कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
सा०-फेर फेर नर भर्म बस, भर्महिं भटका खाय ।
तीरथ बरत लगी जिव भरमें, उरसर प्यास न जाय ॥२२॥ बब्बा-ब्रह्म बसत सरव भूतमें, दुनिया भाव न होई । वर्तमान चित् चेतत नाहीं, भूत भविष्य बिलोई ॥ बड़े बड़े विषम बुद्धि लागे, बोलनहार न जोवे । ब्रह्म दुखित कर पाहन पूजे, बरबस आप बिगोवे ॥
सा०-बंध परे नर कालके, बुद्धि ठगाई जान ।
बंध छुडा बाहर चलूं, मोहि गहो पहिचान ॥ २३ ॥
भम्भा-भार परे यह देश बिगाना, भवसागर औगाहा । भगत अभगत दोऊ कह बोरे, कोई न पावे थाहा ॥ भक्षकने लीला विस्तारी, कला अनेक दिखावे । भक्षकको रक्षक कर थापै, रक्षक चीन्ह न पावे ॥
सा०-भछे जाहि सो भक्षक, रक्षक रहे निनार ।
परम चक्रमें परे जिव, लखे न शब्द हमार ॥२४॥
मम्मा-मन मैंगल मस्त दिवाना, जीवहि उभट चलावे । अक- रम क्रम करै मन आपै, पीछे जिव दुख पावे ॥ मोह बस जिव मन नहिं चीन्हे, जाने यह सुखदाई । मार लगे जब मन होय न्यारा, नरक परे जिव जाई ॥
सा०-मन गज अगुवा कालको, परखो संत सुजान ।
अंकुस सतगुरु ज्ञान है, मन मतंग भय मान ॥२५॥
जज्जा-जो जिव सतगुरु शब्द समावे, तो जम होवे चेरा । जुगत जुगत कर मनको जीतो, सहजे होय निवेरा ॥ जहँ लग काल जाल विस्तारी, सो सब मनकी बाजी । मनहिं निरजन राजा कहिये, मन पंडित मन काजी ।