भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(४९५)

मिहरी सुता हुइ बैठी सोई ॥ औरो कुल बहु भांत बनाई। वरन चारमें सब डहकाई ॥ ६२ ॥ जोगियन तपियन अपडर कीना। भाज भाज उन बनखंड लीना ॥ तिनको खनि खनि कंद खवावे। गिरह दारा सुख सबै छुटावे ॥ ६३ ॥ एक जनम भर मिथ्या खोवै। एक जो गुफाके माहीं सोवै ॥ एक जोग जग उदासी फिरई। मन मथ जोग प्रान हत करई ॥ ६४ ॥ एक नगन हुइ आपु दिखावै। चौहटे नट जस पसू नचावै ॥ ऐसे तीनों लोक नचावे। धरम रायको मरम न पावै ॥ ६५ ॥ धरम अहै परपंची देवा। उनहू कीन अमलको भेवा ॥ सकती लै परपंच बनाये। जुग जुग जीव सबै डहकाये ॥ ६६ ॥ वेद कितेब फंद एक कीनौ। मन बच करम सबै जुग लीनौ ॥ वेदहि रच रच ग्रंथि जु दीना। वेद विचारै पेर न चीन्हा ॥ ६७ ॥ तिन ग्रंथिन अटके सब कोई। तिनते छुटत बडो दुख होई ॥ तिन ग्रंथिन जोरे छुटाऊँ। करि अमर सतलोक पठाऊँ ॥ ६८ ॥ अक्षर कहै सो कीजै भाई। हंस होइ सतलोकै जाई ॥ पांच दूत यहि तनमें जाना। यह तो धरम राइका बाना ॥ ६९ ॥ परधन त्रिया क्रोध विकारो। लोभ मोह तिशानाको जारो ॥ पांच पचीसको संग्रह छूटे। धरम राइको जम कुल लूटे ॥ ७० ॥ सत शब्दमें डोर समावै। रहनि गहनि सतलोकै पावै ॥ विनु रहनी कछु काज न होई विनु गहनी सतलोक न कोई ॥ ७१ ॥

साखी-कह कवीर निरमल होय, काट करमके फंद ।

अमरलोक निहचल भये, जुग जुग करे अनन्द ॥१०॥

इति निरख प्रबोधकी रमैनी सम्पूर्ण शुभम् ।

(४९६)

कवीरपंथी-

अथ ज्ञानचौतीसा प्रारंभः ।

कक्का-केता कहे कवीर कहा कोई नहि मानै । कायामैं कर- तार, नाहिं कोई पहिचानै । कर्म बन्ध संसार, काल सों नहिं बचन है । अरे हाँ अवधू ! काम कोध हंकार, कल्पना कठिन है ॥ १ ॥

खरुखा-खारी सो कह खाँड; खाँड खारी विधि लेखै । खरे खोटको न्याव, नहीं हिरदय विवेखै ॥ खोरिन खोरिन फिरे, खाक मुख लायके । अरे हाँ अवधू ! खसम परो न चीन्हि, रहे खिसियायके ॥ २ ॥

गगगा-ग्यान सोई निज सार, जाही सो थिर भया । कर्मको टूटयो फन्द, द्रन्द्व सब खिरगया ॥ ग्यानी कथै अगाध, रहै हिया फेर फारके । अरे हाँ अवधू ! गाडि रक्यो बातनको, लेगौ चोर उखारिके ॥ ३ ॥

घच्छा-घटमें आतम राम, मिलो साहब सना । घरमें प्रेम निधान, चेत मेरे मना ॥ जहाँ नहीं घाम नहिं छाहैं, तहाँ इन घर करा । अरे हाँ अवधू ! घरकी सुरत बिसार, घसीटनमें परा ॥ ४ ॥

डडा-( नन्ना ) नयन विना नर अंध, द्रन्द्व धोखा धरा । सूझे वार न पार, प्रान परबस परा ॥ नितकै संशय झूल, मूल विसराइया । अरे हाँ अवधू ! नहीं भयो निरशंक, मुक्ति किन पाइया ॥ ५ ॥

चच्चा-चले जात नर नष्ट, चौरासी धारमें । बिन चीन्हे यहि चले, परे भौभारमें ॥ चतुर बिचच्छन होइ कहो कहँवाँ लगे । अरे हाँ अवधू ! पडे चोरके हाथ, चीन्हि नाहीं भगे ॥ ६ ॥

छच्छा-छल व्यवहारके धोखा छाडहू । काम कोध अहंकार

शब्दावली

(४९७)

कि, लोभ निवारहू । क्षमा शील सन्तोष, सत्य हियमा धरो । अरे हाँ अवधू ! परख, बोलता ब्रह्म चीन्ह ताके करो ॥ ७ ॥

जन्मा-जग जीवन जगदीस, जगत गुरु जीव है । जाने जान सुजान, सोई निज पीव है ॥ खोजो जो नव खण्ड, भेद निज कहि दिया । अरे हाँ अवधू ! जुग जुग अविचल जीव, कवीर गुरु कहि दिया ॥ ८ ॥

झइझा-झूठ झगरा छोड़, इन्द्रमें कहा परो । झलक मनी उजियार, निकट हियमें धरो ॥ झाड़ पातको छोड़, सार निज ताय ले । अरे हाँ अवधू ! कहा झखे मतिहीन, परम गुन गायले ॥ ९ ॥

नन्ना-नाह छोड़ि नरा, नार चली है जारपै । पियाकी सुरत बिसार, तो आशिक यारपै ॥ नीच बुद्धि मतिहीन, नहीं स्वारथ भयो । अरे हाँ अवधू ! जार बसे हिय माँहि, नरक ताते गयो ॥ १० ॥

