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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(५०४)

कवीरपंथी—

कहूँ निजघर तेरा । केहि कारन तुम भरमत डोडौ, तन तज कहाँ बसेरा ॥

सा०—को रक्षक है जीवका, गहो ताहि पहिचान ।

रक्षकके चीन्हे बिना, अन्त होयगी हान ॥१४॥

णणा-गुणातीत निर्गुण अविनासी, दयानिधि सुखसागर । निह- चल ठौर निरंतर बासा, नाम अनादि उजागर ॥ निर्मल अमी कांति छबि अदबुद, अकह अजावन सोई । नख सिख नाभि नैन मुख नासा, श्रवण चिकुर सम होई ॥

सा०—चिकुरनके उजियारमें, कोटिन बुध सरमाय ।

कहा कांत छबि वरनो, वरणत बरनि न जाय ॥ १६ ॥

तत्ता-ताहि पुरुषके अंस जीव है, धर्मराय ठगि राखा । तारन तरन आप कहलावै, वेद शास्त्र अबिलाखा ॥ तत्त प्रकृति त्रिगुन तन बंधा, नीर पवनकी बारी । धर्मराय यह रचना कीन्ही, जहाँ जीव बैठारी ॥

सा०—जीवहिं लाग ठगौरी, भूले आपन देश ।

सुमिरन करहीं कालका, भुगते कष्ट कलेस ॥ १६ ॥

थथ्या-थकित भया जिव भरमत डोलै, चौरासीके माहीं । नाना कष्ट जन्म त्रास जो व्यापै, जरे मरे पछताहीं ॥ थाह न पावै बिपत कष्टको, बूढ़ै संसे धारा । भौसागरके विषम लहर है, सूझे वार न पारा ॥

सा०—बिकल परे अघ जोयनेमें, बहुविधि करे पुकार ।

सतगुरु शब्द चीन्हे बिना, कैसे उतरे पार ॥१७॥

ददा-दुंद वाद है बहुत देहमें, परचे तहाँ न पावै । नर तन धर सो साहब सुमिरे, तो जम निकट न आवै ॥ दरस कराऊँ सत्त पुरुषका, देह हिरंमर पैहो । सुख सागर सुख बिलसो हंसा, भौजल बहुर न ऐहो ॥

शब्दावली

(५०५)

सा०-ऐसा सुख घर छाड़के, आगे दुखका भार ।

भर्मेवस जिव भेद न जाने, लखै न शब्द हमार ॥ १८ ॥ धध्या-धर्म धर्मकर सबै पुकारै, धर्महिं चीन्ह न पावै । धर्मराय तिहुँ लोकहिं प्रासे, जीवत बाँध झुलावै ॥ घोखा दे सबको मारे, सुरनर मुनि नहीं बाँचे । नर बपुराकी कौन चलाये, तन धर धर सब नाचे ॥

सा०-भक्षक कला दिखायके, पुनि धरि रक्षक भाय ।

रक्षक जान जपै जिव, पुनि तेहि भक्ष कराय ॥१९॥ नन्ना-निर्भय नाम लौ लावे, नकल चीन्ह पर त्यागो । नाद विन्दते न्यारा कहिये, सुरत सोहंगम पागो ॥ निराधार निहतत निहअच्छर, निह संसै निहकामी । निःस्वादी निर्मल अविगत, निर्हचित सुखधामी ॥

सा०-रामसनेही चेतो हो, भाषो घरको डोर ।

परखोगुरुगम सुरतसे, चलो त्रिन जम तोर ॥ २० ॥

पप्पा-पाप पुन्यमें जग अरुझाने, पार कौन विधि पावे । पाप पुन्य भुगते नर धर धर, फिर फिर जम लेजावे ॥ प्रेम भक्ति परमात्म पूजा, परमारथ चित धारे । पावन जन्म परम पद पावे, पारख शब्द विचारे ॥

सा०-प्रीतम विरह वियोग जेहि, परिहर कपट कुचाल ।

पिड पिड रटन लगावो, पाँव परे तेहि काल ॥ २१ ॥

फफ्फा-फरामोसकर फिकर, फहम करो दिल माहीं । परफुल्लित संतन गुन गावो, जम तेहि देखि डराहीं ॥ फाजिल सो जो आपा मेटे, फना होय गुन गावै । फांसी काटे करन भरमकी, जमके हाथ न आवै ॥

(५०६)

कवीरपंथी-

सा०-फेर फेर नर भर्म बस, भर्महिं भटका खाय ।

तीरथ बरत लगी जिव भरमें, उरसर प्यास न जाय ॥२२॥ बब्बा-ब्रह्म बसत सरव भूतमें, दुनिया भाव न होई । वर्तमान चित् चेतत नाहीं, भूत भविष्य बिलोई ॥ बड़े बड़े विषम बुद्धि लागे, बोलनहार न जोवे । ब्रह्म दुखित कर पाहन पूजे, बरबस आप बिगोवे ॥

सा०-बंध परे नर कालके, बुद्धि ठगाई जान ।

बंध छुडा बाहर चलूं, मोहि गहो पहिचान ॥ २३ ॥

भम्भा-भार परे यह देश बिगाना, भवसागर औगाहा । भगत अभगत दोऊ कह बोरे, कोई न पावे थाहा ॥ भक्षकने लीला विस्तारी, कला अनेक दिखावे । भक्षकको रक्षक कर थापै, रक्षक चीन्ह न पावे ॥

