भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

अथ ज्ञानचौतीसा प्रारंभः ।

कक्का-केता कहे कवीर कहा कोई नहि मानै । कायामैं कर- तार, नाहिं कोई पहिचानै । कर्म बन्ध संसार, काल सों नहिं बचन है । अरे हाँ अवधू ! काम कोध हंकार, कल्पना कठिन है ॥ १ ॥

खरुखा-खारी सो कह खाँड; खाँड खारी विधि लेखै । खरे खोटको न्याव, नहीं हिरदय विवेखै ॥ खोरिन खोरिन फिरे, खाक मुख लायके । अरे हाँ अवधू ! खसम परो न चीन्हि, रहे खिसियायके ॥ २ ॥

गगगा-ग्यान सोई निज सार, जाही सो थिर भया । कर्मको टूटयो फन्द, द्रन्द्व सब खिरगया ॥ ग्यानी कथै अगाध, रहै हिया फेर फारके । अरे हाँ अवधू ! गाडि रक्यो बातनको, लेगौ चोर उखारिके ॥ ३ ॥

घच्छा-घटमें आतम राम, मिलो साहब सना । घरमें प्रेम निधान, चेत मेरे मना ॥ जहाँ नहीं घाम नहिं छाहैं, तहाँ इन घर करा । अरे हाँ अवधू ! घरकी सुरत बिसार, घसीटनमें परा ॥ ४ ॥

डडा-( नन्ना ) नयन विना नर अंध, द्रन्द्व धोखा धरा । सूझे वार न पार, प्रान परबस परा ॥ नितकै संशय झूल, मूल विसराइया । अरे हाँ अवधू ! नहीं भयो निरशंक, मुक्ति किन पाइया ॥ ५ ॥

चच्चा-चले जात नर नष्ट, चौरासी धारमें । बिन चीन्हे यहि चले, परे भौभारमें ॥ चतुर बिचच्छन होइ कहो कहँवाँ लगे । अरे हाँ अवधू ! पडे चोरके हाथ, चीन्हि नाहीं भगे ॥ ६ ॥

छच्छा-छल व्यवहारके धोखा छाडहू । काम कोध अहंकार