टट्टा-टीडी भया जहान, उडा आसमान कूँ । हटा नेह निदान, चला घमसामकूँ ॥ टाराही नहिं टरे, भरम धोखा परा । अरे हाँ अवधू ! कठिन, टेक मनमें धरी, तार टूटिया मरा ॥ ११ ॥

ठट्टा-है ठोरेके ठोरे, दूर धोखा भया । ठोकै सबहिं कपाल, गुसैयां कित गया ॥ ठठके बेडा बांधि, पार कोई ना तरा । अरे हाँ अवधू ! ठाकुर, बिसराय, काम ठगसों परा ॥ १२ ॥

डड्डा-डसे भुवंगम चोर, विरह विष बाढिया । डसे जो चतुर सुजान, विरहमें ढारिया ॥ डार पातकूँ छोड़ि, सिपत सबहिं किया । अरे हाँ अवधू ! डंड बाजके हाथ, प्रान अपना दिया ॥ १३ ॥

ढट्टा-ढोल मारि गुरु कहै, सबन सों टेरिके । ढूँढे सरग पताल, थके सब हेरिके ॥ कहूँ ढूँढे मतिहीन, कहाँ भटकत फिरे अरे हाँ अवधू ! ढिगही परमानन्द, चीन्हि नहीं परे ॥ १४ ॥

(४९८)

कवीरपंथी-

णणा-नन्ना निरगुन निरंकार, निरञ्जन सब जपे । नहि रूप नहि रेख, ताहीको सब थपे ॥ जहाँ नहीं तहाँ सही, सही तहाँ नहि किया । अरे हों अवधू ! नर अज्ञानी असल भिटाय, नकल सिर पर लिया ॥ १६ ॥

तत्ता-तत्त्व यही निज सार, और कहु ना मिले । तुही तुही निज तुही, हिरदामें देखले ॥ तिरखावन्त पुनि साधु, तलफ जाकी धरे । अरे हों अवधू ! सो बोले घट माहिं, और ले क्या करे ॥ १६ ॥

थथथा-थकित भये नर नारि, सो ढूँढे ना मिले । थिर होय लखै न आप, अहमें सब गले ॥ जहाँ अति अगम अथाह, तहाँ थाह नहीं चले । अरे हों अवधू ! थित विन थैमें कौन, बहे भौमें भले ॥ १७ ॥

दहा-दूसर कोई नाहिं, द्रन्द्रमें कहाँ परो । दया धर्म सत शील, साधु सेवा करो ॥ दिलकी दुबिधा छाड़ि, काम एता किया । अरे हों अवधू ! दिग्य दृष्टिसे देख, दरस दिलमें लिया ॥ १८ ॥

धधधा-धन्य धन्य सो भाग, जाही परतीत है । यही ध्यान धनसार, और विपरीत है ॥ धावे सकल जहान, धोखामें सब परे । अरे हों अवधू ! चहुँ दिस ढुंद बहाल, सूत्रकूँ सब चले ॥ १९ ॥

नन्ना-निरख देख निज नैन, आपमें आप है । निरभय धजा निशान, अगर फहरात है ॥ निसा मान भरपूर, परम सुख पाइहो ॥ अरे हों अवधू ! निसि वासरको सोग, सबे विसराइ हो ॥ २० ॥

पप्पा-पप्पा पूर्ण ब्रह्म है, प्रेमते और न कोई । काया बीर कवीर, परम गुरु निहचे सोई ॥ पत्थर पूजे प्रेत, पार किन पाइया । अरे हों अवधू ! पैडा परो न चीन्ह, मूल जहँडाइया ॥ २१ ॥

फफ्फा-फल लागे बड दूर, बीज बकला विना । कौन खवावे तोर,

शब्दावली

(४९९)

फहम अकला विना ॥ फिरते रहे खुलान, फिकर दिलमें रही । अरे अवधू ! फिकर मिटे दिल माहिं, फकीरी तब सही ॥२२॥

बब्बा-बिबि अक्षर ठहराय, वृछ जो राखि हों। वेद शास्त्र बहु ग्रन्थ, अदभुत भाखिहों ॥ बकता बकत विस्तार, बहु विधि ले बढा। अरे हों अवधू ! भीतर भरी भंगार, कनक ऊपर मढी ॥२३॥

भम्भा-भरमें सकल जहान, कहे यहाँ कछु नहीं। आपहिं फन्द बनाय, भरम कीन्हों सही ॥ डार भगमकी मोट, भरमना करम है। अरे हों अवधू ! भीतर है भरपूर, तो बाहर भरम है ॥२४॥

यव्या-(जजा) जो तुम चतुर सुजान, जगत गुरु जानले । जिन सिरजी सकल जहान, ताहि पहिंचान ले ॥ एक ज्योति जगमाहिं, जगामग होय रही । अरे हों अवधू ! उन थापी निनार, तहाँ कछु है नहीं ॥ २५ ॥

ररा-राम राम सब जपे, राम सो ना मिले । आतम राम विसार, सूत्रकूँ सब चले ॥ सूत्र सनेहो राम, कहो किन पाइया । अरे हों अवधू ! जुग जुग आतम राम, कवीर गोहराइया ॥२६॥

लछा-लाज बीज पत खोय, भांड मूरख भये । लाधा विष निज मूल, लालसों ना लिये ॥ लगी दवा चहुँ ओर, लपटमें सब परे । अरे हों अवधू ! कदहिं न गयो भम, सकल सरबस बरे ॥ २७ ॥

बब्बा-वाही की परतीत, वाहि विन और न कोई । वो सबके सिरताज, काज वासे सहि होई ॥ वह नहिं आवे जाय, सबन सो भिन्न है । अरे हों अवधू ! ऐसी अकल विवेक, सबन किन्ह है ॥ २८ ॥