सा०-भछे जाहि सो भक्षक, रक्षक रहे निनार ।

परम चक्रमें परे जिव, लखे न शब्द हमार ॥२४॥

मम्मा-मन मैंगल मस्त दिवाना, जीवहि उभट चलावे । अक- रम क्रम करै मन आपै, पीछे जिव दुख पावे ॥ मोह बस जिव मन नहिं चीन्हे, जाने यह सुखदाई । मार लगे जब मन होय न्यारा, नरक परे जिव जाई ॥

सा०-मन गज अगुवा कालको, परखो संत सुजान ।

अंकुस सतगुरु ज्ञान है, मन मतंग भय मान ॥२५॥

जज्जा-जो जिव सतगुरु शब्द समावे, तो जम होवे चेरा । जुगत जुगत कर मनको जीतो, सहजे होय निवेरा ॥ जहँ लग काल जाल विस्तारी, सो सब मनकी बाजी । मनहिं निरजन राजा कहिये, मन पंडित मन काजी ।

शब्दावली

(५०७)

सा०-गुरु प्रताप भये जोर जिव, निबल भया मन चोर ।

तस्कर लाग न पावई, जो गढपति करै अंजोर ॥२६॥

रर्ग-रहनी रहै रजनी नहिं चंपै, रमे सतगुरु बानी । रहनी बाती जीत उजियारे, जाते होय न हानी ॥ रमता राम काम कर अपना, सपना सब संसारा । रार रोस तजि सतगुरु सेवौ, जासे उतरो पारा ॥

सा०-रैन दिवस वा घर नहीं, पुरुष प्रकास अंजोर ।

ले राखूं तेहि ठाँव जिव, जहाँ न झंपै चोर ॥२७॥

लछा-लगन लगी जेहि गुरु चरणों, लच्छ प्रगट तेहि ऐसे । लगन लगी तब मगन भया मन, लोक लाज कुल कैसे ॥ लाग रहे गुरु सुरत परेखे, निज स्वारथ नहीं सूझे । लागे ठोकर पीठ न देवै, सूर सा न्मुख जूझे ॥

सा०-लागे लहर ललक मन बुधकी, निकट न आवे ताहि ।

लोटे गुरु चरणन तरे, गुरु सनेह हिय जाहि ॥२८॥

वक्वा-वाके निकट काल नहिं आवै, जो सतनाम समाना । वार पारको संसे नाही, बाहीसो मन माना ॥ वासिल बाकी काल बली की, ताही हाथ बिकाना । वारिसकूँ सौंपा दिल अपना, सबही दुन्द समाना ॥

सा०-वाही सों जिव इशक लगावे, वाजिव सखुन अजूब ।

वाबद एक करो बन्दगी, गहो पाक महबूब ॥२९॥

सरसा-सहर चोर घनघोर करै निसि, सोवै सब घरवारी । सोर न करै भर्म बस सोवै, लागी विषम खुमारी ॥ साहबसे फेरा दिल अपना, दुनियाँ बीच बैधाया । ससुरा साला साली सासू, समधी मुजन मुहाया ॥

सा०-सतगुरु शब्द पुकारई, समुझि गहै कोइ सूर ।

सुमिरि लीजो समरथको, जाना है बड दूर ॥३०॥

(५०८)

कबीरपंथी-

बध्या-षलक तजै षलक मन रोचै, नर षोये जात सब कामा । षबर नहीं घर षर्च बुटाना, चेतो रमता रामा ॥ षोल कपाट चित चेतो अजहुँ, वाहिदसे लो लावो । ष्वाब ष्याल कर दूर दिवाना, हिरदे नाम समावो ॥

सा०-षाल भरी है वायुसों, षाली होत न वार ।

षेम परे जेहि काममें, सो करू वेगि विचार ॥ ३१ ॥

सस्सा-सहज शील संतोष धीरधर, ज्ञान विवेक बिचारो । दया छमा सत संगत सेवा, शतगुरु शब्द अधारो ॥ सुमरण कर सत्त नाम धनीको, सुरा तन गहि रहना । सुमिरो अरि अँजोर परे तब, मनके संग न बहना ॥

सा०-सैन कही समुझे कोई, रहनी रहे सो सार ।

कहन तरे तो जग तरे, कहनि रहनि बिन छार ॥ ३२ ॥

हहहा-हिया माहि सत नाम समाना, दया भिहर दिल जाना । हरिके मने बिन तरा न कोई, हरिसे लोक अजाना ॥ हरि बिनुस हरि अजर अमर है, हरिमें हरिको बूझे । हाजर छोड़ बुत्तको पूजे, हह कर नाही बूझे ॥

सा०-हम हमार घर छाड़िकै, हक राह पहिचान ।

हासिल होय मकसद तब, हाफिन अमल अमान ॥ ३३ ॥

छछछा-छेल चिकनिया भया घनेरा, छाका फिरै दिवाना । छय होय जाय अमर नहि कोई, आखिरको पछिताना ॥ छर मध्ये निःअच्छर बूझे, समझे गुरु गम धावे । छरमें निःअच्छर जो जाने, निःअच्छर तब पावे ॥

सा०-निच्छर गहे विवेक करि, बावन अच्छर भिन्न ।

कहे कबीर धर्मदाससे, विरला कोई चिह्न ॥ ३४ ॥

इति ज्ञान-चौतीसा-कबीर साहबका सम्पूर्ण ॥

शब्दावली

(५०९)

अथ चौतीसा प्रारम्भः ॥

(बीचक का)

