भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५०७)

सा०-गुरु प्रताप भये जोर जिव, निबल भया मन चोर ।

तस्कर लाग न पावई, जो गढपति करै अंजोर ॥२६॥

रर्ग-रहनी रहै रजनी नहिं चंपै, रमे सतगुरु बानी । रहनी बाती जीत उजियारे, जाते होय न हानी ॥ रमता राम काम कर अपना, सपना सब संसारा । रार रोस तजि सतगुरु सेवौ, जासे उतरो पारा ॥

सा०-रैन दिवस वा घर नहीं, पुरुष प्रकास अंजोर ।

ले राखूं तेहि ठाँव जिव, जहाँ न झंपै चोर ॥२७॥

लछा-लगन लगी जेहि गुरु चरणों, लच्छ प्रगट तेहि ऐसे । लगन लगी तब मगन भया मन, लोक लाज कुल कैसे ॥ लाग रहे गुरु सुरत परेखे, निज स्वारथ नहीं सूझे । लागे ठोकर पीठ न देवै, सूर सा न्मुख जूझे ॥

सा०-लागे लहर ललक मन बुधकी, निकट न आवे ताहि ।

लोटे गुरु चरणन तरे, गुरु सनेह हिय जाहि ॥२८॥

वक्वा-वाके निकट काल नहिं आवै, जो सतनाम समाना । वार पारको संसे नाही, बाहीसो मन माना ॥ वासिल बाकी काल बली की, ताही हाथ बिकाना । वारिसकूँ सौंपा दिल अपना, सबही दुन्द समाना ॥

सा०-वाही सों जिव इशक लगावे, वाजिव सखुन अजूब ।

वाबद एक करो बन्दगी, गहो पाक महबूब ॥२९॥

सरसा-सहर चोर घनघोर करै निसि, सोवै सब घरवारी । सोर न करै भर्म बस सोवै, लागी विषम खुमारी ॥ साहबसे फेरा दिल अपना, दुनियाँ बीच बैधाया । ससुरा साला साली सासू, समधी मुजन मुहाया ॥

सा०-सतगुरु शब्द पुकारई, समुझि गहै कोइ सूर ।

सुमिरि लीजो समरथको, जाना है बड दूर ॥३०॥

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