कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(४८७)
ई तन जारों ॥ सो न कहै जो जरत उबारौ । धरती कहै मोहिं मिलि जाई । पवन कहै मैं लेउं उड़ाई ॥ जेहि घरको घर कहैं गंवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ सो तन तुम आपन के जानी । विषय स्वरूप भूले अज्ञानी ॥
सा०-इतने तनके साझिया, जन्मो भरि दुख पाय ।
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ ७८ ॥
रसैनी उमासिनी ७९ ॥
बढवत बाढ़ि घटावत छोटी । परखत खरी परखावत खोटी ॥ केतिक कहौ कहाँ लों कही । औरो कहौं परे जो सही । कहे बिना मोहिं रहो न जाई । विरहिनि ले ले क्रूर खाई ॥ साखी-खाते खाते जुग गया, अजहूँ न चेतो आय ।
कहहि कवीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ७९ ॥
रसैनी अस्तिनी ८० ॥
बहुतक साहस करि जिय अपना । सो साहेबसे भेट न सपना ॥ खरा खोट जिन नहिं परखाया । चाहत लाभ सो मूर गवांया ॥ समुझि न परै पातरी मोटी । आछी गाढी सब भौ खोटी ॥ कहहि कवीर केहि देहौ खोरी । जब चलिहौ झिन आशा तोरी ॥ ८० ॥
रसैनी इत्यासिनी ८१ ॥
देव चरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नसाई ॥ दूजे सुनी मंदोदरि तारा । जेहि घर जेठ सदा लगवारा ॥ सुरपति जाय अहिल्यहिं छलिया । सुर गुरु धरनि चन्द्रमा हरिया ॥ कहैं कवीर हरिके गुण गाया । कुंती कारण कुंवारिहि जाया ॥ ८१ ॥
रसैनी व्यासवी ८२ ॥
सुखके वृक्ष एक जगत उपाया । समुझि न परी विषय कछु माया ॥ छौ छत्री पत्री जुग चारी । फल द्वै पाप पुत्र अधिकारी ॥ स्वाद अनन्त कछु बरनि न जाई । करि चरित्र सो ताहि समाई ॥ नट वट साज साजिया साजी । सो खेलै सो देखै वाजी ॥ मोहा
(४८८)
कवीरपंथी—
वपुरा जुगति न देखा । शिव शक्ती विरंचि नहिं पेखा ॥ सा०-परदे परदे चलिया, समुझि परी नहिं बानि । जो जाने सो बांचिहै, होत सकलकी हानि ॥ ८२ ॥
रमैनी निरासीवी ८३ ॥
छत्री करै छत्रिया धर्मा । वाके बढै सवाई कर्मा ॥ जिन अवधू गुरु ज्ञान लखाया । ताकर मन तहैंदैं लै धाया ॥ छत्री सो जो कुटुम्ब सो जूझै । पांचो मेटि एक करि बूझै ॥ जीवहि मारि जीव प्रतिपालै । देखत जन्म आपनो घालै ॥ हालै करै निशाने धाऊ । जूझि परे तहां मनमत राऊ ॥
सा०-मनमत मरे न जीवई, जीवहि मरन न होय । शून्य सनेही राम बिन, चले अपन पौ खोय ॥ ८३ ॥
रमैनी चौरासिनी ८४ ॥
ऐ जिय आपन दुखहि संभार । जेहि दुख व्यापिरहो संसार ॥ माया मोह बंधा सब लोई । अल्पै लाभ मूल गो खोई ॥ मोर तोर में सबै विगुता । जननि उदर गर्भ मई सूता ॥ ई बहु रूप खेलै बहु बूता । जन भौरा अस गये बहुता ॥ उपजि विनसि फिर जोनी आवै । सुखको लेश सपनेहुं नहिं पावै ॥ दुख संताप कष्ट बहु पावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ॥ मोर तोरमें जर जग सारा । ध्रिंग स्वारथ झूठा हंकारा ॥ झूठो आश रहा जग लागी । इन्हते भागि बहुरि पुनि आगी ॥ जे हितकै राखे सब लोई । सो सयान वाचा नहिं कोई ॥
सा०-आपु आपु चेतै नहीं, कहो तो रूसावा होय ।
कहै कवीर जो आपु न जागे, निरास्ति अस्ति न कोय ॥ ८४ ॥
इति रमैनी मूल बीजकको संपूर्ण ॥
१ धृग जीवन झूठी संसारा ।
२ आपु आप चेतै नहीं कहो तो रिसहा होय ।
कहै कबीर सपने जगें निरास्ति अस्ति नहिं कोय ॥
शब्दावली
(४८९)
निरख परमोधकी ।
रमैनी १ ।
