कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 968 में से
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निरख परमोधकी ।
रमैनी १ ।
अमर लोकते हम चलि आवा । तीन लोक जम लूटत पावा ॥ जम लूटे जिवको नासे । दसौ दिसा सबहुनको फाँसे ॥ १ ॥ सुर- नर असुर कोई नहिं बाँचे । बहु विधि भेष धरे धर नाचे ॥ जने तीन परपंची देवा । उनहु न जान्यो जमको भेवा ॥ २ ॥ गरभ वासमें रहे भुलाई । अगम पन्थ जानो नहिं जाई ॥ ब्रह्मा वेद पढै अधिकाई । वरण चारि मिलि बांध दिढाई ॥ ३ ॥ विरन्त आपन पंथ चलावा । अविगत मरम काहु नहिं पावा ॥ त्रिपु- रारी आसन आरंभा । तीनों मिलकर आसन थंभा ॥ ४ ॥ सो पारखंड षटदर्शन भूले । फिर फिर जोइनि संकट झूले ॥ करै डिंभ जो मूल गमावे । धोखेई धोखे डहकावे ॥ ५ ॥ एक न पूजे देई देवा । बोल झूठ बूढे यह खेवा ॥ एक न चण्डी मन चित लावा । स्वारथ काजे जीव हतावा ॥ ६ ॥ एक न तीरथ वरत फल ताका । कहैं विराने आगम भाखा ॥ एक बरतकी आशा लाई । औसर हमको होइ सहाई ॥ ७ ॥ एक दान पुन सर्वस देहीं । जीवन जन्म सुफल करि लेहीं ॥ ऐसे करि करि सब जग बन्धा । जस संपुटमें लै कुछ रन्धा ॥ ८ ॥ कहा हमार न कोई मानै । मनुष एक हमहूँको जानै ॥ मनुष रूप होय हम दिखलावा । बहुत भाँति कर नर समुझावा ॥ तऊं न अन्ध मोहि पतियावा । धाई धाई जस उन विष खावा ॥ ९ ॥ खसम न चीन्हे मूढ गवाँरा । हारे ठोकै माथ लिलारा ॥ १० ॥ झूठ नात सबही मन माना । साँच बातकी निन्दा आना ॥ हंस होइ सो मुहि पतिआई । और न मुहि पतिआवे भाई ॥ ११ ॥ तज कुल कानि करे उजियारा । यह तो मता कालको मारा ॥ जुग जुग आजं कह समझाऊं ।