सस्सा-संसय भयो अथाह, सासत जिवको भई । इहाँ मिल- नको नाहिं, सिपत सबदिन कही ॥ सिद्ध साधु संसार, सबै

(५००)

कवीरपंथी—

सुमिरन करै । अरे हों अवधू ! सुकृत पडे न चीन्ह, नहीं संसै टरै ॥ २९ ॥

षष्ण-षोजो खोजी होय, षोज नाही मिलै । खोजी खोज सिरी न, कहो तुम कहाँ चले ॥ जहाँ मिलनकी मौज, खोज तहाँ ना किया । अरे हों अवधू ! खायो मूल गँवार, खसम दिल ना दिया ॥ ३१ ॥

सस्सा-सत्य सुकृत सतनाम, सबनमें सांच है । सत रूप जगमाहिं, तो मनसा बाच है । संशय टारन भयहरन, सब कल निधि है सही । अरे हों अवधू ! जो पूछो सो कही, अब का कही ॥ ३२ ॥

हहा-हाजिर सो हजूर, गाफिली दूर है । हिरदा कमलमें हंस, सजीवन मूर है ॥ हँसे हँसावे आप, सबनमें सोह है । अरे हों अवधू ! हितकर देख विचार, वचन यह सोह है ॥ ३३ ॥

छछा-छल जो गया सब छूट, महा आनन्द भया । मिटी जो जमका त्रास, छत्र सिरपर धरा ॥ छाप सतकी पड़ी काज पूरन भया । अरे हों अवधू ! कहे कवीर विचार, विछड़ मिलना भया ॥ ३४ ॥

सा०-शीलवन्त सुजन जन, हिरदे प्रेम प्रकास । सत्य टेक शब्दे गहे, सोजन सदा निवास ॥

इति चौतीसा पहला ।

अथ दूसरा चौतीसा प्रारम्भः २ ॥

कक्का-काया कुंज करमकी बारी, कर्ता बाग लगाया । किन- का तामे अजर समाना, बिन बेली पलुहाया ॥ पांच पचीस फूल तहाँ फूले, मन अलि तहाँ लुभाना । वा फूलनके लपट विषयरस, रमता राम भुलाना ॥

शब्दावली

(५०१)

सा०-मनभवंरा यह कठिन है, विषय लहर लपटाय ।

ताहि संग रमता बहे, फिर फिर भटका खाय ॥ १ ॥

खरखा-खलककी खबर नहीं, ख्वाब ख्यालमें भूला ॥ खाना दाना जोडा घोडा, देख जवानी फूला ॥ खासा पलंग सेज बनि तोशक, तकिया फूल बिछाया । नवल नार ले तापर पौढे, काम लहर उमड़ाया ॥

सा०-लागी नारि पियारि जब, छुटा धनीसों नेह ।

काल जबै ले ग्रासई, खाक होयगी देह ॥ २ ॥

गगगा-गुरु कीजे निरख परख के, ज्ञान रहनका पूरा । गर्भ गुमान मदन मद त्यागी, दया क्षमा सतसूरा ॥ गेल बतावै अमर लोककी, गावै सतगुरु बानी ॥ मन गज सिर अकुंश दे बैठे, गुरु ग्यान मल तानी ॥

सा०-पाप पुन्यकी आशा नाहीं, करम भरमको न्यार ।

किरतम पाखंड परिहरे, अस गुरु करो विचार ॥ ३ ॥

घच्चा-घन गुरु ज्ञान बिना अँधियारा, मोह तिमिर तन छाया । सार असार बिचारे नाहीं, अमी छोड़ि विष खाया ॥ घरका घृत रेतेमें डारे, छाछ ढूँढता डोले । कश्चन दैके काच विसाहै, हर विगराना तौले ॥

सा०-ज्ञान बिना नर अंध है, अंध कर्म मत हीन ।

सांच गहे नहिं परखिके, झूठेके आधीन ॥ ४ ॥

उवाँ-ऊन मत मानो संतो, गहो परमारथ बानी । उपज सुख तब हिये तुम्हारे, जब परखो मम बानी ॥ ऊँच नीच कछु है नहीं, कर्म कहावै छोटा । जिसके करनी अन्दर नाहीं, सोई माल है खोटा ॥

(५०२)

कबीरपंथी—

सा०—ऊपर माला जटा जनैऊ, माथे तिलक सुहाय ।

संसै सोग घटभीतर, अंदर मैल रहाय ॥ ६ ॥

चन्ना-चित चेनो चतुर चिकनियाँ, चैन कहा तुम सोया । चतुराई सबभार परैगी, जन्म अकारथ खोया ॥ चौथा पन तेरो आय लगा, अजहुँ चेत गुरु ज्ञानी । नहिं तो परिहौ खोह अंधियारे, फिर पाछे पछताना ॥

सा०—ऐसे पाटन आयकै, सौदा करो बनाय ।

जो चूकौ या जन्मसे, तो दुख भुगतो जाय ॥ ६ ॥

छछछा-छल बल छिनमें निकसि जायगा, जब छेकै जम आई । छट पट करे मरे विष ज्वाला, तब कहु कौन सहाई ॥ जमके मुगदर सिरपर बाजै, तब करिहौ किलकारी । तात मात आता सुत सज्जन, काम न आवै नारी ॥

सा०—छूटी सकल सगाई, भया चोरका हाल ।

संगी सब न्यारा रहे, आप परै सुख काल ॥ ७ ॥

जजा-जमके पाले जबै परै जिव, तब कहु बात न आवै । तहां कहु चाले नाही, सीस धुनी पछतावै ॥ जम ले पहुँचे चित्र- गुपित पहाँ लिखनी लख विचारे । दयाहीन गुरु बेसुख ढाढे, अगिनकुण्डमें डारे ॥