अमर लोकते हम चलि आवा । तीन लोक जम लूटत पावा ॥ जम लूटे जिवको नासे । दसौ दिसा सबहुनको फाँसे ॥ १ ॥ सुर- नर असुर कोई नहिं बाँचे । बहु विधि भेष धरे धर नाचे ॥ जने तीन परपंची देवा । उनहु न जान्यो जमको भेवा ॥ २ ॥ गरभ वासमें रहे भुलाई । अगम पन्थ जानो नहिं जाई ॥ ब्रह्मा वेद पढै अधिकाई । वरण चारि मिलि बांध दिढाई ॥ ३ ॥ विरन्त आपन पंथ चलावा । अविगत मरम काहु नहिं पावा ॥ त्रिपु- रारी आसन आरंभा । तीनों मिलकर आसन थंभा ॥ ४ ॥ सो पारखंड षटदर्शन भूले । फिर फिर जोइनि संकट झूले ॥ करै डिंभ जो मूल गमावे । धोखेई धोखे डहकावे ॥ ५ ॥ एक न पूजे देई देवा । बोल झूठ बूढे यह खेवा ॥ एक न चण्डी मन चित लावा । स्वारथ काजे जीव हतावा ॥ ६ ॥ एक न तीरथ वरत फल ताका । कहैं विराने आगम भाखा ॥ एक बरतकी आशा लाई । औसर हमको होइ सहाई ॥ ७ ॥ एक दान पुन सर्वस देहीं । जीवन जन्म सुफल करि लेहीं ॥ ऐसे करि करि सब जग बन्धा । जस संपुटमें लै कुछ रन्धा ॥ ८ ॥ कहा हमार न कोई मानै । मनुष एक हमहूँको जानै ॥ मनुष रूप होय हम दिखलावा । बहुत भाँति कर नर समुझावा ॥ तऊं न अन्ध मोहि पतियावा । धाई धाई जस उन विष खावा ॥ ९ ॥ खसम न चीन्हे मूढ गवाँरा । हारे ठोकै माथ लिलारा ॥ १० ॥ झूठ नात सबही मन माना । साँच बातकी निन्दा आना ॥ हंस होइ सो मुहि पतिआई । और न मुहि पतिआवे भाई ॥ ११ ॥ तज कुल कानि करे उजियारा । यह तो मता कालको मारा ॥ जुग जुग आजं कह समझाऊं ।
(४९०)
कवीरपंथी-
जो मानै तिहिं लोक पठाऊं ॥१२॥ अजहुं कहुं जो कोई माने । अच्छर माहिं मोहि पहिचाने ॥ जिहि घट अच्छर होय हमारा । सो ठठ खोजै आप विचारा ॥१३॥ अच्छर यहैमें कहुं विचारा । जो कोई बूझे आन सवारा ॥ अच्छर की प्रतीत कराई । आन उपाय छाडिदे भाई ॥१४॥ अच्छर मध्ये बास हमारा । जो कोई बूझे आन सवारा ॥ आन उपाय विज्ञानी होई । अच्छर विना न छूटे कोई ॥१५॥
सा०-कहैं कवीर सब हंस से, कुल टूटे ते हंस ।
तिनसे हमसे भेद नहीं, काटे जमके फंस ॥ १ ॥
रवैनी २ ।
मोर कहा कोई विरले माना । सत्य लोकको दीन पयाना । सत्यलोक सत्यहिते भयउ । जुरा मरण कागज गल गयउ ॥१६॥ जुरा मरण रहित घर पावा । जिन माना मोर ससुझावा ॥ और न कोई समझावन हारा । और न कोई राखन हारा ॥१७॥ सो का राखे आपुहि भूले । आपुहि बानी संकट झूले ॥ आपुहि झूले और झुलावे । आपा माड़ सबन डहकावे ॥ १८ ॥ हमहुं से जो आपा माड़े । उलट चोर कोतवाले ढाँड़े ॥ जस नट विद्या नटवे चीन्हा । रात दिवस जिव पालन कीन्हा ॥ १९ ॥ बहुतक बृक्ष जो लाय दिखाये । तिसके फल सब तोड चखाये ॥ काहूको सन्तोष न भयउ । खाली दिखाय और कछु लयउ ॥२०॥ अस लालच जुग जुग चलआवा । लालच आगे जीव गवाँया ॥ अम्सर घर को कोई न धावे । करामतकी सेवा लावे ॥२१॥ एक कहे संपत मैं पाई । मान बढ़ाई बहुत दिटाई । एक कहे फुर शब्द हमारा । जोरे कहैं सो होय सवारा ॥ २२ ॥ इन बातन बूझे बड़ ज्ञानी । एक कहे जो सिद्ध कहानी ॥ सिद्ध कहानी अंजुली पानी । घट
शब्दावली
(४९१)
छूटे की काहु न जानी ॥ २३ ॥ घटकी किया रहनि रहाई । कालहुते तिनहु डहकाई ॥
सा०-बन्दिछोर मम शब्द है, काटे जमके बन्द ॥ लैराखे सतलोकमें, चले काल कटि फन्द ॥ २ ॥ ऐसे कारजको शब्द है, जो तोड़े कुलकान ॥ लै राखे सतलोकमें, करै शब्द पहि- चान ॥ ३ ॥ शब्द हमारा जो लहै, चले न जमका जोर ॥ काले मारे छय करै, हंसा पहुँचै ओर ॥ ४ ॥ सतलोकमें पहुँ- चिया, अमरित भोजन पाइ ॥ जोग जुगंतर रम रहै, कहैं कवीर समझाइ ॥ ५ ॥
रमैनी-यह दुनिया झूठे रंगराची । झूठौ उपाई करे कर नाची ॥ २४ ॥ झूठेसे परतीत कराई । ताते सृष्टी काल सुख जाई ॥ कालक काहु मरम न पावा । काल सबन मिल खसम दिठावा ॥ २५ ॥ काल रूप बरते घट मांही । काल लगन नर आवै जाहीं ॥ काल सबनपै भेष धरावै । कालक दीन सिमरफल पावै ॥ २६ ॥ सो फल चाखै हुआ उड़ावे । हाथ पिछौरै शीश डुलावै ॥ सेवा कर पंछी पछताई । ऐसे जीव काल सुख जाई ॥ २७ ॥ अस जिन जानौ पंछि भुलाना । जनम हार जग जिय पछताना ॥ शब्द हमारे जो फल होई । सो फल कालसु माँगौ लौई ॥ २८ ॥ कहौ काल कहाँते देई । नंगक आस धोवि का लेई ॥ ऐसे कर कर जग डहकावा । जैसे आगी वनधौं लावा ॥ २९ ॥ अस इन लोगन घर मत कीना । घरके मते अपन पौं लीना ॥ जैसे नाद सो भ्रिग भुलाई । समुझे नहीं पारधि दुखदाई ॥ ३० ॥ नाद सुनाइ प्रान हत कीनौ । ऐसे काल जीव हत कीनौ ॥ ज्यों जल मध्ये मीन रहाई । निसवासर आपनौ भछ खाई ॥ ३१ ॥ तहाँ पारधी बंशी लाई । गेंडुआ चार तहाँ लटकाई ॥ मीन न
