भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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मिहरी सुता हुइ बैठी सोई ॥ औरो कुल बहु भांत बनाई। वरन चारमें सब डहकाई ॥ ६२ ॥ जोगियन तपियन अपडर कीना। भाज भाज उन बनखंड लीना ॥ तिनको खनि खनि कंद खवावे। गिरह दारा सुख सबै छुटावे ॥ ६३ ॥ एक जनम भर मिथ्या खोवै। एक जो गुफाके माहीं सोवै ॥ एक जोग जग उदासी फिरई। मन मथ जोग प्रान हत करई ॥ ६४ ॥ एक नगन हुइ आपु दिखावै। चौहटे नट जस पसू नचावै ॥ ऐसे तीनों लोक नचावे। धरम रायको मरम न पावै ॥ ६५ ॥ धरम अहै परपंची देवा। उनहू कीन अमलको भेवा ॥ सकती लै परपंच बनाये। जुग जुग जीव सबै डहकाये ॥ ६६ ॥ वेद कितेब फंद एक कीनौ। मन बच करम सबै जुग लीनौ ॥ वेदहि रच रच ग्रंथि जु दीना। वेद विचारै पेर न चीन्हा ॥ ६७ ॥ तिन ग्रंथिन अटके सब कोई। तिनते छुटत बडो दुख होई ॥ तिन ग्रंथिन जोरे छुटाऊँ। करि अमर सतलोक पठाऊँ ॥ ६८ ॥ अक्षर कहै सो कीजै भाई। हंस होइ सतलोकै जाई ॥ पांच दूत यहि तनमें जाना। यह तो धरम राइका बाना ॥ ६९ ॥ परधन त्रिया क्रोध विकारो। लोभ मोह तिशानाको जारो ॥ पांच पचीसको संग्रह छूटे। धरम राइको जम कुल लूटे ॥ ७० ॥ सत शब्दमें डोर समावै। रहनि गहनि सतलोकै पावै ॥ विनु रहनी कछु काज न होई विनु गहनी सतलोक न कोई ॥ ७१ ॥

साखी-कह कवीर निरमल होय, काट करमके फंद ।

अमरलोक निहचल भये, जुग जुग करे अनन्द ॥१०॥

इति निरख प्रबोधकी रमैनी सम्पूर्ण शुभम् ।