कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
सा०-तिय सुन्दरी न सोहई, सनकादिकके साथ । कबहुक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ६९ ॥
रमनी सत्तरवीं ७० ॥
बोलना कासो बोलिय रे भाई । बोलतही सब तत्व नशाई ॥ बोलत बोलत बाढु बिकारा । सो बोलिय जो परै विचारा ॥ मिलै जो संत वचन दुइ कहिये । मिलै असंत मौन है रहिये ॥ पंडित सो बोलिय हितकारी । मूरख सो रहिये झखमारी ॥ कहहि कबीर अथ घट डोलै । पूरा होय विचार लै बोले ॥७०॥
रमनी इकहत्तरवीं ७१ ॥
शोक बधावा सब करि माना । ताकी बात इन्द्र नहि जाना ॥ जटा तोरि पहिरावै सेली । योग युक्तिको गर्भ दुहेली ॥ उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चीन्ह मड़राई ॥ जैसे भिस्ति तैसी है नारी । राज पाट सब गने उजारी ॥ जस नर्क तस चंदन जाना । जस वाउर तस रहै स्याना ॥ लपसी लौंग गने यक सारा । खांडें छांडि मुख फांकै छारा ॥
सा०-यही विचार विचारते, गये बुद्धि बल चित ।
दुई मिलि एकै होय रहा, काहि लगाऊं हित ॥ ७१ ॥
रमनी बहत्तरवीं ७२ ॥
नारी एक संसारहि आई । माय न वाके बापहि जाई (बाप न जाई) ॥ गोड न मूंड़ न प्राण अधारा । जामै भरमि रहा संसारा ॥ दिना सात लो वाकी सही । बुध अथ बुध अचरज यक कही ॥ वाहिकि वंदन कर सब कोई । बुध अथबुध अचरज बड़ होई ॥
सा०-मूस बिलाई एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज एक देखो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥७२॥
१ खांडोपरी हरि फांकै छारा ।