(४९२)
कबीरपंथी—
जाने कहाँ ते आवा । लालच लागे जीव गवाँवा ॥३२॥ पतंग न चीन्है जोत की अहाँ । यहाँ न जान यह मोहिँ दहाँ ॥ जो तो जाने तऊ न डरई । बिन जाने वह नाश जो करई ॥ ३३ ॥ स्वानको स्वान कहाँते आवा । भूसि भूसि उन जीव गवाँवा ॥ अपनो प्रतिमा देखि डराना । ऐसे भरम भरमि पछताना ॥३४॥ कहा केहरिको केहर कीनौ । केहर जाइ रूप जिय दीनौ ॥ ताको किनहु विचार न कीनौ । यह विचार कोइ ज्ञानी चीनौ ॥ ३५ ॥ यह अच्छर चीन्हहु रे भाई । हिन्दू तुरुकसे कई समुझाई ॥ छाडे नहीं तीरथ वरत आसा ॥ पाप पुत्रको कीनी नासा ॥३६॥ छोडे नहीं गृह दार सुयारी । शबद छाड़ भये अलप अहारी ॥ छाड़ राज पाहन सिर नायो । छाड़िनि तोशः हम कछु न चलायो ॥ ३७ ॥ औँधूको सतगुरु कर जाना ॥ अंधाके मन औँधू माना ॥ प्रथम कहैं सुत आसन कीजे । मन पवनाको बस कर लीजे ॥ अनहद नाद रहै भरपूरी । अब हमते शंसै गो दूरी ॥ इंगला पिंगला सुषमन जागी । दसौ द्वार तब तारी लागी ॥ दीपक रूप निरंजन देखा । जोत सरूप निरंजन पेखा ॥ घटही मांहि निरंजन पाया । कहैं जु आवागमन मिटाया ॥ ३८ ॥ एक कहैं हम अम्बर भयऊ । एक कहैं हम पच्छहि लयेऊ ॥ ऐसी बाजी काल दिखावे । प्रान पयान काम नहीं आवे ॥ ३९ ॥ यह मिल औँधू सबहन सीका । अगम पंथको कहैं जो फीका ॥ कालके फंद पडे सब लोई । साची कहौँ न माने कोई ॥ ४० ॥ सांचे मरन न काहू पावा । कालक फंदा जग डहकावा ॥ वेद कितेब फंद यक कीना । जैसे कीर जाल बुन लीना ॥ ४१ ॥ तेहि फंद अटके सब कोई । हम चीन्है बिन बड दुख होई ॥ ऐसो फंद जुग जुग चलि आवा । सेवक स्वामी सब
शब्दावली
(४९३)
डहकावा ॥ ४२ ॥ कालै धौ परपंच बनाये । ये परपंच न काहु पाये ॥ तेहिंते बचिके बाहिर आये । हुए निनार सो हंस कहहाये ॥ ४३ ॥ हंस होइ बहुते सुख पावा । जोनी संकट बहुरि न आवा ॥ हंस चाल चले जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ ४४ ॥ चाल बिना लागै बड बारा । तहवां नाही दोष हमारा ॥ यही बात कहै समझाई । तेई हंसको धोख छुडाई ॥ ४५ ॥
सा०-कहत कवीर हंसनते, धरमराइको लूट ।
अमरको निहचल करौं, भवजल जाई छूट ॥ ६ ॥
रमैनी-जीव काजको हम चलि आये । आइ देसको मंझा पाये ॥ मंझा लीना देस हम आई । राजा खोट अनीत तहांई ॥ ४६ ॥ रइयत कर कर मार उजारी । ऊंचेते नीचे ले डारी ॥ नीचे डारे सब संसारा । हमरे शब्द बिनु नाहि सहारा ॥ ४७ ॥ सेवा करै जस मोलक लीनौ । सहस आस उन विनती कीनौ ॥ उहिको पच्छ करै जो कोई ॥ सोच विचार रहै पुन सोई ॥ ४८ ॥ रहै दुचित वह चैन न लेई । जस घरही मार घरही बध देई ॥ हाथक दीना खाइ अधीना । बाकी अटक रहै लौलीना ॥ ४९ ॥ अस जिव काम किये मन ऐई । जस पकड बहलिया दुख देई ॥ जो भावे सो करै विचारा । ऐसे काल जगत यह मारा ॥ ५० ॥ तेई कालको मरम न पावा । सेवा संजम बहुत दिढावा ॥ छोडे गिरह परिवार घनेरा । कह सो गुरु भला कर मेरा ॥ ५१ ॥ कहौ गुरु कहवाँते आवा । कहो गुरु कौनै समझावा ॥ इतनी बुझ न करै अधीना । फटी आँख न कहैं हम चीन्हा ॥ ५२ ॥ घरे गुरु घरही घर चेला । जैसे उठरू चले अपेला ॥ कान न करै कहौ नहीं मानै ॥ जहँ जहँ रुचै तहँ तहँ तानै ॥ ५३ ॥ अस विचार इन सब मिल कीना । झूठे खसमहि सरबस दीना ॥
(४९४)