सा०—जन्म सहस्र अजगर देवे, विषज्वाला अकुलाय ।

पीछे किमि विष्टा माँही, भूत खान परजाय ॥ ८ ॥

झइझा-झाखन झूखन छांडो, झमकि करो गुरु सेवा । झाई मनकी दूर बहावो, परख शब्द गुरु देवा ॥ झगरा झूठ झाई जग त्यागो, झपट भजो सतनामा । झीन करो मन मेरु मन्दिरमें, गुरु पद पैकज विश्रामा ॥

सा०—होइ अधीन गुरु चरण गहो, कपट भाव कर दूर ।

ज्यों पतिव्रता पति गही, तर्कै न दूसर क्रूर ॥ ९ ॥

शब्दावली ।

(५०३)

जन्मा-इशक बिना मिले नहीं साहब, केतो भेख बनाये । इशक खुशक न छिपे छिपाये, के तो कोई छिपावे ॥ इत उत यहाँ उहाँ सब त्यागो, निहचे गहो गुरु शरना । याहीसे हो दुख नसे, मिटे जनम औ मरना ॥

सा०-आदि नाम है जा हिये, सोईं गुरु है सार ।

कीतमको जो ध्यावई, सोईं भव लगे न पार ॥ १० ॥

टढ़ा-टीम टाम बाहर बहुतेरा, दिल दासीसे बंधा । संख धुन लेकरे आरती, छुटा न घरका धंधा ॥ टिकुली सेंदुर चरखा पूनी, दासीने फुरमाया । कच्चे बच्चेने मांग मिठाई, मगन भये तब लाया ॥

सा०-जिन सेवक पूजा दर्ई, ताहि दर्ई आसीस ।

जहाँ नहीं तहाँ टेढे भये, कहै भसम करो जगदीस ॥ ११ ॥

ठढ़ा-ठग बहुतेरे भेख बनावे, गले लगावै फांसी । स्वांग बनाये कौन नफा है, जो न भजै अविनासी ॥ ठोकर सहे गुरुके आगे, ठीक ठौर तब पावे । ठकठक मेटे जरा मरणका, जमके हाथ न आवे ॥

सा०-भूतक होय गुरु चरण गहे, ठसक करे सब दूर ।

कायर ते नहीं भगति होय, ठानि रहै कोई सूर ॥ १२ ॥

डढ़ा-डगमगसे कछु काज न सरिहै, अडिग नाम गुण गहिये । डर मेटे तब विषय कालको, अच्छे अमर पद लहिये ॥ डरते रहिये गुरु साधुसे, डिंभ काम नहीं आवै । डिंभ जुबावै भव- सागरमें, जनम मरन दुख पावै ॥

सा०-डेढ दिनाको जीवना डारो कुबुध नसाय ।

डेरा पावो सतलोकमें, सतगुरु शब्द समाय ॥ १३ ॥

ढढ़ा-ढूँदत फिरौ तुम कौनकूँ, ढूँढे सो ढिगनेरे । ढोल मारके सबे चिताऊँ, सतगुरु शब्द निबेरे ॥ है तू कौन कहाँ से आया,

(५०४)

कवीरपंथी—

कहूँ निजघर तेरा । केहि कारन तुम भरमत डोडौ, तन तज कहाँ बसेरा ॥

सा०—को रक्षक है जीवका, गहो ताहि पहिचान ।

रक्षकके चीन्हे बिना, अन्त होयगी हान ॥१४॥

णणा-गुणातीत निर्गुण अविनासी, दयानिधि सुखसागर । निह- चल ठौर निरंतर बासा, नाम अनादि उजागर ॥ निर्मल अमी कांति छबि अदबुद, अकह अजावन सोई । नख सिख नाभि नैन मुख नासा, श्रवण चिकुर सम होई ॥

सा०—चिकुरनके उजियारमें, कोटिन बुध सरमाय ।

कहा कांत छबि वरनो, वरणत बरनि न जाय ॥ १६ ॥

तत्ता-ताहि पुरुषके अंस जीव है, धर्मराय ठगि राखा । तारन तरन आप कहलावै, वेद शास्त्र अबिलाखा ॥ तत्त प्रकृति त्रिगुन तन बंधा, नीर पवनकी बारी । धर्मराय यह रचना कीन्ही, जहाँ जीव बैठारी ॥

सा०—जीवहिं लाग ठगौरी, भूले आपन देश ।

सुमिरन करहीं कालका, भुगते कष्ट कलेस ॥ १६ ॥

थथ्या-थकित भया जिव भरमत डोलै, चौरासीके माहीं । नाना कष्ट जन्म त्रास जो व्यापै, जरे मरे पछताहीं ॥ थाह न पावै बिपत कष्टको, बूढ़ै संसे धारा । भौसागरके विषम लहर है, सूझे वार न पारा ॥

सा०—बिकल परे अघ जोयनेमें, बहुविधि करे पुकार ।

सतगुरु शब्द चीन्हे बिना, कैसे उतरे पार ॥१७॥

ददा-दुंद वाद है बहुत देहमें, परचे तहाँ न पावै । नर तन धर सो साहब सुमिरे, तो जम निकट न आवै ॥ दरस कराऊँ सत्त पुरुषका, देह हिरंमर पैहो । सुख सागर सुख बिलसो हंसा, भौजल बहुर न ऐहो ॥

शब्दावली

(५०५)