प्रथम ओंकार ॥

ॐ ओंकार-आदिहि जो जाने । लिखिके मेटि ताहि फ़िरि माने॥ ओंकार कहै सब कोई । जिनहु लखा सो बिरलै होई ॥ १ ॥

चौतीसा ॥

कका-कमल किरणिमें पावै । शशि बिगसित संपुट नहि जावै॥ तहाँ कुसुंभ रंग जो पावै । औगह गहिके गगन रहावै ॥ १ ॥ खरवा-खरुखा चाहे खोरि मनावै । खसमहि छोडि दशहू दिशि धावै ॥ खसमहि छोडि छमा है रहई । होइ अखीन अक्षय पद लहई ॥ २ ॥

गगा-गगगा गुरुके बचनै मानै । दूसर शब्द करें नहिं कानै ॥ तहाँ बिहगम कतहुं न जाई । अवगह गहिके गगन रहाई ॥ ३ ॥ घघा-घघघा घट विनशे घट होई । घटहीमें घट राखु समोई ॥ जो घट घटै घटै फ़िरि आवे । घटही माहिं फ़िर घटहि समावे ॥ ४ ॥

ड्डा-नन्ना निरखत निशिदिन जाई । निरखत नैन रहत रतनाई ॥ निमिष एकलौ तिरखै पावै । ताहि निमिषमें नैन छिपावै ॥ ५ ॥ चचा-चच्छा चित्र रच्यो बहु भारी । चित्र छोडि तू चेतु चित्र- कारी ॥ जिन यह चित्र विचित्र उलेखा । चित्र छोडि तू चेतु चितेला ॥ ६ ॥

छछा-छछछा आहि छत्रपति पास । छंकि किन रहै छोड़ि सब आसा ॥ मैं तोहि क्षण क्षण ससुझाया । खसम छोडि कस आपु बंघाया ॥ ७ ॥

जजा-जजा ई तन जियतहि जारो । जोबन जारि युगति जो

१ छंकिके रहउ मेटि सब आसा ।

(५१०)

कबीरपंथी—

पारो ॥ घटंहीं ज्योति उजियारी करै । जो कछु जानि जानि पर जै ॥ ८ ॥

झझा-झइझा अरुझि सरुझि कित जाना । हीढत दूढत जाय पराना ॥ कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जो गढ गढ़ा गढ़हि सो पावै ॥ ६ ॥ अजा-नन्ना निरर्खत नगर सनेहू । आपन करु निरुवार संदेहू ॥ नहिं देखो नहिं आप भजाऊ । जहाँ नहीं तहं तन मन लाऊ ॥ १० ॥ टटा-टट्टा विकट बाट मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥ रहे लटपटे जूटि तेहि माहीं । होहि अटल तेहि कतहुँ न जाहीं ॥ ११ ॥ ठठा ठट्टा ठौर दूरि ठग नोरे । नितके निठुर कीन्ह मन धीरे ॥ जेहि ठग ठगे सब लोग स्याना । सो ठग चीन्हि ठौर पहिचाना ॥ १२ ॥ डडा-डड्डा डर कीन्हे डर होई । डरहीमें डर राखु समोई ॥ जो डर डरै डरै फिरि आवै । डरहिमें पुनि डरहि समावै ॥ १३ ॥ ढढा-ढट्टा दूढत ई कित जाना । हीढत दूढैत जाय पराना ॥ कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जेहि दूढा सो कतहुँ न पावै ॥ १४ ॥ णणा-नन्ना दुई बसाये गाऊँ । रेनन्ना दूढे तेरा नाऊ ॥ सुये एक जाय तजि घना । मरे इत्यादिक केते गना ॥ १५ ॥ तता-तत्ता अति त्रियो नहिं जाये । तन त्रिभुवनमें राखु छिपाये ॥ जो तन त्रिभुवन माहिं छपावै । तत्वहि मिले तत्वसो पावै ॥ १६ ॥ थथा-थथ्या थाह थहो नहिं जाई । इह थोरे वह थीर रहाई ॥ थोरे थोरे थिर होहु रे भाई । विनु थम्भे जस मंदिल थंभाई ॥ १७ ॥ ददा-दढा देखहु विनशनिहारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥ दशौ द्वारमें तारी लावै । तब दयालको दर्शन पावै ॥ १८ ॥ धधा-धध्या अर्ध माहि उजियारी । अर्धहि छाड ऊर्ध मन तारी ॥

१ जो कछु युगति जानि तन जरै ।

घटही ज्योति उजियारी करै ॥

शब्दावली

(५११)