कवीरपंथी-
कोई कहै राम कोइ रहमाना । ब्रह्मज्ञानी एककै जाना ॥ ५४ ॥ ब्रह्मज्ञान बाँचे नहीं कोई । पानी मिलै कौन सिंधि होई ॥ वाको सुख यह कैसे पावै । यह बैठे वह खाइ उडावै ॥ ५५ ॥
साखी०—ऐसे डूबे षट् दर्शन, और सकल संसार ।
कविरा हमरे शब्द विनु, कोइ न पावै पार ॥ ७ ॥
रमैनी-लोग कहैं हमही होय स्याना । साँच कहौं कोई नहीं माना ॥ काम झरै कन्दूप नित झरई । ताको कोइ विचार न करई ॥ ५६ ॥ कंदरप यह निकस उपजाना । ताको विरही छटी बखाना ॥ जेहि पिता पुत्रको पालै । जीवन जनम सुफल कर जाने ॥ कहैं हमारो आगो चलिहै । चीन्है नहीं कालको बलि है ॥ ५७ ॥
साखी—तैसहि सुता दिढावै, अपने वसीठ चलान ।
दान दहेज दे कर जोरै, कहूं कि उन सरमान ॥ ८ ॥
रमैनी—कहु कौनसी कर यहु आवै । ताको सब मिल माथ नवावै ॥ रहौ पछताई काल धर खावा । जनम जनम पाछे पछतावा ॥ ५८ ॥
सा०—मानै शब्द बंदि जम छूटै, बातै सुनत भयान ।
कहैं कवीर नर भोइ, लोके वेद भुलान ॥ ९ ॥
रमैनी—छाड़हु लाज और छाड़हु बडाई । छाड़हु झूठ जो कथा चलाई ॥ छाड़हु पाखंड छाड़हु भेषा । छाड़हु सब पापन- को लेषा ॥ ५९ ॥ छाड़हु तीरथ वरत फल भाई । तजौ जोग आतम समझाई ॥ तजौ आसन जो बैठक दीना । छाड़हु सुन्न सिखर मन चीना ॥ ६० ॥ चीन्हो जस हम जो चिन्हावै । अपर करै सतलोक पठावै । सुन्न सिखरमैं धरम अन्याई । तिह डहकेको शक्ति पठाई ॥ ६१ ॥ माता बहनी भनजी होई ॥
शब्दावली
(४९५)
मिहरी सुता हुइ बैठी सोई ॥ औरो कुल बहु भांत बनाई। वरन चारमें सब डहकाई ॥ ६२ ॥ जोगियन तपियन अपडर कीना। भाज भाज उन बनखंड लीना ॥ तिनको खनि खनि कंद खवावे। गिरह दारा सुख सबै छुटावे ॥ ६३ ॥ एक जनम भर मिथ्या खोवै। एक जो गुफाके माहीं सोवै ॥ एक जोग जग उदासी फिरई। मन मथ जोग प्रान हत करई ॥ ६४ ॥ एक नगन हुइ आपु दिखावै। चौहटे नट जस पसू नचावै ॥ ऐसे तीनों लोक नचावे। धरम रायको मरम न पावै ॥ ६५ ॥ धरम अहै परपंची देवा। उनहू कीन अमलको भेवा ॥ सकती लै परपंच बनाये। जुग जुग जीव सबै डहकाये ॥ ६६ ॥ वेद कितेब फंद एक कीनौ। मन बच करम सबै जुग लीनौ ॥ वेदहि रच रच ग्रंथि जु दीना। वेद विचारै पेर न चीन्हा ॥ ६७ ॥ तिन ग्रंथिन अटके सब कोई। तिनते छुटत बडो दुख होई ॥ तिन ग्रंथिन जोरे छुटाऊँ। करि अमर सतलोक पठाऊँ ॥ ६८ ॥ अक्षर कहै सो कीजै भाई। हंस होइ सतलोकै जाई ॥ पांच दूत यहि तनमें जाना। यह तो धरम राइका बाना ॥ ६९ ॥ परधन त्रिया क्रोध विकारो। लोभ मोह तिशानाको जारो ॥ पांच पचीसको संग्रह छूटे। धरम राइको जम कुल लूटे ॥ ७० ॥ सत शब्दमें डोर समावै। रहनि गहनि सतलोकै पावै ॥ विनु रहनी कछु काज न होई विनु गहनी सतलोक न कोई ॥ ७१ ॥
साखी-कह कवीर निरमल होय, काट करमके फंद ।
अमरलोक निहचल भये, जुग जुग करे अनन्द ॥१०॥
इति निरख प्रबोधकी रमैनी सम्पूर्ण शुभम् ।
(४९६)
कवीरपंथी-
अथ ज्ञानचौतीसा प्रारंभः ।
कक्का-केता कहे कवीर कहा कोई नहि मानै । कायामैं कर- तार, नाहिं कोई पहिचानै । कर्म बन्ध संसार, काल सों नहिं बचन है । अरे हाँ अवधू ! काम कोध हंकार, कल्पना कठिन है ॥ १ ॥
खरुखा-खारी सो कह खाँड; खाँड खारी विधि लेखै । खरे खोटको न्याव, नहीं हिरदय विवेखै ॥ खोरिन खोरिन फिरे, खाक मुख लायके । अरे हाँ अवधू ! खसम परो न चीन्हि, रहे खिसियायके ॥ २ ॥
गगगा-ग्यान सोई निज सार, जाही सो थिर भया । कर्मको टूटयो फन्द, द्रन्द्व सब खिरगया ॥ ग्यानी कथै अगाध, रहै हिया फेर फारके । अरे हाँ अवधू ! गाडि रक्यो बातनको, लेगौ चोर उखारिके ॥ ३ ॥
घच्छा-घटमें आतम राम, मिलो साहब सना । घरमें प्रेम निधान, चेत मेरे मना ॥ जहाँ नहीं घाम नहिं छाहैं, तहाँ इन घर करा । अरे हाँ अवधू ! घरकी सुरत बिसार, घसीटनमें परा ॥ ४ ॥