सा०-ऐसा सुख घर छाड़के, आगे दुखका भार ।

भर्मेवस जिव भेद न जाने, लखै न शब्द हमार ॥ १८ ॥ धध्या-धर्म धर्मकर सबै पुकारै, धर्महिं चीन्ह न पावै । धर्मराय तिहुँ लोकहिं प्रासे, जीवत बाँध झुलावै ॥ घोखा दे सबको मारे, सुरनर मुनि नहीं बाँचे । नर बपुराकी कौन चलाये, तन धर धर सब नाचे ॥

सा०-भक्षक कला दिखायके, पुनि धरि रक्षक भाय ।

रक्षक जान जपै जिव, पुनि तेहि भक्ष कराय ॥१९॥ नन्ना-निर्भय नाम लौ लावे, नकल चीन्ह पर त्यागो । नाद विन्दते न्यारा कहिये, सुरत सोहंगम पागो ॥ निराधार निहतत निहअच्छर, निह संसै निहकामी । निःस्वादी निर्मल अविगत, निर्हचित सुखधामी ॥

सा०-रामसनेही चेतो हो, भाषो घरको डोर ।

परखोगुरुगम सुरतसे, चलो त्रिन जम तोर ॥ २० ॥

पप्पा-पाप पुन्यमें जग अरुझाने, पार कौन विधि पावे । पाप पुन्य भुगते नर धर धर, फिर फिर जम लेजावे ॥ प्रेम भक्ति परमात्म पूजा, परमारथ चित धारे । पावन जन्म परम पद पावे, पारख शब्द विचारे ॥

सा०-प्रीतम विरह वियोग जेहि, परिहर कपट कुचाल ।

पिड पिड रटन लगावो, पाँव परे तेहि काल ॥ २१ ॥

फफ्फा-फरामोसकर फिकर, फहम करो दिल माहीं । परफुल्लित संतन गुन गावो, जम तेहि देखि डराहीं ॥ फाजिल सो जो आपा मेटे, फना होय गुन गावै । फांसी काटे करन भरमकी, जमके हाथ न आवै ॥

(५०६)

कवीरपंथी-

सा०-फेर फेर नर भर्म बस, भर्महिं भटका खाय ।

तीरथ बरत लगी जिव भरमें, उरसर प्यास न जाय ॥२२॥ बब्बा-ब्रह्म बसत सरव भूतमें, दुनिया भाव न होई । वर्तमान चित् चेतत नाहीं, भूत भविष्य बिलोई ॥ बड़े बड़े विषम बुद्धि लागे, बोलनहार न जोवे । ब्रह्म दुखित कर पाहन पूजे, बरबस आप बिगोवे ॥

सा०-बंध परे नर कालके, बुद्धि ठगाई जान ।

बंध छुडा बाहर चलूं, मोहि गहो पहिचान ॥ २३ ॥

भम्भा-भार परे यह देश बिगाना, भवसागर औगाहा । भगत अभगत दोऊ कह बोरे, कोई न पावे थाहा ॥ भक्षकने लीला विस्तारी, कला अनेक दिखावे । भक्षकको रक्षक कर थापै, रक्षक चीन्ह न पावे ॥

सा०-भछे जाहि सो भक्षक, रक्षक रहे निनार ।

परम चक्रमें परे जिव, लखे न शब्द हमार ॥२४॥

मम्मा-मन मैंगल मस्त दिवाना, जीवहि उभट चलावे । अक- रम क्रम करै मन आपै, पीछे जिव दुख पावे ॥ मोह बस जिव मन नहिं चीन्हे, जाने यह सुखदाई । मार लगे जब मन होय न्यारा, नरक परे जिव जाई ॥

सा०-मन गज अगुवा कालको, परखो संत सुजान ।

अंकुस सतगुरु ज्ञान है, मन मतंग भय मान ॥२५॥

जज्जा-जो जिव सतगुरु शब्द समावे, तो जम होवे चेरा । जुगत जुगत कर मनको जीतो, सहजे होय निवेरा ॥ जहँ लग काल जाल विस्तारी, सो सब मनकी बाजी । मनहिं निरजन राजा कहिये, मन पंडित मन काजी ।

शब्दावली

(५०७)

सा०-गुरु प्रताप भये जोर जिव, निबल भया मन चोर ।

तस्कर लाग न पावई, जो गढपति करै अंजोर ॥२६॥

रर्ग-रहनी रहै रजनी नहिं चंपै, रमे सतगुरु बानी । रहनी बाती जीत उजियारे, जाते होय न हानी ॥ रमता राम काम कर अपना, सपना सब संसारा । रार रोस तजि सतगुरु सेवौ, जासे उतरो पारा ॥

सा०-रैन दिवस वा घर नहीं, पुरुष प्रकास अंजोर ।

ले राखूं तेहि ठाँव जिव, जहाँ न झंपै चोर ॥२७॥

लछा-लगन लगी जेहि गुरु चरणों, लच्छ प्रगट तेहि ऐसे । लगन लगी तब मगन भया मन, लोक लाज कुल कैसे ॥ लाग रहे गुरु सुरत परेखे, निज स्वारथ नहीं सूझे । लागे ठोकर पीठ न देवै, सूर सा न्मुख जूझे ॥

सा०-लागे लहर ललक मन बुधकी, निकट न आवे ताहि ।

लोटे गुरु चरणन तरे, गुरु सनेह हिय जाहि ॥२८॥

वक्वा-वाके निकट काल नहिं आवै, जो सतनाम समाना । वार पारको संसे नाही, बाहीसो मन माना ॥ वासिल बाकी काल बली की, ताही हाथ बिकाना । वारिसकूँ सौंपा दिल अपना, सबही दुन्द समाना ॥