अर्ध छोड़ि ऊर्ध मन लावै । आपा मेटिके प्रेम बढ़ावै ॥१९॥ नना-नन्ना वो चौथे मह जाई । रामके गढ़हा हो खर खाई ॥ नाह छोड़ किय नर्क बसेरा । नीच अजौ चित चेतु सवेरा ॥ २० ॥ पप्पा-पप्पा पाप करै सब कोई । पापके करे धर्म नहिं होई ॥ पप्पा कहै सुनहु रे भाई । हमरेसे ये कछू न पाई ॥२१॥ फफा-फफफा फल लागो बड दूरी । चाखै सतगुरु देई न तूरी ॥ फफफा कहै सुनहु रे भाई । स्वर्ग पतालकी खबरि न पाई ॥२२॥ बबा-बब्बा बर बर कर सब कोई । बर बर किये काज नहिं होई ॥ बब्बा-बात करै अरथाई । फलके मरम न जानेहु भाई ॥२३॥ भभा-भभभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरे ते है नियरे दूरी । भभभा कहै सुनौ रे भाई । भभरे आवे भभरे जाई ॥ २४ ॥ ममा-मम्मा सेये मर्म न पाई । हमरे ते इन्ह मूल गंवाई ॥ मम्मा मूल गहल मन माना । मर्मी होय सो मर्महि जाना ॥ २५ ॥ यया-जगत रहा भर पूरी । जगतहुते जब्बा है दूरी ॥ जब्बा कहै सुनौ रे भाई । हमरेसे ये जय जय पाई ॥ २६ ॥ ररा-ररां रागि रहा अरुझाई । राम कहै दुख दारिद जाई ॥ ररां कहै सुनौ रे भाई । सतगुरु पूछिकै सेवहु जाई ॥ २७ ॥ लला-लब्बा लुतरे बात जनाई । लुतरे पावै परचे पाई ॥ अपना लुतुर औरको कहई । एकै खेत दुनौ निर्बहई ॥ २८ ॥ ववा-वब्बा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥ वह तो कहै सुनै नहिं कोई । सरग पताल न देखै कोई ॥२९॥ शशा-सरसा सर नहिं देखै कोई । सर सीतलता एकै होई ॥ सरसा कहै सुनौरे भाई । शून्य समान चला जग जाई ॥ ३० ॥ षष्ठा-षष्ठा षरा कहे सब कोई । षर षर कहै काज नहिं होई ॥ षष्ठा कहै सुनहुरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥३१॥

(५१२)

कवीरपंथी-

ससा-सस्सा सरा रच्यो वरियाई । सर बेघे सब लोग तवाई ॥ सस्साके घर सुन गुन होई । इतनी बात न जाने कोई ॥३२॥

हहा-हहहा हाय हायमें सब जग जाई । हरष सोक सब मांहि समाई ॥ हकरि हकरि सब बड बड गयऊ ॥ हहहा मर्म न काहू पयऊ ॥ ३३ ॥

क्षक्षा-छछछा छण प्रलय मिटि जाई । छेव परे तब को समुझाई ॥ छेव परे कोउ अन्त न पाया । कह कवीर अगमन गोह- राया ॥ ३४ ॥

इति चौतीसा बीजकका सम्पूर्ण ॥

अथ विप्रमतीसी प्रारम्भः ॥

सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी । हरि विनु बूड़ी नाव भरीसी ॥ ॥१॥ ब्राह्मण होयके ब्रह्म न जाने । घरमें जग्य प्रतिग्रह आने ॥२॥ जो सिरजा तेहि नहिं पहिचानै । करम भरम लै बैठि बखानै ॥ ३ ॥ ग्रहण अमावस सायर पूजा । स्वातिके पात परहिं जनि दूजा ॥४॥ प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होमकी आसा ॥५॥ कुल उत्तम कुल माहि कहावे । फिरि फिरि मध्यम कर्म करावे ॥ ६ ॥ करम असुचि उछिछे खाहीं । मति भरिष्ट जमलोकहिं जाहीं ॥ ७ ॥ सुत दारा मिलि जूठा खाहीं । हरि भगतनकी छूत कराहीं ॥ ८ ॥ नहाय खोरि उत्तम है आवे । विष्णुभक्त देखे दुख पावे ॥ ९ ॥ स्वारथ लागि रहे वे आढा । नाम लेत जस पावक डाढा ॥१०॥ राम किन्नकी छोडिन आसा । पठि गुनिभै किरतिमके दासा ॥ ११ ॥ करम करहि करमहिको धावे । जो पूछे तेहि करम हढावै ॥ १२ ॥ निःकरमीकी निंदा करई । कर्म करे ताही चित धरई ॥ १३ ॥ अस हिय भगति

शब्दावली

(५१३)

भगवतको लावे। हिरणाकुसको पंथ चलावे ॥१४॥ देखहु कुमति नरक प्रकासा। विनु लखि अंतर कृत्रिमदासा ॥ १५ ॥ जाके पूजे पाप न ऊड़े। नाम सुमिरते भवमें बूड़े ॥१६॥ पाप पुण्यके हाथहि पासा। मारि जगत जग कीन विनासा ॥१७॥ वै बहनी दोउ बहनी न छाड़े। वह गृह जारे वह गृह माड़े ॥१८॥ बैठे ते घर साहु कहावे। भितर भेद मन सुसहि लगावे ॥ १९ ॥ ऐसी विधि सुर विप्र भनीजे। नाम लेत पंचासन दीजे ॥ २० ॥ बूडि गये नहिं आपु सवौंरा। ऊँच नीच कहु काहि जोहारा ॥२१॥ ऊँच नीच है मध्यम बानी। एकै सबन एक है पानी ॥२२॥ एकै मटिया एक कुम्हारा। एकै पवनको सिरजन हारा ॥२३॥ एकै चाक बहु चित्र बनाया। नाद विहुके बीच समाया ॥ २४ ॥ व्यापी एक सकलमें जोती। नाम धरेका कहिये मोती ॥ २५ ॥ राच्छस करनी देव कहावे। वाद करे भव पार न पावे ॥२६॥ हंस देह तजि न्यारा होई। ताकी जात कहै धौं कोई ॥ २७ ॥ स्वेद सपेद कि राता पियरा। अवरन बरन कि ताता सियरा ॥ २८ ॥ हिंदू तुरुक कि बूढा वारा। नारि पुरुष मिलि करहु विचारा ॥ २९ ॥ कहिय काहि कहा नहिं माना। दास कवीर सोई पहिचाना ॥ ३० ॥

