । कालक दीन सिमरफल पावै ॥ २६ ॥ सो फल चाखै हुआ उड़ावे । हाथ पिछौरै शीश डुलावै ॥ सेवा कर पंछी पछताई । ऐसे जीव काल सुख जाई ॥ २७ ॥ अस जिन जानौ पंछि भुलाना । जनम हार जग जिय पछताना ॥ शब्द हमारे जो फल होई । सो फल कालसु माँगौ लौई ॥ २८ ॥ कहौ काल कहाँते देई । नंगक आस धोवि का लेई ॥ ऐसे कर कर जग डहकावा । जैसे आगी वनधौं लावा ॥ २९ ॥ अस इन लोगन घर मत कीना । घरके मते अपन पौं लीना ॥ जैसे नाद सो भ्रिग भुलाई । समुझे नहीं पारधि दुखदाई ॥ ३० ॥ नाद सुनाइ प्रान हत कीनौ । ऐसे काल जीव हत कीनौ ॥ ज्यों जल मध्ये मीन रहाई । निसवासर आपनौ भछ खाई ॥ ३१ ॥ तहाँ पारधी बंशी लाई । गेंडुआ चार तहाँ लटकाई ॥ मीन न