कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(५०७)
सा०-गुरु प्रताप भये जोर जिव, निबल भया मन चोर ।
तस्कर लाग न पावई, जो गढपति करै अंजोर ॥२६॥
रर्ग-रहनी रहै रजनी नहिं चंपै, रमे सतगुरु बानी । रहनी बाती जीत उजियारे, जाते होय न हानी ॥ रमता राम काम कर अपना, सपना सब संसारा । रार रोस तजि सतगुरु सेवौ, जासे उतरो पारा ॥
सा०-रैन दिवस वा घर नहीं, पुरुष प्रकास अंजोर ।
ले राखूं तेहि ठाँव जिव, जहाँ न झंपै चोर ॥२७॥
लछा-लगन लगी जेहि गुरु चरणों, लच्छ प्रगट तेहि ऐसे । लगन लगी तब मगन भया मन, लोक लाज कुल कैसे ॥ लाग रहे गुरु सुरत परेखे, निज स्वारथ नहीं सूझे । लागे ठोकर पीठ न देवै, सूर सा न्मुख जूझे ॥
सा०-लागे लहर ललक मन बुधकी, निकट न आवे ताहि ।
लोटे गुरु चरणन तरे, गुरु सनेह हिय जाहि ॥२८॥
वक्वा-वाके निकट काल नहिं आवै, जो सतनाम समाना । वार पारको संसे नाही, बाहीसो मन माना ॥ वासिल बाकी काल बली की, ताही हाथ बिकाना । वारिसकूँ सौंपा दिल अपना, सबही दुन्द समाना ॥
सा०-वाही सों जिव इशक लगावे, वाजिव सखुन अजूब ।
वाबद एक करो बन्दगी, गहो पाक महबूब ॥२९॥
सरसा-सहर चोर घनघोर करै निसि, सोवै सब घरवारी । सोर न करै भर्म बस सोवै, लागी विषम खुमारी ॥ साहबसे फेरा दिल अपना, दुनियाँ बीच बैधाया । ससुरा साला साली सासू, समधी मुजन मुहाया ॥
सा०-सतगुरु शब्द पुकारई, समुझि गहै कोइ सूर ।
सुमिरि लीजो समरथको, जाना है बड दूर ॥३०॥