कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ई तन जारों ॥ सो न कहै जो जरत उबारौ । धरती कहै मोहिं मिलि जाई । पवन कहै मैं लेउं उड़ाई ॥ जेहि घरको घर कहैं गंवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ सो तन तुम आपन के जानी । विषय स्वरूप भूले अज्ञानी ॥
सा०-इतने तनके साझिया, जन्मो भरि दुख पाय ।
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ ७८ ॥
रसैनी उमासिनी ७९ ॥
बढवत बाढ़ि घटावत छोटी । परखत खरी परखावत खोटी ॥ केतिक कहौ कहाँ लों कही । औरो कहौं परे जो सही । कहे बिना मोहिं रहो न जाई । विरहिनि ले ले क्रूर खाई ॥ साखी-खाते खाते जुग गया, अजहूँ न चेतो आय ।
कहहि कवीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ७९ ॥
रसैनी अस्तिनी ८० ॥
बहुतक साहस करि जिय अपना । सो साहेबसे भेट न सपना ॥ खरा खोट जिन नहिं परखाया । चाहत लाभ सो मूर गवांया ॥ समुझि न परै पातरी मोटी । आछी गाढी सब भौ खोटी ॥ कहहि कवीर केहि देहौ खोरी । जब चलिहौ झिन आशा तोरी ॥ ८० ॥
रसैनी इत्यासिनी ८१ ॥
देव चरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नसाई ॥ दूजे सुनी मंदोदरि तारा । जेहि घर जेठ सदा लगवारा ॥ सुरपति जाय अहिल्यहिं छलिया । सुर गुरु धरनि चन्द्रमा हरिया ॥ कहैं कवीर हरिके गुण गाया । कुंती कारण कुंवारिहि जाया ॥ ८१ ॥
रसैनी व्यासवी ८२ ॥
सुखके वृक्ष एक जगत उपाया । समुझि न परी विषय कछु माया ॥ छौ छत्री पत्री जुग चारी । फल द्वै पाप पुत्र अधिकारी ॥ स्वाद अनन्त कछु बरनि न जाई । करि चरित्र सो ताहि समाई ॥ नट वट साज साजिया साजी । सो खेलै सो देखै वाजी ॥ मोहा