डडा-( नन्ना ) नयन विना नर अंध, द्रन्द्व धोखा धरा । सूझे वार न पार, प्रान परबस परा ॥ नितकै संशय झूल, मूल विसराइया । अरे हाँ अवधू ! नहीं भयो निरशंक, मुक्ति किन पाइया ॥ ५ ॥
चच्चा-चले जात नर नष्ट, चौरासी धारमें । बिन चीन्हे यहि चले, परे भौभारमें ॥ चतुर बिचच्छन होइ कहो कहँवाँ लगे । अरे हाँ अवधू ! पडे चोरके हाथ, चीन्हि नाहीं भगे ॥ ६ ॥
छच्छा-छल व्यवहारके धोखा छाडहू । काम कोध अहंकार
शब्दावली
(४९७)
कि, लोभ निवारहू । क्षमा शील सन्तोष, सत्य हियमा धरो । अरे हाँ अवधू ! परख, बोलता ब्रह्म चीन्ह ताके करो ॥ ७ ॥
जन्मा-जग जीवन जगदीस, जगत गुरु जीव है । जाने जान सुजान, सोई निज पीव है ॥ खोजो जो नव खण्ड, भेद निज कहि दिया । अरे हाँ अवधू ! जुग जुग अविचल जीव, कवीर गुरु कहि दिया ॥ ८ ॥
झइझा-झूठ झगरा छोड़, इन्द्रमें कहा परो । झलक मनी उजियार, निकट हियमें धरो ॥ झाड़ पातको छोड़, सार निज ताय ले । अरे हाँ अवधू ! कहा झखे मतिहीन, परम गुन गायले ॥ ९ ॥
नन्ना-नाह छोड़ि नरा, नार चली है जारपै । पियाकी सुरत बिसार, तो आशिक यारपै ॥ नीच बुद्धि मतिहीन, नहीं स्वारथ भयो । अरे हाँ अवधू ! जार बसे हिय माँहि, नरक ताते गयो ॥ १० ॥
टट्टा-टीडी भया जहान, उडा आसमान कूँ । हटा नेह निदान, चला घमसामकूँ ॥ टाराही नहिं टरे, भरम धोखा परा । अरे हाँ अवधू ! कठिन, टेक मनमें धरी, तार टूटिया मरा ॥ ११ ॥
ठट्टा-है ठोरेके ठोरे, दूर धोखा भया । ठोकै सबहिं कपाल, गुसैयां कित गया ॥ ठठके बेडा बांधि, पार कोई ना तरा । अरे हाँ अवधू ! ठाकुर, बिसराय, काम ठगसों परा ॥ १२ ॥
डड्डा-डसे भुवंगम चोर, विरह विष बाढिया । डसे जो चतुर सुजान, विरहमें ढारिया ॥ डार पातकूँ छोड़ि, सिपत सबहिं किया । अरे हाँ अवधू ! डंड बाजके हाथ, प्रान अपना दिया ॥ १३ ॥
ढट्टा-ढोल मारि गुरु कहै, सबन सों टेरिके । ढूँढे सरग पताल, थके सब हेरिके ॥ कहूँ ढूँढे मतिहीन, कहाँ भटकत फिरे अरे हाँ अवधू ! ढिगही परमानन्द, चीन्हि नहीं परे ॥ १४ ॥
(४९८)
कवीरपंथी-
णणा-नन्ना निरगुन निरंकार, निरञ्जन सब जपे । नहि रूप नहि रेख, ताहीको सब थपे ॥ जहाँ नहीं तहाँ सही, सही तहाँ नहि किया । अरे हों अवधू ! नर अज्ञानी असल भिटाय, नकल सिर पर लिया ॥ १६ ॥
तत्ता-तत्त्व यही निज सार, और कहु ना मिले । तुही तुही निज तुही, हिरदामें देखले ॥ तिरखावन्त पुनि साधु, तलफ जाकी धरे । अरे हों अवधू ! सो बोले घट माहिं, और ले क्या करे ॥ १६ ॥
थथथा-थकित भये नर नारि, सो ढूँढे ना मिले । थिर होय लखै न आप, अहमें सब गले ॥ जहाँ अति अगम अथाह, तहाँ थाह नहीं चले । अरे हों अवधू ! थित विन थैमें कौन, बहे भौमें भले ॥ १७ ॥
दहा-दूसर कोई नाहिं, द्रन्द्रमें कहाँ परो । दया धर्म सत शील, साधु सेवा करो ॥ दिलकी दुबिधा छाड़ि, काम एता किया । अरे हों अवधू ! दिग्य दृष्टिसे देख, दरस दिलमें लिया ॥ १८ ॥
धधधा-धन्य धन्य सो भाग, जाही परतीत है । यही ध्यान धनसार, और विपरीत है ॥ धावे सकल जहान, धोखामें सब परे । अरे हों अवधू ! चहुँ दिस ढुंद बहाल, सूत्रकूँ सब चले ॥ १९ ॥
नन्ना-निरख देख निज नैन, आपमें आप है । निरभय धजा निशान, अगर फहरात है ॥ निसा मान भरपूर, परम सुख पाइहो ॥ अरे हों अवधू ! निसि वासरको सोग, सबे विसराइ हो ॥ २० ॥
पप्पा-पप्पा पूर्ण ब्रह्म है, प्रेमते और न कोई । काया बीर कवीर, परम गुरु निहचे सोई ॥ पत्थर पूजे प्रेत, पार किन पाइया । अरे हों अवधू ! पैडा परो न चीन्ह, मूल जहँडाइया ॥ २१ ॥
फफ्फा-फल लागे बड दूर, बीज बकला विना । कौन खवावे तोर,
शब्दावली
(४९९)