सा०-वाही सों जिव इशक लगावे, वाजिव सखुन अजूब ।

वाबद एक करो बन्दगी, गहो पाक महबूब ॥२९॥

सरसा-सहर चोर घनघोर करै निसि, सोवै सब घरवारी । सोर न करै भर्म बस सोवै, लागी विषम खुमारी ॥ साहबसे फेरा दिल अपना, दुनियाँ बीच बैधाया । ससुरा साला साली सासू, समधी मुजन मुहाया ॥

सा०-सतगुरु शब्द पुकारई, समुझि गहै कोइ सूर ।

सुमिरि लीजो समरथको, जाना है बड दूर ॥३०॥

(५०८)

कबीरपंथी-

बध्या-षलक तजै षलक मन रोचै, नर षोये जात सब कामा । षबर नहीं घर षर्च बुटाना, चेतो रमता रामा ॥ षोल कपाट चित चेतो अजहुँ, वाहिदसे लो लावो । ष्वाब ष्याल कर दूर दिवाना, हिरदे नाम समावो ॥

सा०-षाल भरी है वायुसों, षाली होत न वार ।

षेम परे जेहि काममें, सो करू वेगि विचार ॥ ३१ ॥

सस्सा-सहज शील संतोष धीरधर, ज्ञान विवेक बिचारो । दया छमा सत संगत सेवा, शतगुरु शब्द अधारो ॥ सुमरण कर सत्त नाम धनीको, सुरा तन गहि रहना । सुमिरो अरि अँजोर परे तब, मनके संग न बहना ॥

सा०-सैन कही समुझे कोई, रहनी रहे सो सार ।

कहन तरे तो जग तरे, कहनि रहनि बिन छार ॥ ३२ ॥

हहहा-हिया माहि सत नाम समाना, दया भिहर दिल जाना । हरिके मने बिन तरा न कोई, हरिसे लोक अजाना ॥ हरि बिनुस हरि अजर अमर है, हरिमें हरिको बूझे । हाजर छोड़ बुत्तको पूजे, हह कर नाही बूझे ॥

सा०-हम हमार घर छाड़िकै, हक राह पहिचान ।

हासिल होय मकसद तब, हाफिन अमल अमान ॥ ३३ ॥

छछछा-छेल चिकनिया भया घनेरा, छाका फिरै दिवाना । छय होय जाय अमर नहि कोई, आखिरको पछिताना ॥ छर मध्ये निःअच्छर बूझे, समझे गुरु गम धावे । छरमें निःअच्छर जो जाने, निःअच्छर तब पावे ॥

सा०-निच्छर गहे विवेक करि, बावन अच्छर भिन्न ।

कहे कबीर धर्मदाससे, विरला कोई चिह्न ॥ ३४ ॥

इति ज्ञान-चौतीसा-कबीर साहबका सम्पूर्ण ॥

शब्दावली

(५०९)

अथ चौतीसा प्रारम्भः ॥

(बीचक का)

प्रथम ओंकार ॥

ॐ ओंकार-आदिहि जो जाने । लिखिके मेटि ताहि फ़िरि माने॥ ओंकार कहै सब कोई । जिनहु लखा सो बिरलै होई ॥ १ ॥

चौतीसा ॥

कका-कमल किरणिमें पावै । शशि बिगसित संपुट नहि जावै॥ तहाँ कुसुंभ रंग जो पावै । औगह गहिके गगन रहावै ॥ १ ॥ खरवा-खरुखा चाहे खोरि मनावै । खसमहि छोडि दशहू दिशि धावै ॥ खसमहि छोडि छमा है रहई । होइ अखीन अक्षय पद लहई ॥ २ ॥

गगा-गगगा गुरुके बचनै मानै । दूसर शब्द करें नहिं कानै ॥ तहाँ बिहगम कतहुं न जाई । अवगह गहिके गगन रहाई ॥ ३ ॥ घघा-घघघा घट विनशे घट होई । घटहीमें घट राखु समोई ॥ जो घट घटै घटै फ़िरि आवे । घटही माहिं फ़िर घटहि समावे ॥ ४ ॥

ड्डा-नन्ना निरखत निशिदिन जाई । निरखत नैन रहत रतनाई ॥ निमिष एकलौ तिरखै पावै । ताहि निमिषमें नैन छिपावै ॥ ५ ॥ चचा-चच्छा चित्र रच्यो बहु भारी । चित्र छोडि तू चेतु चित्र- कारी ॥ जिन यह चित्र विचित्र उलेखा । चित्र छोडि तू चेतु चितेला ॥ ६ ॥

छछा-छछछा आहि छत्रपति पास । छंकि किन रहै छोड़ि सब आसा ॥ मैं तोहि क्षण क्षण ससुझाया । खसम छोडि कस आपु बंघाया ॥ ७ ॥

जजा-जजा ई तन जियतहि जारो । जोबन जारि युगति जो

१ छंकिके रहउ मेटि सब आसा ।

(५१०)

