भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया । नहिं ग्वाल संग वन २ फिरिया ॥ गंडकी सालिग्राम नहिं सीला । मत्स्य कच्छ होय नहिं जल हीला ॥ द्वारावती सरीर नहिं छाडा । लै जगन्नाथ पिंड नहिं गाडा ॥ सा०—कहहि कवीर पुकारिके, वा पन्यै मति भूल । जेहि राखे अनुमान करि, शूल नहीं अस्थूल ॥७५॥

रमैनी छिहत्तरवीं ७६ ॥

माया मोह कठिन संसारा । यहै विचार न काहु विचारा ॥ माया मोह कठिन है फन्दा । होय विवेकी सो जन बन्दा ॥ राम नाम लै बेरा धारा । सो तो लै संसारहि पारा ॥ सा०—राम नाम अति दुर्लभै, औरै ते नहिं काम । आदि अंत और जुग जुगै, रामहिसे संग्राम ॥७६॥

रमैनी सतहत्तरवीं ७७ ॥

एकै काल सकल संसारा । एकै नाम है जगत् पियारा ॥ तिया पुरुष कछु कथो न जाई । सर्व रूप जग रहा समाई ॥ रूप अरूप जाय नहिं बोली । हलका गरुआ जाय न तोली ॥ भूख न त्रिषा धूप नहिं छाहीं । दुख सुख रहित रहै तेहि माहीं ॥ सा०—अपरम परम रूप मगुरंगी, रूप निहपन ताहि । बहुत ध्यानके खोजिया, नहिं तेहि संख्या आहि ॥७७॥ अपरम परम रूप मगु रंगी, नहिं तेहि संख्या आहि । कहहि कवीर पुकारि के, अदभुत कहिये ताहि ॥

रमैनी अठहत्तरवीं ७८ ॥

मानुष जन्म चूके अपराधी । यही तन केर बहुत है उपाधी ॥ तात जननि कहै हमरो बाला । स्वारथ जानि कीन्ह प्रतिपाला ॥ कामिनी कहै मोर पिय आही । बाचिनि रूप ग्रासे चाही ॥ पुत्र कलत्र रहै लव लाई । जम्बुक नाई रहै सैह बाई ॥ काग गीध दोउ मरन विचारै । सूकर स्वान दोउ पंथ निहारै ॥ अग्नि कहै मैं

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