कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सा०-मनभवंरा यह कठिन है, विषय लहर लपटाय ।
ताहि संग रमता बहे, फिर फिर भटका खाय ॥ १ ॥
खरखा-खलककी खबर नहीं, ख्वाब ख्यालमें भूला ॥ खाना दाना जोडा घोडा, देख जवानी फूला ॥ खासा पलंग सेज बनि तोशक, तकिया फूल बिछाया । नवल नार ले तापर पौढे, काम लहर उमड़ाया ॥
सा०-लागी नारि पियारि जब, छुटा धनीसों नेह ।
काल जबै ले ग्रासई, खाक होयगी देह ॥ २ ॥
गगगा-गुरु कीजे निरख परख के, ज्ञान रहनका पूरा । गर्भ गुमान मदन मद त्यागी, दया क्षमा सतसूरा ॥ गेल बतावै अमर लोककी, गावै सतगुरु बानी ॥ मन गज सिर अकुंश दे बैठे, गुरु ग्यान मल तानी ॥
सा०-पाप पुन्यकी आशा नाहीं, करम भरमको न्यार ।
किरतम पाखंड परिहरे, अस गुरु करो विचार ॥ ३ ॥
घच्चा-घन गुरु ज्ञान बिना अँधियारा, मोह तिमिर तन छाया । सार असार बिचारे नाहीं, अमी छोड़ि विष खाया ॥ घरका घृत रेतेमें डारे, छाछ ढूँढता डोले । कश्चन दैके काच विसाहै, हर विगराना तौले ॥
सा०-ज्ञान बिना नर अंध है, अंध कर्म मत हीन ।
सांच गहे नहिं परखिके, झूठेके आधीन ॥ ४ ॥
उवाँ-ऊन मत मानो संतो, गहो परमारथ बानी । उपज सुख तब हिये तुम्हारे, जब परखो मम बानी ॥ ऊँच नीच कछु है नहीं, कर्म कहावै छोटा । जिसके करनी अन्दर नाहीं, सोई माल है खोटा ॥