कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सा०-ऐसा सुख घर छाड़के, आगे दुखका भार ।
भर्मेवस जिव भेद न जाने, लखै न शब्द हमार ॥ १८ ॥ धध्या-धर्म धर्मकर सबै पुकारै, धर्महिं चीन्ह न पावै । धर्मराय तिहुँ लोकहिं प्रासे, जीवत बाँध झुलावै ॥ घोखा दे सबको मारे, सुरनर मुनि नहीं बाँचे । नर बपुराकी कौन चलाये, तन धर धर सब नाचे ॥
सा०-भक्षक कला दिखायके, पुनि धरि रक्षक भाय ।
रक्षक जान जपै जिव, पुनि तेहि भक्ष कराय ॥१९॥ नन्ना-निर्भय नाम लौ लावे, नकल चीन्ह पर त्यागो । नाद विन्दते न्यारा कहिये, सुरत सोहंगम पागो ॥ निराधार निहतत निहअच्छर, निह संसै निहकामी । निःस्वादी निर्मल अविगत, निर्हचित सुखधामी ॥
सा०-रामसनेही चेतो हो, भाषो घरको डोर ।
परखोगुरुगम सुरतसे, चलो त्रिन जम तोर ॥ २० ॥
पप्पा-पाप पुन्यमें जग अरुझाने, पार कौन विधि पावे । पाप पुन्य भुगते नर धर धर, फिर फिर जम लेजावे ॥ प्रेम भक्ति परमात्म पूजा, परमारथ चित धारे । पावन जन्म परम पद पावे, पारख शब्द विचारे ॥
सा०-प्रीतम विरह वियोग जेहि, परिहर कपट कुचाल ।
पिड पिड रटन लगावो, पाँव परे तेहि काल ॥ २१ ॥
फफ्फा-फरामोसकर फिकर, फहम करो दिल माहीं । परफुल्लित संतन गुन गावो, जम तेहि देखि डराहीं ॥ फाजिल सो जो आपा मेटे, फना होय गुन गावै । फांसी काटे करन भरमकी, जमके हाथ न आवै ॥