भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली ।

(५०३)

जन्मा-इशक बिना मिले नहीं साहब, केतो भेख बनाये । इशक खुशक न छिपे छिपाये, के तो कोई छिपावे ॥ इत उत यहाँ उहाँ सब त्यागो, निहचे गहो गुरु शरना । याहीसे हो दुख नसे, मिटे जनम औ मरना ॥

सा०-आदि नाम है जा हिये, सोईं गुरु है सार ।

कीतमको जो ध्यावई, सोईं भव लगे न पार ॥ १० ॥

टढ़ा-टीम टाम बाहर बहुतेरा, दिल दासीसे बंधा । संख धुन लेकरे आरती, छुटा न घरका धंधा ॥ टिकुली सेंदुर चरखा पूनी, दासीने फुरमाया । कच्चे बच्चेने मांग मिठाई, मगन भये तब लाया ॥

सा०-जिन सेवक पूजा दर्ई, ताहि दर्ई आसीस ।

जहाँ नहीं तहाँ टेढे भये, कहै भसम करो जगदीस ॥ ११ ॥

ठढ़ा-ठग बहुतेरे भेख बनावे, गले लगावै फांसी । स्वांग बनाये कौन नफा है, जो न भजै अविनासी ॥ ठोकर सहे गुरुके आगे, ठीक ठौर तब पावे । ठकठक मेटे जरा मरणका, जमके हाथ न आवे ॥

सा०-भूतक होय गुरु चरण गहे, ठसक करे सब दूर ।

कायर ते नहीं भगति होय, ठानि रहै कोई सूर ॥ १२ ॥

डढ़ा-डगमगसे कछु काज न सरिहै, अडिग नाम गुण गहिये । डर मेटे तब विषय कालको, अच्छे अमर पद लहिये ॥ डरते रहिये गुरु साधुसे, डिंभ काम नहीं आवै । डिंभ जुबावै भव- सागरमें, जनम मरन दुख पावै ॥

सा०-डेढ दिनाको जीवना डारो कुबुध नसाय ।

डेरा पावो सतलोकमें, सतगुरु शब्द समाय ॥ १३ ॥

ढढ़ा-ढूँदत फिरौ तुम कौनकूँ, ढूँढे सो ढिगनेरे । ढोल मारके सबे चिताऊँ, सतगुरु शब्द निबेरे ॥ है तू कौन कहाँ से आया,

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