सा०-बहिया है बहिजात है, कर गहि ऐंचहु ओर।

समझाये समझे नहीं, दे धका दुई ओर ॥१॥

इति विप्रमतसौ बौजकौ।

कहरा. १

सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु, गुरुके वचन समाई हो ॥ मेली मृष्टि चरा चित राखहु, रहौ दृष्टि लौलाई हो ॥ जस दुख

कवीरपंथी शब्दावली १७

(५१४)

कबीरपंथी-

देखि रहहु यहि औसर, अस सुख होई हैं पाई हो ॥ जो खुट- कार बेगि नहिं लागे, हृदय निवारहु कोऊ हो ॥ भुगतिकी डोरी गाठि जनि खैचहु, तब बझिहैं बड रोहू हो ॥ मनु वहि कहहु रहहु मन मारे, खिजुवा खीजि न बोले हो ॥ मानु भीत मितार्ई न छोडे, कबहुँ गांठि न खोले हो । भोगउ भोग मुक्ति जनि भूलहु, जोग जुगति तन साधहु हो ॥ जो यह भांति करहु मतबलिया ता मतके चित बांधहु हो ॥ नहिं तो ठाकुर है अति दारुन करिहैं चाल कुचाली हो ॥ बांधि मारि डंड सब लेहीं, छूटहिं तब मत- वाली हो ॥ जबही सावंत आनि पहुँचे, पीठ सांठि भल दुटिहैं हो ॥ ठाठे लोग कुटुम सब देखे कहे काहुके न छुटिहैं हो ॥ एक तो निहुरि पांव परि विनवे, विनति किये नहिं माने हो ॥ अन- चीन्हे रहेहु न कियेहु चिन्हारी, सो कैसे पहिचनबेउ हो ॥ लीन्ह बुलाय बात नहिं पूछी, केवट गरब तन बोले हो ॥ जाकर गांठि समर कछु नाहीं, सो निर्थनिया है डोले हो ॥ जिन्ह सम युक्ति अगमनकै राखिन, धरिन मच्छ भरि डेहरि हो ॥ जेकर हाथ पांव कछु नाहीं, धरन लाग तेहि सो हरि हो ॥ पेलना अच्छत पेलि चलु वौरे, तीर तीरका टोवहु हो ॥ उथले रहहु परहु जनि गहिरे, मति हाथहुकी खोवहु हो ॥ तरके घाम उपरके भूँभुरि, छाहैं कतहुँ नहिं पायहु हो ॥ ऐसनि जानि पसीझेहु सीझेहु, कस न छतुरिया छायहु हो ॥ जो कछु खेल कियहु सो कीयेहु, बहुरि खेल कस होई हो ॥ सासु ननद दोऊ देत उलाटन, रहहु लाज मुख गोई हो ॥ गुरु भौ ठील गोन भई लचपच, कहा न मानेहु मोरा हो ॥ ताजी तुकी कबहुँ न साधेहु, चढेहु काठको घोरा हो ॥ ताल झांझ भल बाजत आवे, कहरा सब कोइ नाचे हो ॥ जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये, दुलहिनि तेहि रंग राचे हो ॥ नौका

शब्दावली

(५१५)

अछत खेवे नहिं जाने, कैसेक लगवेहु तीरा हो ॥ कहहिं कवीर राम रस माते, जोलहा दास कवीरा हो ॥ १ ॥

कहरा २.

मत सुनु मानिक मत सुनु मानिक, हृदय बंद निवारहु हो । अटपट कुम्हरा करे कुम्हरैया, चमरा गांव न बांचे हो ॥ नित उठि कोरिया पेट भरतु है, छिपिया आंगन नाचे हो ॥ नित उठि नौवा नाव चढतु है, बेरहि बेरा बोरे हो ॥ राउरकी कछु खबरि न जानहु, कैसेकै झगरा निबेरहु हो ॥ एक गांवमें पाँच तरुनि बसे, जेहि मा जेठ जेठानी हो ॥ आपन आपन झगरा प्रकासनि, पियासों प्रीति नसाइनि हो ॥ भैंसिन माहिं रहत नित बकुला, तिकुला ताकि न लीन्हा हो ॥ गाइन माहिं बसेउ नहिं कबहुँ, कैसे पद पहिचनबेउ हो ॥ पंथी पंथ बूझ नहिं लीन्हा, मूढहिं मूढ गंवारा हो ॥ घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु, कैसेके लगबेहु तीरा हो ॥ जतइनके धन हेरिन ललचिन, कोदइतके मन दौरा हो ॥ दुइ चकरी जनि दरर पसारहु, तब पैहौ ठीक ठौरा हो ॥ प्रेम बाण एक सतगुरु दीन्हो, गाढों तीर कमाना हो ॥ दास कबीर कीन्ह यह कहरा, महरा माहिं समाना हो ॥ २ ॥

कहरा ३.

रामनामको सेवहु बीरा, दूरि नहिं दुरि आसा हो ॥ और देवका सेवहु बौरै, ई सब झूठी आसा हो ॥ ऊपर ऊजरका भौ बौरै, भीतर अजहुं कारो हो ॥ तनके बूद्ध का भौ बौरै, मनुवा अजहुं बारो हो ॥ मुखते दांत गये का बौरै, भीतर दांत लोहेके हो ॥ फिर फिर चना चबाव विषयके, काम कोध मद लोभैके हो ॥ तनकी सकल वासना घटि गयऊ, मनहिं दिलासा दूना हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, सकल सयानपऊना हो ॥ ३ ॥

(५१६)

कबीरपंथी-

कहरा ४.

