कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
कोई कहै राम कोइ रहमाना । ब्रह्मज्ञानी एककै जाना ॥ ५४ ॥ ब्रह्मज्ञान बाँचे नहीं कोई । पानी मिलै कौन सिंधि होई ॥ वाको सुख यह कैसे पावै । यह बैठे वह खाइ उडावै ॥ ५५ ॥
साखी०—ऐसे डूबे षट् दर्शन, और सकल संसार ।
कविरा हमरे शब्द विनु, कोइ न पावै पार ॥ ७ ॥
रमैनी-लोग कहैं हमही होय स्याना । साँच कहौं कोई नहीं माना ॥ काम झरै कन्दूप नित झरई । ताको कोइ विचार न करई ॥ ५६ ॥ कंदरप यह निकस उपजाना । ताको विरही छटी बखाना ॥ जेहि पिता पुत्रको पालै । जीवन जनम सुफल कर जाने ॥ कहैं हमारो आगो चलिहै । चीन्है नहीं कालको बलि है ॥ ५७ ॥
साखी—तैसहि सुता दिढावै, अपने वसीठ चलान ।
दान दहेज दे कर जोरै, कहूं कि उन सरमान ॥ ८ ॥
रमैनी—कहु कौनसी कर यहु आवै । ताको सब मिल माथ नवावै ॥ रहौ पछताई काल धर खावा । जनम जनम पाछे पछतावा ॥ ५८ ॥
सा०—मानै शब्द बंदि जम छूटै, बातै सुनत भयान ।
कहैं कवीर नर भोइ, लोके वेद भुलान ॥ ९ ॥
रमैनी—छाड़हु लाज और छाड़हु बडाई । छाड़हु झूठ जो कथा चलाई ॥ छाड़हु पाखंड छाड़हु भेषा । छाड़हु सब पापन- को लेषा ॥ ५९ ॥ छाड़हु तीरथ वरत फल भाई । तजौ जोग आतम समझाई ॥ तजौ आसन जो बैठक दीना । छाड़हु सुन्न सिखर मन चीना ॥ ६० ॥ चीन्हो जस हम जो चिन्हावै । अपर करै सतलोक पठावै । सुन्न सिखरमैं धरम अन्याई । तिह डहकेको शक्ति पठाई ॥ ६१ ॥ माता बहनी भनजी होई ॥