कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(५०९)
अथ चौतीसा प्रारम्भः ॥
(बीचक का)
प्रथम ओंकार ॥
ॐ ओंकार-आदिहि जो जाने । लिखिके मेटि ताहि फ़िरि माने॥ ओंकार कहै सब कोई । जिनहु लखा सो बिरलै होई ॥ १ ॥
चौतीसा ॥
कका-कमल किरणिमें पावै । शशि बिगसित संपुट नहि जावै॥ तहाँ कुसुंभ रंग जो पावै । औगह गहिके गगन रहावै ॥ १ ॥ खरवा-खरुखा चाहे खोरि मनावै । खसमहि छोडि दशहू दिशि धावै ॥ खसमहि छोडि छमा है रहई । होइ अखीन अक्षय पद लहई ॥ २ ॥
गगा-गगगा गुरुके बचनै मानै । दूसर शब्द करें नहिं कानै ॥ तहाँ बिहगम कतहुं न जाई । अवगह गहिके गगन रहाई ॥ ३ ॥ घघा-घघघा घट विनशे घट होई । घटहीमें घट राखु समोई ॥ जो घट घटै घटै फ़िरि आवे । घटही माहिं फ़िर घटहि समावे ॥ ४ ॥
ड्डा-नन्ना निरखत निशिदिन जाई । निरखत नैन रहत रतनाई ॥ निमिष एकलौ तिरखै पावै । ताहि निमिषमें नैन छिपावै ॥ ५ ॥ चचा-चच्छा चित्र रच्यो बहु भारी । चित्र छोडि तू चेतु चित्र- कारी ॥ जिन यह चित्र विचित्र उलेखा । चित्र छोडि तू चेतु चितेला ॥ ६ ॥
छछा-छछछा आहि छत्रपति पास । छंकि किन रहै छोड़ि सब आसा ॥ मैं तोहि क्षण क्षण ससुझाया । खसम छोडि कस आपु बंघाया ॥ ७ ॥
जजा-जजा ई तन जियतहि जारो । जोबन जारि युगति जो
१ छंकिके रहउ मेटि सब आसा ।