भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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रमनी तिहत्तरवीं ७३ ॥

चली जात देखी यक नारी । तर गागरि ऊपर पनिहारी ॥ चली जात वह बाटहिं बाटा । सोवन हारके ऊपर खाटा ॥ जाइन मरे सुपेदी सौरी । खसम न चीन्है धरनि भई बौरी ॥ सांझ सकारै दिया ले बारे । खसमहिं छाडि सुमिरे लगवारै ॥ वाहिके संग निशिदिन रांची । पियासो बात कहै नहिं सांची ॥ सोवत छांड़ि चली पिय अपना । ई दुख अवधौं कहीं केहि सना ॥ सा०-आपनी जांच उधारिके अपनी कही न जाय ।

कि जाने चित आपना, की मेरो जन गाय ॥ ७३ ॥

रमनी चौहत्तरवीं ७४ ॥

तहिया गुप्त थूल नहिं काया । ताके सोग न ताके माया ॥ कमल पत्र तरंग यक माहीं । संगहि रहै लिप्त पै नाही ॥ आशा ओस अंडन महँ रहई । अगनित अंडन कोई कहई ॥ निराधार आधार लै जानी । रामनाम लै उचरी बानी ॥ धर्म कहै सब पानी अहई । जाती के मन बानी रहई ॥ ढोर पतंग सरे घरियारा । तेहि पानी सब करै अचारा ॥ फन्द छोडि जो बाहर होई । बहुरि पंथ नहिं जोहै सोई ॥

सा०-भर्मक बांधल ई जगत, कोई न करे विचार ।

हरिकी भगति जाने बिना, बूड़ि मुआ संसार ॥ ७४ ॥

रमनी पचहत्तरवीं ७५ ॥

तेहि साहबके लागहु साथ । दुइ दुख मेटिके होहु सनाथा ॥ दशरथ कुल अवतारि नहिं आया । नहिं लंकाके राव सताया ॥ नहिं देवकीके गर्भहिं आया । नहिं यशोदा गोद खेलाया ॥ पृथ्वी रमन दमन नहिं करिया । पैठि पताल नहिं बलि छलिया ॥ नहिं बलि राय सो माडी रारी । नहिं हिरण्यकुश बधल पछारी ॥ बाराह रूप धरणी नहिं धरिया । क्षत्री मारि निक्षत्र न करिया ॥