भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

कहूँ निजघर तेरा । केहि कारन तुम भरमत डोडौ, तन तज कहाँ बसेरा ॥

सा०—को रक्षक है जीवका, गहो ताहि पहिचान ।

रक्षकके चीन्हे बिना, अन्त होयगी हान ॥१४॥

णणा-गुणातीत निर्गुण अविनासी, दयानिधि सुखसागर । निह- चल ठौर निरंतर बासा, नाम अनादि उजागर ॥ निर्मल अमी कांति छबि अदबुद, अकह अजावन सोई । नख सिख नाभि नैन मुख नासा, श्रवण चिकुर सम होई ॥

सा०—चिकुरनके उजियारमें, कोटिन बुध सरमाय ।

कहा कांत छबि वरनो, वरणत बरनि न जाय ॥ १६ ॥

तत्ता-ताहि पुरुषके अंस जीव है, धर्मराय ठगि राखा । तारन तरन आप कहलावै, वेद शास्त्र अबिलाखा ॥ तत्त प्रकृति त्रिगुन तन बंधा, नीर पवनकी बारी । धर्मराय यह रचना कीन्ही, जहाँ जीव बैठारी ॥

सा०—जीवहिं लाग ठगौरी, भूले आपन देश ।

सुमिरन करहीं कालका, भुगते कष्ट कलेस ॥ १६ ॥

थथ्या-थकित भया जिव भरमत डोलै, चौरासीके माहीं । नाना कष्ट जन्म त्रास जो व्यापै, जरे मरे पछताहीं ॥ थाह न पावै बिपत कष्टको, बूढ़ै संसे धारा । भौसागरके विषम लहर है, सूझे वार न पारा ॥

सा०—बिकल परे अघ जोयनेमें, बहुविधि करे पुकार ।

सतगुरु शब्द चीन्हे बिना, कैसे उतरे पार ॥१७॥

ददा-दुंद वाद है बहुत देहमें, परचे तहाँ न पावै । नर तन धर सो साहब सुमिरे, तो जम निकट न आवै ॥ दरस कराऊँ सत्त पुरुषका, देह हिरंमर पैहो । सुख सागर सुख बिलसो हंसा, भौजल बहुर न ऐहो ॥