भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५०९)

अथ चौतीसा प्रारम्भः ॥

(बीचक का)

प्रथम ओंकार ॥

ॐ ओंकार-आदिहि जो जाने । लिखिके मेटि ताहि फ़िरि माने॥ ओंकार कहै सब कोई । जिनहु लखा सो बिरलै होई ॥ १ ॥

चौतीसा ॥

कका-कमल किरणिमें पावै । शशि बिगसित संपुट नहि जावै॥ तहाँ कुसुंभ रंग जो पावै । औगह गहिके गगन रहावै ॥ १ ॥ खरवा-खरुखा चाहे खोरि मनावै । खसमहि छोडि दशहू दिशि धावै ॥ खसमहि छोडि छमा है रहई । होइ अखीन अक्षय पद लहई ॥ २ ॥

गगा-गगगा गुरुके बचनै मानै । दूसर शब्द करें नहिं कानै ॥ तहाँ बिहगम कतहुं न जाई । अवगह गहिके गगन रहाई ॥ ३ ॥ घघा-घघघा घट विनशे घट होई । घटहीमें घट राखु समोई ॥ जो घट घटै घटै फ़िरि आवे । घटही माहिं फ़िर घटहि समावे ॥ ४ ॥

ड्डा-नन्ना निरखत निशिदिन जाई । निरखत नैन रहत रतनाई ॥ निमिष एकलौ तिरखै पावै । ताहि निमिषमें नैन छिपावै ॥ ५ ॥ चचा-चच्छा चित्र रच्यो बहु भारी । चित्र छोडि तू चेतु चित्र- कारी ॥ जिन यह चित्र विचित्र उलेखा । चित्र छोडि तू चेतु चितेला ॥ ६ ॥

छछा-छछछा आहि छत्रपति पास । छंकि किन रहै छोड़ि सब आसा ॥ मैं तोहि क्षण क्षण ससुझाया । खसम छोडि कस आपु बंघाया ॥ ७ ॥

जजा-जजा ई तन जियतहि जारो । जोबन जारि युगति जो

१ छंकिके रहउ मेटि सब आसा ।