कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 968 में से
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कबीरपंथी—
पारो ॥ घटंहीं ज्योति उजियारी करै । जो कछु जानि जानि पर जै ॥ ८ ॥
झझा-झइझा अरुझि सरुझि कित जाना । हीढत दूढत जाय पराना ॥ कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जो गढ गढ़ा गढ़हि सो पावै ॥ ६ ॥ अजा-नन्ना निरर्खत नगर सनेहू । आपन करु निरुवार संदेहू ॥ नहिं देखो नहिं आप भजाऊ । जहाँ नहीं तहं तन मन लाऊ ॥ १० ॥ टटा-टट्टा विकट बाट मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥ रहे लटपटे जूटि तेहि माहीं । होहि अटल तेहि कतहुँ न जाहीं ॥ ११ ॥ ठठा ठट्टा ठौर दूरि ठग नोरे । नितके निठुर कीन्ह मन धीरे ॥ जेहि ठग ठगे सब लोग स्याना । सो ठग चीन्हि ठौर पहिचाना ॥ १२ ॥ डडा-डड्डा डर कीन्हे डर होई । डरहीमें डर राखु समोई ॥ जो डर डरै डरै फिरि आवै । डरहिमें पुनि डरहि समावै ॥ १३ ॥ ढढा-ढट्टा दूढत ई कित जाना । हीढत दूढैत जाय पराना ॥ कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जेहि दूढा सो कतहुँ न पावै ॥ १४ ॥ णणा-नन्ना दुई बसाये गाऊँ । रेनन्ना दूढे तेरा नाऊ ॥ सुये एक जाय तजि घना । मरे इत्यादिक केते गना ॥ १५ ॥ तता-तत्ता अति त्रियो नहिं जाये । तन त्रिभुवनमें राखु छिपाये ॥ जो तन त्रिभुवन माहिं छपावै । तत्वहि मिले तत्वसो पावै ॥ १६ ॥ थथा-थथ्या थाह थहो नहिं जाई । इह थोरे वह थीर रहाई ॥ थोरे थोरे थिर होहु रे भाई । विनु थम्भे जस मंदिल थंभाई ॥ १७ ॥ ददा-दढा देखहु विनशनिहारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥ दशौ द्वारमें तारी लावै । तब दयालको दर्शन पावै ॥ १८ ॥ धधा-धध्या अर्ध माहि उजियारी । अर्धहि छाड ऊर्ध मन तारी ॥
१ जो कछु युगति जानि तन जरै ।
घटही ज्योति उजियारी करै ॥