फहम अकला विना ॥ फिरते रहे खुलान, फिकर दिलमें रही । अरे अवधू ! फिकर मिटे दिल माहिं, फकीरी तब सही ॥२२॥
बब्बा-बिबि अक्षर ठहराय, वृछ जो राखि हों। वेद शास्त्र बहु ग्रन्थ, अदभुत भाखिहों ॥ बकता बकत विस्तार, बहु विधि ले बढा। अरे हों अवधू ! भीतर भरी भंगार, कनक ऊपर मढी ॥२३॥
भम्भा-भरमें सकल जहान, कहे यहाँ कछु नहीं। आपहिं फन्द बनाय, भरम कीन्हों सही ॥ डार भगमकी मोट, भरमना करम है। अरे हों अवधू ! भीतर है भरपूर, तो बाहर भरम है ॥२४॥
यव्या-(जजा) जो तुम चतुर सुजान, जगत गुरु जानले । जिन सिरजी सकल जहान, ताहि पहिंचान ले ॥ एक ज्योति जगमाहिं, जगामग होय रही । अरे हों अवधू ! उन थापी निनार, तहाँ कछु है नहीं ॥ २५ ॥
ररा-राम राम सब जपे, राम सो ना मिले । आतम राम विसार, सूत्रकूँ सब चले ॥ सूत्र सनेहो राम, कहो किन पाइया । अरे हों अवधू ! जुग जुग आतम राम, कवीर गोहराइया ॥२६॥
लछा-लाज बीज पत खोय, भांड मूरख भये । लाधा विष निज मूल, लालसों ना लिये ॥ लगी दवा चहुँ ओर, लपटमें सब परे । अरे हों अवधू ! कदहिं न गयो भम, सकल सरबस बरे ॥ २७ ॥
बब्बा-वाही की परतीत, वाहि विन और न कोई । वो सबके सिरताज, काज वासे सहि होई ॥ वह नहिं आवे जाय, सबन सो भिन्न है । अरे हों अवधू ! ऐसी अकल विवेक, सबन किन्ह है ॥ २८ ॥
सस्सा-संसय भयो अथाह, सासत जिवको भई । इहाँ मिल- नको नाहिं, सिपत सबदिन कही ॥ सिद्ध साधु संसार, सबै
(५००)
कवीरपंथी—
सुमिरन करै । अरे हों अवधू ! सुकृत पडे न चीन्ह, नहीं संसै टरै ॥ २९ ॥
षष्ण-षोजो खोजी होय, षोज नाही मिलै । खोजी खोज सिरी न, कहो तुम कहाँ चले ॥ जहाँ मिलनकी मौज, खोज तहाँ ना किया । अरे हों अवधू ! खायो मूल गँवार, खसम दिल ना दिया ॥ ३१ ॥
सस्सा-सत्य सुकृत सतनाम, सबनमें सांच है । सत रूप जगमाहिं, तो मनसा बाच है । संशय टारन भयहरन, सब कल निधि है सही । अरे हों अवधू ! जो पूछो सो कही, अब का कही ॥ ३२ ॥
हहा-हाजिर सो हजूर, गाफिली दूर है । हिरदा कमलमें हंस, सजीवन मूर है ॥ हँसे हँसावे आप, सबनमें सोह है । अरे हों अवधू ! हितकर देख विचार, वचन यह सोह है ॥ ३३ ॥
छछा-छल जो गया सब छूट, महा आनन्द भया । मिटी जो जमका त्रास, छत्र सिरपर धरा ॥ छाप सतकी पड़ी काज पूरन भया । अरे हों अवधू ! कहे कवीर विचार, विछड़ मिलना भया ॥ ३४ ॥
सा०-शीलवन्त सुजन जन, हिरदे प्रेम प्रकास । सत्य टेक शब्दे गहे, सोजन सदा निवास ॥
इति चौतीसा पहला ।
अथ दूसरा चौतीसा प्रारम्भः २ ॥
कक्का-काया कुंज करमकी बारी, कर्ता बाग लगाया । किन- का तामे अजर समाना, बिन बेली पलुहाया ॥ पांच पचीस फूल तहाँ फूले, मन अलि तहाँ लुभाना । वा फूलनके लपट विषयरस, रमता राम भुलाना ॥
शब्दावली
(५०१)
सा०-मनभवंरा यह कठिन है, विषय लहर लपटाय ।
ताहि संग रमता बहे, फिर फिर भटका खाय ॥ १ ॥
खरखा-खलककी खबर नहीं, ख्वाब ख्यालमें भूला ॥ खाना दाना जोडा घोडा, देख जवानी फूला ॥ खासा पलंग सेज बनि तोशक, तकिया फूल बिछाया । नवल नार ले तापर पौढे, काम लहर उमड़ाया ॥
सा०-लागी नारि पियारि जब, छुटा धनीसों नेह ।
काल जबै ले ग्रासई, खाक होयगी देह ॥ २ ॥
गगगा-गुरु कीजे निरख परख के, ज्ञान रहनका पूरा । गर्भ गुमान मदन मद त्यागी, दया क्षमा सतसूरा ॥ गेल बतावै अमर लोककी, गावै सतगुरु बानी ॥ मन गज सिर अकुंश दे बैठे, गुरु ग्यान मल तानी ॥
सा०-पाप पुन्यकी आशा नाहीं, करम भरमको न्यार ।
किरतम पाखंड परिहरे, अस गुरु करो विचार ॥ ३ ॥
घच्चा-घन गुरु ज्ञान बिना अँधियारा, मोह तिमिर तन छाया । सार असार बिचारे नाहीं, अमी छोड़ि विष खाया ॥ घरका घृत रेतेमें डारे, छाछ ढूँढता डोले । कश्चन दैके काच विसाहै, हर विगराना तौले ॥