ओढन मोर राम नाम, मैं रामहिका बनजारा हो ॥ रामं नामका करहुँ बनिजिया, हरि मोर हटवारा हो ॥ सहस नामका करो पसारा, दिन दिन होत सवाई हो ॥ जाके देव वेद पछ राखा, ताके होत हटवाई हो ॥ कानि तराजू सेर तिन पउवा, तुकिन ढोल बजाई हो ॥ सेर पसेरी पूरा कैले, पासंग कतहुँ न जाई हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, जोर चला जहंढाई हो ॥ ४ ॥

कहरा ५.

राम नाम भजु राम नाम भजु, चेति देखु मनमांहीं हो ॥ लच्छ करोरि जोरि धन गाडे, चलत डोलावत बांही हो दादा बाबा और प्रपाजा, जिनके यह भुईं भाँडे हो ॥ औंघर भये हियहुकी फूटी, तिन्ह काहे सब छाँडे हो ॥ ई संसार असारको घंथा, अन्तकाल कोइ नाही हो ॥ उपजत बिनसत बार न लागे, ज्यों बादरकी छाई हो ॥ नात गोट कुल कुटुंब सब, इन्हकर कौन बडाई हो ॥ कहहिं कवीर एक राम भजे बिनु, बूड़ी सब चतुराई हो ॥ ५ ॥

कहरा ६.

राम नाम बिनु राम नाम बिनु, मिथ्या जन्म गंवाई हो ॥ सेमर सेइ सुवा ज्यों जहँडे, ऊन परे पछिताई हो ॥ जैसे मदपी गांठी अर्थ दे, घरहुकी अकिल गमाई हो ॥ स्वादे उदर भरे धौं कैसे, औसै प्यास न जाई हो ॥ दबँहीन जैसे पुरुषारथ, मनही मांहि तवाई हो ॥ गांठि रतन मरम नहिं जाने, पारख लीन्हा छोरी हो ॥ कहहिं कवीर यह औसर बीते, रतन न मिले बहोरी हो ॥ ६ ॥

शब्दावली

(५२७)

कहरा ७.

रहहु संभारे राम विचारे, कहता हौं जे पुकारे हो ॥ मूंड मुंडाय फूलिके बैठे, सुद्रा पहिर मंजूसा हो ॥ तेहि ऊपर कछु छार लपेटे, भितर भितर घर मूसा हो ॥ गांव बसतु है गरब भारती, बाम काम हंकारा हो ॥ मोहन जहां तहां ले जहैं, नहिं पत रहल तुम्हारा हो ॥ मांझ मंझरिया बसे सो जाने, जन होइ है सो थोरा हो ॥ निर्भय भये तहां गुरुकी नगरिया, सुख सोवैं दास कवीरा हो ॥ ७ ॥

कहरा ८.

क्षेम कुसल औ सही सलामत, कहहु कौनको दीन्हा हो ॥ आवत जात दोऊ विधि लूटे, सर्वस हरि लीन्हा हो ॥ सुर नर सुनि जति पीर औलिया, मीरा पैदा कीन्हा हो ॥ कहाँ लों गनो अनंत कोटि लों, सकल पयाना कीन्हा हो ॥ पानी पवन अकाश जायँगे, चंद्र जायँगे सूरा हो ॥ ये भी जायँगे वो भी जायँगे, परत न काहुके पूरा हो ॥ कुशल कहत कहत जग बिनसे, कुशल कालकी फांसी हो ॥ कहैं कवीर सारि दुनिया बिनसे, रहै राम अविनासी हो ॥ ८ ॥

कहरा ९ .

ऐसनि देह निरालप बौरै, सुवले छुवे नहिं कोई हो ॥ डंड- वाकी डोरिया तोरिया तोरि लराइनि, जो कोटिन धन होई हो ॥ ऊर्ध निस्वासा उपजि तरासा, कहराइनि परिवारा हो ॥ जो कोई आवे बेगि चलावे, पल एक रहन न पाई हो ॥ चन्दन चीर चतुर सब लेपै, गरे गजमुकताकी हारा हो ॥ चौंसठ गीध मुये तन लूटै, जंबुकन उदर बिदारा हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, ज्ञानहीन मतिहीना हो ॥ इक इक दिना याहि गति सबकी, कहा राव कह दीना हो ॥ ९ ॥

(५१८)

कवीरपंथी—

कहरा १०.

हौं सबहिनमें हौना हो, मोहि बिलग बिलग बिलगाई हो ॥ ओढन मोरा एक पिछौरा, लोग बोलै एकताई हो ॥ एक निरं- तर अन्तर नाही, ज्यों ससि घटजल झाई हो ॥ एक समान कोई समुन्नत नाही, जाते जरा मरण भ्रम जाई हो ॥ रैन दिवस ये तहवाँ नाही, नारि पुरुष समताई हो ॥ हौं मैं बालक बूढो नाहीं, न मोरे चिलकाई हो ॥ त्रिविध रहौं संभनिमा बरतौं, नाम मोर रसुराई हो ॥ पठये न जाऊँ आने नहिं आवौं, सहज रहौं बुनियाई हो ॥ जोलहा तान बान नहिं जाने, फाटि बिने दश ठाई हो ॥ गुरु परताप जिन्हें जस भाख्यो, जन बिरलै सों पाई हो ॥ अनंत कोटि मन हीरा बेधा, फिटको मोल न पाई हो ॥ सुर नर मुनि जाके खोज परे हैं, कछु कछु कविरन पाई हो ॥ १० ॥

कहरा ११.

