कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
वपुरा जुगति न देखा । शिव शक्ती विरंचि नहिं पेखा ॥ सा०-परदे परदे चलिया, समुझि परी नहिं बानि । जो जाने सो बांचिहै, होत सकलकी हानि ॥ ८२ ॥
रमैनी निरासीवी ८३ ॥
छत्री करै छत्रिया धर्मा । वाके बढै सवाई कर्मा ॥ जिन अवधू गुरु ज्ञान लखाया । ताकर मन तहैंदैं लै धाया ॥ छत्री सो जो कुटुम्ब सो जूझै । पांचो मेटि एक करि बूझै ॥ जीवहि मारि जीव प्रतिपालै । देखत जन्म आपनो घालै ॥ हालै करै निशाने धाऊ । जूझि परे तहां मनमत राऊ ॥
सा०-मनमत मरे न जीवई, जीवहि मरन न होय । शून्य सनेही राम बिन, चले अपन पौ खोय ॥ ८३ ॥
रमैनी चौरासिनी ८४ ॥
ऐ जिय आपन दुखहि संभार । जेहि दुख व्यापिरहो संसार ॥ माया मोह बंधा सब लोई । अल्पै लाभ मूल गो खोई ॥ मोर तोर में सबै विगुता । जननि उदर गर्भ मई सूता ॥ ई बहु रूप खेलै बहु बूता । जन भौरा अस गये बहुता ॥ उपजि विनसि फिर जोनी आवै । सुखको लेश सपनेहुं नहिं पावै ॥ दुख संताप कष्ट बहु पावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ॥ मोर तोरमें जर जग सारा । ध्रिंग स्वारथ झूठा हंकारा ॥ झूठो आश रहा जग लागी । इन्हते भागि बहुरि पुनि आगी ॥ जे हितकै राखे सब लोई । सो सयान वाचा नहिं कोई ॥
सा०-आपु आपु चेतै नहीं, कहो तो रूसावा होय ।
कहै कवीर जो आपु न जागे, निरास्ति अस्ति न कोय ॥ ८४ ॥
इति रमैनी मूल बीजकको संपूर्ण ॥
१ धृग जीवन झूठी संसारा ।
२ आपु आप चेतै नहीं कहो तो रिसहा होय ।
कहै कबीर सपने जगें निरास्ति अस्ति नहिं कोय ॥