सा०-ज्ञान बिना नर अंध है, अंध कर्म मत हीन ।
सांच गहे नहिं परखिके, झूठेके आधीन ॥ ४ ॥
उवाँ-ऊन मत मानो संतो, गहो परमारथ बानी । उपज सुख तब हिये तुम्हारे, जब परखो मम बानी ॥ ऊँच नीच कछु है नहीं, कर्म कहावै छोटा । जिसके करनी अन्दर नाहीं, सोई माल है खोटा ॥
(५०२)
कबीरपंथी—
सा०—ऊपर माला जटा जनैऊ, माथे तिलक सुहाय ।
संसै सोग घटभीतर, अंदर मैल रहाय ॥ ६ ॥
चन्ना-चित चेनो चतुर चिकनियाँ, चैन कहा तुम सोया । चतुराई सबभार परैगी, जन्म अकारथ खोया ॥ चौथा पन तेरो आय लगा, अजहुँ चेत गुरु ज्ञानी । नहिं तो परिहौ खोह अंधियारे, फिर पाछे पछताना ॥
सा०—ऐसे पाटन आयकै, सौदा करो बनाय ।
जो चूकौ या जन्मसे, तो दुख भुगतो जाय ॥ ६ ॥
छछछा-छल बल छिनमें निकसि जायगा, जब छेकै जम आई । छट पट करे मरे विष ज्वाला, तब कहु कौन सहाई ॥ जमके मुगदर सिरपर बाजै, तब करिहौ किलकारी । तात मात आता सुत सज्जन, काम न आवै नारी ॥
सा०—छूटी सकल सगाई, भया चोरका हाल ।
संगी सब न्यारा रहे, आप परै सुख काल ॥ ७ ॥
जजा-जमके पाले जबै परै जिव, तब कहु बात न आवै । तहां कहु चाले नाही, सीस धुनी पछतावै ॥ जम ले पहुँचे चित्र- गुपित पहाँ लिखनी लख विचारे । दयाहीन गुरु बेसुख ढाढे, अगिनकुण्डमें डारे ॥
सा०—जन्म सहस्र अजगर देवे, विषज्वाला अकुलाय ।
पीछे किमि विष्टा माँही, भूत खान परजाय ॥ ८ ॥
झइझा-झाखन झूखन छांडो, झमकि करो गुरु सेवा । झाई मनकी दूर बहावो, परख शब्द गुरु देवा ॥ झगरा झूठ झाई जग त्यागो, झपट भजो सतनामा । झीन करो मन मेरु मन्दिरमें, गुरु पद पैकज विश्रामा ॥
सा०—होइ अधीन गुरु चरण गहो, कपट भाव कर दूर ।
ज्यों पतिव्रता पति गही, तर्कै न दूसर क्रूर ॥ ९ ॥
शब्दावली ।
(५०३)
जन्मा-इशक बिना मिले नहीं साहब, केतो भेख बनाये । इशक खुशक न छिपे छिपाये, के तो कोई छिपावे ॥ इत उत यहाँ उहाँ सब त्यागो, निहचे गहो गुरु शरना । याहीसे हो दुख नसे, मिटे जनम औ मरना ॥
सा०-आदि नाम है जा हिये, सोईं गुरु है सार ।
कीतमको जो ध्यावई, सोईं भव लगे न पार ॥ १० ॥
टढ़ा-टीम टाम बाहर बहुतेरा, दिल दासीसे बंधा । संख धुन लेकरे आरती, छुटा न घरका धंधा ॥ टिकुली सेंदुर चरखा पूनी, दासीने फुरमाया । कच्चे बच्चेने मांग मिठाई, मगन भये तब लाया ॥
सा०-जिन सेवक पूजा दर्ई, ताहि दर्ई आसीस ।
जहाँ नहीं तहाँ टेढे भये, कहै भसम करो जगदीस ॥ ११ ॥
ठढ़ा-ठग बहुतेरे भेख बनावे, गले लगावै फांसी । स्वांग बनाये कौन नफा है, जो न भजै अविनासी ॥ ठोकर सहे गुरुके आगे, ठीक ठौर तब पावे । ठकठक मेटे जरा मरणका, जमके हाथ न आवे ॥
सा०-भूतक होय गुरु चरण गहे, ठसक करे सब दूर ।
कायर ते नहीं भगति होय, ठानि रहै कोई सूर ॥ १२ ॥
डढ़ा-डगमगसे कछु काज न सरिहै, अडिग नाम गुण गहिये । डर मेटे तब विषय कालको, अच्छे अमर पद लहिये ॥ डरते रहिये गुरु साधुसे, डिंभ काम नहीं आवै । डिंभ जुबावै भव- सागरमें, जनम मरन दुख पावै ॥
सा०-डेढ दिनाको जीवना डारो कुबुध नसाय ।
डेरा पावो सतलोकमें, सतगुरु शब्द समाय ॥ १३ ॥
ढढ़ा-ढूँदत फिरौ तुम कौनकूँ, ढूँढे सो ढिगनेरे । ढोल मारके सबे चिताऊँ, सतगुरु शब्द निबेरे ॥ है तू कौन कहाँ से आया,
(५०४)
कवीरपंथी—
कहूँ निजघर तेरा । केहि कारन तुम भरमत डोडौ, तन तज कहाँ बसेरा ॥
सा०—को रक्षक है जीवका, गहो ताहि पहिचान ।
रक्षकके चीन्हे बिना, अन्त होयगी हान ॥१४॥
णणा-गुणातीत निर्गुण अविनासी, दयानिधि सुखसागर । निह- चल ठौर निरंतर बासा, नाम अनादि उजागर ॥ निर्मल अमी कांति छबि अदबुद, अकह अजावन सोई । नख सिख नाभि नैन मुख नासा, श्रवण चिकुर सम होई ॥