ननदीगेतैं विषम सोहागिनि, तैं निदले संसारा गे ॥ आवत देखी एक संग सूती, तैं औ खसम हमारा गे ॥ मोरे बापके दुइ मेहररूवा, मैं अरु मोर जेठानी गे ॥ जब हम रहलि रसिकके जगमें, तबहि बात जग जानी गे ॥ माइ मोरि सुवलि पिताके संगे, सरा रचि सुवल संघाती गे ॥ आपुहि सुवलि और ले सुवली, लोग कुटुब संग साथी गे ॥ जौं लौं स्वास रहे घट भीतर, तौं लौं कुशल परिहै गे ॥ कहहिं कवीर जब थास निकरि गौं, मंदिर अनल जरिहै गे ॥ ११ ॥

कहरा १२.

ई माया रघुनाथकी बौरी, खेलन चली अहेरा हो ॥ चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ न्यारा हो ॥ मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो ॥ जंगलमेके जंगम मारे, माया किनहुं न भोगी हो ॥ वेद पढंते वेदुवा मारे, पूजा करंते

शब्दावली

(५१९)

स्वामी हो ॥ अर्थ विचारत पंडित मारे, बांधेउ सकल लगामी हो ॥ सिंगीत्रुडपि वन भीतर मारे, शिर ब्रह्माका, फोरी हो ॥ नाथ मछंदर चले पीठिदे, सिंचलहुमैं, बोरी हो ॥ साकटक घर कर्ता धरता, हरिभक्ताते चेरी हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, ज्यों आवे त्यों फेरी हो ॥ १२ ॥

इति कहरा बीजकका सम्पूर्ण ।

अथ चाचरि प्रारंभः

चाचरि पहिला १ ॥

खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार । कटि केहरि गज गामिनी, संशय कियो सिंगार ॥१॥ रचे रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरे आय । शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा बरनि न जाय ॥२॥ चन्द्र बदनी मृगलोचनी, बिडुक दियो उघालि । यती सती सब मोहिया, गज गति वाकी चालि ॥ ३ ॥ नारदके सुख मोडिके, लीन्हों बदन छिपाय । गरब गहेली गरबते, उलटि चली सुसकाय ॥४॥ शिव अरु ब्रह्मा दौरिके, दोनों पकड़े धाय । फगुआ लीन छिनायके, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि बाजा बजे, सरवन सुनत भो चाव । खेलनिहारी खेलि है, जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥ ज्ञानढाल आगे दियो, टारे टरत न पांव । खेलनिहारी खेलि है, बहुरि न ऐसो दाव ॥ ७ ॥ सुर नर मुनि भू देवता, गोरख दत्ता व्यास । सनक सनन्दन हारिया, औरक केतिक आस ॥८॥ छिलकत थोथे प्रेम सो, धरि पिचकारी गात । करि लीनो बस आपने, फिरि फिरि चितवत जात ॥ ९ ॥ ज्ञान गाडिले रोपिया, तिरगुन लिये है हाथ । शिवसन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥ १० ॥ एक ओर सुर नर मुनि खड़े, एक अकेली आप । दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लिय

(५२०)

कवीरपंथी—

एकै छाप ॥ ११ ॥ जेते थे तेते लियो, घुंघट माँहिं समाय । कज्जल वाके रेख है, अदृग्ग न कोई जाय ॥ १२ ॥ इन्द्र कृष्ण द्वारे खडे, लोचन निज ललचाय । कहै कवीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥ १३ ॥

चाचरि दूसरी २ ॥

जारो जगको नेहरा, मन बौरा हो । जाँमे सोग संताप समुझ मन बौरा हो ॥ १ ॥ तन धनसों क्या गरब, समुझ मन बौरा- हो ॥ भसम किरमीको साज, मन बौरा हो ॥ २ ॥ विना नेव- का देवघरा, मन बौरा हो ॥ विन कहगिलकै ईट, समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥ काल बूतकी हस्तिनी, मन बौरा हो ॥ चित्र रच्यो जगदीस, समुझ मन बौरा हो ॥ ४ ॥ काम अंध गज बस परै, मन बौरा हो ॥ अंकुस सहिया सीस, समुझ मन बौरा हो ॥५॥ मर्कट मूठी स्वादकी, मन बौरा हो । लीन्हो भुजा पसारि समुझ मन बौरा हो ॥६॥ छूटनकी संशय परी, मन बौरा हो ॥ घर घर खायो डांग, समुझ मन बौरा हो ॥ ७ ॥ ऊंच नीच जानै नहीं, मन बौरा हो ॥ घर घर नाचेउ द्वार, समुझ मन बौरा हो ॥ ८ ॥ ज्यों सुवना नलनी गह्यो, मन बौरा हो । ऐसो भरम विचार, समुझ मन बौरा हो ॥ ९ ॥ पढे गुनेका कीजिय, मन बौरा हो । अन्त बिलैया खाय, समुझ मन बौरा हो ॥१०॥ सूने घरका पाहुना, मन बौरा हो । ज्यों आवै त्यों जाय, समुझ मन बौरा हो ॥ ११ ॥ नहानेको तीरथ घना, मन बौरा हो । पूजनको बहु देव, समुझ मन बौरा हो ॥ १२ ॥ बिनु पानी नल बूडिया, मन बौरा हो । टेकेउ राम जहाज, समुझ मन बौरा हो ॥१३॥ कहहि कवीर जग भरमिया, मन बौरा हो । छोड़ हरिको सेव, समुझ मन बौरा हो ॥ १४ ॥