कबीरपंथी—

पारो ॥ घटंहीं ज्योति उजियारी करै । जो कछु जानि जानि पर जै ॥ ८ ॥

झझा-झइझा अरुझि सरुझि कित जाना । हीढत दूढत जाय पराना ॥ कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जो गढ गढ़ा गढ़हि सो पावै ॥ ६ ॥ अजा-नन्ना निरर्खत नगर सनेहू । आपन करु निरुवार संदेहू ॥ नहिं देखो नहिं आप भजाऊ । जहाँ नहीं तहं तन मन लाऊ ॥ १० ॥ टटा-टट्टा विकट बाट मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥ रहे लटपटे जूटि तेहि माहीं । होहि अटल तेहि कतहुँ न जाहीं ॥ ११ ॥ ठठा ठट्टा ठौर दूरि ठग नोरे । नितके निठुर कीन्ह मन धीरे ॥ जेहि ठग ठगे सब लोग स्याना । सो ठग चीन्हि ठौर पहिचाना ॥ १२ ॥ डडा-डड्डा डर कीन्हे डर होई । डरहीमें डर राखु समोई ॥ जो डर डरै डरै फिरि आवै । डरहिमें पुनि डरहि समावै ॥ १३ ॥ ढढा-ढट्टा दूढत ई कित जाना । हीढत दूढैत जाय पराना ॥ कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जेहि दूढा सो कतहुँ न पावै ॥ १४ ॥ णणा-नन्ना दुई बसाये गाऊँ । रेनन्ना दूढे तेरा नाऊ ॥ सुये एक जाय तजि घना । मरे इत्यादिक केते गना ॥ १५ ॥ तता-तत्ता अति त्रियो नहिं जाये । तन त्रिभुवनमें राखु छिपाये ॥ जो तन त्रिभुवन माहिं छपावै । तत्वहि मिले तत्वसो पावै ॥ १६ ॥ थथा-थथ्या थाह थहो नहिं जाई । इह थोरे वह थीर रहाई ॥ थोरे थोरे थिर होहु रे भाई । विनु थम्भे जस मंदिल थंभाई ॥ १७ ॥ ददा-दढा देखहु विनशनिहारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥ दशौ द्वारमें तारी लावै । तब दयालको दर्शन पावै ॥ १८ ॥ धधा-धध्या अर्ध माहि उजियारी । अर्धहि छाड ऊर्ध मन तारी ॥

१ जो कछु युगति जानि तन जरै ।

घटही ज्योति उजियारी करै ॥

शब्दावली

(५११)

अर्ध छोड़ि ऊर्ध मन लावै । आपा मेटिके प्रेम बढ़ावै ॥१९॥ नना-नन्ना वो चौथे मह जाई । रामके गढ़हा हो खर खाई ॥ नाह छोड़ किय नर्क बसेरा । नीच अजौ चित चेतु सवेरा ॥ २० ॥ पप्पा-पप्पा पाप करै सब कोई । पापके करे धर्म नहिं होई ॥ पप्पा कहै सुनहु रे भाई । हमरेसे ये कछू न पाई ॥२१॥ फफा-फफफा फल लागो बड दूरी । चाखै सतगुरु देई न तूरी ॥ फफफा कहै सुनहु रे भाई । स्वर्ग पतालकी खबरि न पाई ॥२२॥ बबा-बब्बा बर बर कर सब कोई । बर बर किये काज नहिं होई ॥ बब्बा-बात करै अरथाई । फलके मरम न जानेहु भाई ॥२३॥ भभा-भभभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरे ते है नियरे दूरी । भभभा कहै सुनौ रे भाई । भभरे आवे भभरे जाई ॥ २४ ॥ ममा-मम्मा सेये मर्म न पाई । हमरे ते इन्ह मूल गंवाई ॥ मम्मा मूल गहल मन माना । मर्मी होय सो मर्महि जाना ॥ २५ ॥ यया-जगत रहा भर पूरी । जगतहुते जब्बा है दूरी ॥ जब्बा कहै सुनौ रे भाई । हमरेसे ये जय जय पाई ॥ २६ ॥ ररा-ररां रागि रहा अरुझाई । राम कहै दुख दारिद जाई ॥ ररां कहै सुनौ रे भाई । सतगुरु पूछिकै सेवहु जाई ॥ २७ ॥ लला-लब्बा लुतरे बात जनाई । लुतरे पावै परचे पाई ॥ अपना लुतुर औरको कहई । एकै खेत दुनौ निर्बहई ॥ २८ ॥ ववा-वब्बा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥ वह तो कहै सुनै नहिं कोई । सरग पताल न देखै कोई ॥२९॥ शशा-सरसा सर नहिं देखै कोई । सर सीतलता एकै होई ॥ सरसा कहै सुनौरे भाई । शून्य समान चला जग जाई ॥ ३० ॥ षष्ठा-षष्ठा षरा कहे सब कोई । षर षर कहै काज नहिं होई ॥ षष्ठा कहै सुनहुरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥३१॥

(५१२)

कवीरपंथी-

ससा-सस्सा सरा रच्यो वरियाई । सर बेघे सब लोग तवाई ॥ सस्साके घर सुन गुन होई । इतनी बात न जाने कोई ॥३२॥

हहा-हहहा हाय हायमें सब जग जाई । हरष सोक सब मांहि समाई ॥ हकरि हकरि सब बड बड गयऊ ॥ हहहा मर्म न काहू पयऊ ॥ ३३ ॥

क्षक्षा-छछछा छण प्रलय मिटि जाई । छेव परे तब को समुझाई ॥ छेव परे कोउ अन्त न पाया । कह कवीर अगमन गोह- राया ॥ ३४ ॥

इति चौतीसा बीजकका सम्पूर्ण ॥

अथ विप्रमतीसी प्रारम्भः ॥

सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी । हरि विनु बूड़ी नाव भरीसी ॥ ॥१॥ ब्राह्मण होयके ब्रह्म न जाने । घरमें जग्य प्रतिग्रह आने ॥२॥ जो सिरजा तेहि नहिं पहिचानै । करम भरम लै बैठि बखानै ॥ ३ ॥ ग्रहण अमावस सायर पूजा । स्वातिके पात परहिं जनि दूजा ॥४॥ प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होमकी आसा ॥५॥ कुल उत्तम कुल माहि कहावे । फिरि फिरि मध्यम कर्म करावे ॥ ६ ॥ करम असुचि उछिछे खाहीं । मति भरिष्ट जमलोकहिं जाहीं ॥ ७ ॥ सुत दारा मिलि जूठा खाहीं । हरि भगतनकी छूत कराहीं ॥ ८ ॥ नहाय खोरि उत्तम है आवे । विष्णुभक्त देखे दुख पावे ॥ ९ ॥ स्वारथ लागि रहे वे आढा । नाम लेत जस पावक डाढा ॥१०॥ राम किन्नकी छोडिन आसा । पठि गुनिभै किरतिमके दासा ॥ ११ ॥ करम करहि करमहिको धावे । जो पूछे तेहि करम हढावै ॥ १२ ॥ निःकरमीकी निंदा करई । कर्म करे ताही चित धरई ॥ १३ ॥ अस हिय भगति