सा०—चिकुरनके उजियारमें, कोटिन बुध सरमाय ।
कहा कांत छबि वरनो, वरणत बरनि न जाय ॥ १६ ॥
तत्ता-ताहि पुरुषके अंस जीव है, धर्मराय ठगि राखा । तारन तरन आप कहलावै, वेद शास्त्र अबिलाखा ॥ तत्त प्रकृति त्रिगुन तन बंधा, नीर पवनकी बारी । धर्मराय यह रचना कीन्ही, जहाँ जीव बैठारी ॥
सा०—जीवहिं लाग ठगौरी, भूले आपन देश ।
सुमिरन करहीं कालका, भुगते कष्ट कलेस ॥ १६ ॥
थथ्या-थकित भया जिव भरमत डोलै, चौरासीके माहीं । नाना कष्ट जन्म त्रास जो व्यापै, जरे मरे पछताहीं ॥ थाह न पावै बिपत कष्टको, बूढ़ै संसे धारा । भौसागरके विषम लहर है, सूझे वार न पारा ॥
सा०—बिकल परे अघ जोयनेमें, बहुविधि करे पुकार ।
सतगुरु शब्द चीन्हे बिना, कैसे उतरे पार ॥१७॥
ददा-दुंद वाद है बहुत देहमें, परचे तहाँ न पावै । नर तन धर सो साहब सुमिरे, तो जम निकट न आवै ॥ दरस कराऊँ सत्त पुरुषका, देह हिरंमर पैहो । सुख सागर सुख बिलसो हंसा, भौजल बहुर न ऐहो ॥
शब्दावली
(५०५)
सा०-ऐसा सुख घर छाड़के, आगे दुखका भार ।
भर्मेवस जिव भेद न जाने, लखै न शब्द हमार ॥ १८ ॥ धध्या-धर्म धर्मकर सबै पुकारै, धर्महिं चीन्ह न पावै । धर्मराय तिहुँ लोकहिं प्रासे, जीवत बाँध झुलावै ॥ घोखा दे सबको मारे, सुरनर मुनि नहीं बाँचे । नर बपुराकी कौन चलाये, तन धर धर सब नाचे ॥
सा०-भक्षक कला दिखायके, पुनि धरि रक्षक भाय ।
रक्षक जान जपै जिव, पुनि तेहि भक्ष कराय ॥१९॥ नन्ना-निर्भय नाम लौ लावे, नकल चीन्ह पर त्यागो । नाद विन्दते न्यारा कहिये, सुरत सोहंगम पागो ॥ निराधार निहतत निहअच्छर, निह संसै निहकामी । निःस्वादी निर्मल अविगत, निर्हचित सुखधामी ॥
सा०-रामसनेही चेतो हो, भाषो घरको डोर ।
परखोगुरुगम सुरतसे, चलो त्रिन जम तोर ॥ २० ॥
पप्पा-पाप पुन्यमें जग अरुझाने, पार कौन विधि पावे । पाप पुन्य भुगते नर धर धर, फिर फिर जम लेजावे ॥ प्रेम भक्ति परमात्म पूजा, परमारथ चित धारे । पावन जन्म परम पद पावे, पारख शब्द विचारे ॥
सा०-प्रीतम विरह वियोग जेहि, परिहर कपट कुचाल ।
पिड पिड रटन लगावो, पाँव परे तेहि काल ॥ २१ ॥
फफ्फा-फरामोसकर फिकर, फहम करो दिल माहीं । परफुल्लित संतन गुन गावो, जम तेहि देखि डराहीं ॥ फाजिल सो जो आपा मेटे, फना होय गुन गावै । फांसी काटे करन भरमकी, जमके हाथ न आवै ॥
(५०६)
कवीरपंथी-
सा०-फेर फेर नर भर्म बस, भर्महिं भटका खाय ।
तीरथ बरत लगी जिव भरमें, उरसर प्यास न जाय ॥२२॥ बब्बा-ब्रह्म बसत सरव भूतमें, दुनिया भाव न होई । वर्तमान चित् चेतत नाहीं, भूत भविष्य बिलोई ॥ बड़े बड़े विषम बुद्धि लागे, बोलनहार न जोवे । ब्रह्म दुखित कर पाहन पूजे, बरबस आप बिगोवे ॥
सा०-बंध परे नर कालके, बुद्धि ठगाई जान ।
बंध छुडा बाहर चलूं, मोहि गहो पहिचान ॥ २३ ॥
भम्भा-भार परे यह देश बिगाना, भवसागर औगाहा । भगत अभगत दोऊ कह बोरे, कोई न पावे थाहा ॥ भक्षकने लीला विस्तारी, कला अनेक दिखावे । भक्षकको रक्षक कर थापै, रक्षक चीन्ह न पावे ॥
सा०-भछे जाहि सो भक्षक, रक्षक रहे निनार ।
परम चक्रमें परे जिव, लखे न शब्द हमार ॥२४॥
मम्मा-मन मैंगल मस्त दिवाना, जीवहि उभट चलावे । अक- रम क्रम करै मन आपै, पीछे जिव दुख पावे ॥ मोह बस जिव मन नहिं चीन्हे, जाने यह सुखदाई । मार लगे जब मन होय न्यारा, नरक परे जिव जाई ॥
सा०-मन गज अगुवा कालको, परखो संत सुजान ।
अंकुस सतगुरु ज्ञान है, मन मतंग भय मान ॥२५॥
जज्जा-जो जिव सतगुरु शब्द समावे, तो जम होवे चेरा । जुगत जुगत कर मनको जीतो, सहजे होय निवेरा ॥ जहँ लग काल जाल विस्तारी, सो सब मनकी बाजी । मनहिं निरजन राजा कहिये, मन पंडित मन काजी ।