कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 968 में से
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कबीरपंथी—
सा०—ऊपर माला जटा जनैऊ, माथे तिलक सुहाय ।
संसै सोग घटभीतर, अंदर मैल रहाय ॥ ६ ॥
चन्ना-चित चेनो चतुर चिकनियाँ, चैन कहा तुम सोया । चतुराई सबभार परैगी, जन्म अकारथ खोया ॥ चौथा पन तेरो आय लगा, अजहुँ चेत गुरु ज्ञानी । नहिं तो परिहौ खोह अंधियारे, फिर पाछे पछताना ॥
सा०—ऐसे पाटन आयकै, सौदा करो बनाय ।
जो चूकौ या जन्मसे, तो दुख भुगतो जाय ॥ ६ ॥
छछछा-छल बल छिनमें निकसि जायगा, जब छेकै जम आई । छट पट करे मरे विष ज्वाला, तब कहु कौन सहाई ॥ जमके मुगदर सिरपर बाजै, तब करिहौ किलकारी । तात मात आता सुत सज्जन, काम न आवै नारी ॥
सा०—छूटी सकल सगाई, भया चोरका हाल ।
संगी सब न्यारा रहे, आप परै सुख काल ॥ ७ ॥
जजा-जमके पाले जबै परै जिव, तब कहु बात न आवै । तहां कहु चाले नाही, सीस धुनी पछतावै ॥ जम ले पहुँचे चित्र- गुपित पहाँ लिखनी लख विचारे । दयाहीन गुरु बेसुख ढाढे, अगिनकुण्डमें डारे ॥
सा०—जन्म सहस्र अजगर देवे, विषज्वाला अकुलाय ।
पीछे किमि विष्टा माँही, भूत खान परजाय ॥ ८ ॥
झइझा-झाखन झूखन छांडो, झमकि करो गुरु सेवा । झाई मनकी दूर बहावो, परख शब्द गुरु देवा ॥ झगरा झूठ झाई जग त्यागो, झपट भजो सतनामा । झीन करो मन मेरु मन्दिरमें, गुरु पद पैकज विश्रामा ॥
सा०—होइ अधीन गुरु चरण गहो, कपट भाव कर दूर ।
ज्यों पतिव्रता पति गही, तर्कै न दूसर क्रूर ॥ ९ ॥