शब्दावली

(५१३)

भगवतको लावे। हिरणाकुसको पंथ चलावे ॥१४॥ देखहु कुमति नरक प्रकासा। विनु लखि अंतर कृत्रिमदासा ॥ १५ ॥ जाके पूजे पाप न ऊड़े। नाम सुमिरते भवमें बूड़े ॥१६॥ पाप पुण्यके हाथहि पासा। मारि जगत जग कीन विनासा ॥१७॥ वै बहनी दोउ बहनी न छाड़े। वह गृह जारे वह गृह माड़े ॥१८॥ बैठे ते घर साहु कहावे। भितर भेद मन सुसहि लगावे ॥ १९ ॥ ऐसी विधि सुर विप्र भनीजे। नाम लेत पंचासन दीजे ॥ २० ॥ बूडि गये नहिं आपु सवौंरा। ऊँच नीच कहु काहि जोहारा ॥२१॥ ऊँच नीच है मध्यम बानी। एकै सबन एक है पानी ॥२२॥ एकै मटिया एक कुम्हारा। एकै पवनको सिरजन हारा ॥२३॥ एकै चाक बहु चित्र बनाया। नाद विहुके बीच समाया ॥ २४ ॥ व्यापी एक सकलमें जोती। नाम धरेका कहिये मोती ॥ २५ ॥ राच्छस करनी देव कहावे। वाद करे भव पार न पावे ॥२६॥ हंस देह तजि न्यारा होई। ताकी जात कहै धौं कोई ॥ २७ ॥ स्वेद सपेद कि राता पियरा। अवरन बरन कि ताता सियरा ॥ २८ ॥ हिंदू तुरुक कि बूढा वारा। नारि पुरुष मिलि करहु विचारा ॥ २९ ॥ कहिय काहि कहा नहिं माना। दास कवीर सोई पहिचाना ॥ ३० ॥

सा०-बहिया है बहिजात है, कर गहि ऐंचहु ओर।

समझाये समझे नहीं, दे धका दुई ओर ॥१॥

इति विप्रमतसौ बौजकौ।

कहरा. १

सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु, गुरुके वचन समाई हो ॥ मेली मृष्टि चरा चित राखहु, रहौ दृष्टि लौलाई हो ॥ जस दुख

कवीरपंथी शब्दावली १७

(५१४)

कबीरपंथी-

देखि रहहु यहि औसर, अस सुख होई हैं पाई हो ॥ जो खुट- कार बेगि नहिं लागे, हृदय निवारहु कोऊ हो ॥ भुगतिकी डोरी गाठि जनि खैचहु, तब बझिहैं बड रोहू हो ॥ मनु वहि कहहु रहहु मन मारे, खिजुवा खीजि न बोले हो ॥ मानु भीत मितार्ई न छोडे, कबहुँ गांठि न खोले हो । भोगउ भोग मुक्ति जनि भूलहु, जोग जुगति तन साधहु हो ॥ जो यह भांति करहु मतबलिया ता मतके चित बांधहु हो ॥ नहिं तो ठाकुर है अति दारुन करिहैं चाल कुचाली हो ॥ बांधि मारि डंड सब लेहीं, छूटहिं तब मत- वाली हो ॥ जबही सावंत आनि पहुँचे, पीठ सांठि भल दुटिहैं हो ॥ ठाठे लोग कुटुम सब देखे कहे काहुके न छुटिहैं हो ॥ एक तो निहुरि पांव परि विनवे, विनति किये नहिं माने हो ॥ अन- चीन्हे रहेहु न कियेहु चिन्हारी, सो कैसे पहिचनबेउ हो ॥ लीन्ह बुलाय बात नहिं पूछी, केवट गरब तन बोले हो ॥ जाकर गांठि समर कछु नाहीं, सो निर्थनिया है डोले हो ॥ जिन्ह सम युक्ति अगमनकै राखिन, धरिन मच्छ भरि डेहरि हो ॥ जेकर हाथ पांव कछु नाहीं, धरन लाग तेहि सो हरि हो ॥ पेलना अच्छत पेलि चलु वौरे, तीर तीरका टोवहु हो ॥ उथले रहहु परहु जनि गहिरे, मति हाथहुकी खोवहु हो ॥ तरके घाम उपरके भूँभुरि, छाहैं कतहुँ नहिं पायहु हो ॥ ऐसनि जानि पसीझेहु सीझेहु, कस न छतुरिया छायहु हो ॥ जो कछु खेल कियहु सो कीयेहु, बहुरि खेल कस होई हो ॥ सासु ननद दोऊ देत उलाटन, रहहु लाज मुख गोई हो ॥ गुरु भौ ठील गोन भई लचपच, कहा न मानेहु मोरा हो ॥ ताजी तुकी कबहुँ न साधेहु, चढेहु काठको घोरा हो ॥ ताल झांझ भल बाजत आवे, कहरा सब कोइ नाचे हो ॥ जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये, दुलहिनि तेहि रंग राचे हो ॥ नौका