इति चाचरि समाप्तम् ।

शब्दावली

(५२१)

अथ वेलि प्रारंभः ।

प्रथम वेलि ।

हंसा सरवर शरिर हो रमैया राम । जागत चोर घर मूसल हो रमैया राम ॥ १ ॥ जो जागे सो भागे हो रमैया राम । सोवत गैल वियोग हो रमैया राम ॥ २ ॥ आज बसेरा नियरे हो रमैया राम । काल्ह बसेरा हरि हो रमैया राम ॥ ३ ॥ परेहु बिराने देश हो रमैया राम । नैन मरेंगे हूँठ हो रमैया राम ॥ ४ ॥ त्रास मथन दधि मथन कियो हो रमैया राम । भवन मध्यो भर पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥ हंसा पाहन मैल हो रमैया राम । बेधिन पद निर्वाण हो रमैया राम ॥ ६ ॥ तुम हंसा मत माणिक हो रमैया राम । हटल न मानेहु मोर हो रमैया राम ॥ ७ ॥ जसरे कियो तस पायो हो रमैया राम । हमर दोष जनि देहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥ अगम काटि गम कीन्हो हो रमैया राम । सहज कियो व्योपार हो रमैया राम ॥ ९ ॥ राम नाम धन बानि- जहु हो रमैया राम । लादहु वस्तु अमोल हो रमैया राम ॥ १० ॥ पांच लदनवा लादि चले हो रमैया राम । नौ बहिया दश गौन हो रमैया राम ॥ ११ ॥ पांच लदनुआ खांगि परे हो रमैया राम । खाखरि डारिन खोर हो रमैया राम ॥ १२ ॥ शिर धुनि हंसा उड़ि चले हो रमैया राम । सरवर मीत जोहरि हो रमैया राम ॥ १३ ॥ आगि लगी सरवरमें हो रमैया राम । सरवर जरि भौ छार हो रमैया राम ॥ १४ ॥ कहैं कवीर सुनु संत हो रमैया राम । परखि लेहु खर खोट हो रमैया राम ॥ १५ ॥

वेलि दूसरी २ ॥

भल सुस्मृति जहँडायहु हो रमैया राम । धोखा कियो विस- वास हो रमैया राम ॥ ११ ॥ सोतो है बंसी कसि हो रमैया राम ।

(५२२)

कवीरपंथी—

सिरके लियो विसवास हो रमैया राम ॥२॥ ई तो है वेद साक्ष हो रमैया राम । गुरु दीन्हो मोहिं थापि हो रमैया राम ॥ ३ ॥ गोबर कोट उठायहु हो रमैया राम । परि हरि जैहो खेत हो रमैया राम ॥ ४ ॥ बुद्धिवल तहाँ न पड़ुंचै हो रमैया राम । खोज कहांति होय हो रमैया राम ॥५॥ सुनिमन धीरज भैल हो रमैया राम । मन बढि रहल लजाय हो रमैया राम ॥६॥ फिरि पाछे जनि हेरो हो रमैया राम । काल बूत सब आय हो रमैया राम ॥ ७ ॥ कह कवीर सुनु संत हो रमैया राम । मति दिगहि फैलाहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥

अथ विरहुली प्रारम्भः ।

आदि अन्त नहिं होत विरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ विर- हुली ॥ १ ॥ निसि बासर नहिं होत विरहुली । पानी पवन न होत विरहुली ॥ २ ॥ ब्रह्माहि सनकादि विरहुली । कथि गये जोग अपार विरहुली ॥ ३ ॥ मास अषाढहि शीत विरहुली । बोइन सातौ बीज विरहुली ॥४॥ नित गाड़ै नित सिंचै विरहुली । नित नव पल्लव पेड़ विरहुली ॥ ५ ॥ छिछिल विरहुली छिछिल विरहुली । छिछिल रहल तिहुँलोक विरहुली ॥ ६ ॥ फुल एक भल फुलल विरहुली । फूलि रहल संसार विरहुली ॥ ७ ॥ ते फुल बन्दै भगत विरहुली । बांधिके राउर जाय विरहुली ॥८॥ सो फुल लोढहि संत विरहुली । डसि गौ बैतल सांप विरहुली ॥ ९ ॥ विषहर मंत्र न मान विरहुली । गाडुर बोले और विर- हुली ॥ १० ॥ विषकी कयारी बोयो विरहुली । अब लोरत का पछिताय विरहुली ॥ ११ ॥ जनम जनम अवतरेउ विरहुली । फल यक कनइल डार विरहुली ॥ १२ ॥ कह कवीर सचु पाय विरहुली । जो फल चाखहु मोर विरहुली ॥ १३ ॥

शब्दावली

(५२३)

अथ हिंडोला प्रारंभः ।

हिंडोला पहिला १ ॥

भर्म हिंडोला झूले सब जग आय ॥ टेक ॥

जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ, मेरू माया नाय । तहँ कर्म पटुकी बैठिकै, को को न झूले आय ॥ १ ॥ लोभ मरूआ विषय भवरा, काम कीला ठानि । शुभ अशुभ बनाय डांडी, गह्यो दूनौ पानि ॥ २ ॥ झूले सो गन गन्धर्व सुनि नर, झूले सुरगन इन्द्र । झूलत सो नारद सारदा, झूलत व्यास फनीन्द्र ॥ ३ ॥ झूलत विरंचि महेस-सुनिहो झूलत सूरज इन्द्र । आप निर्गुन सगुन होयके, झूलिया गोविन्द ॥ ४ ॥ छौ चार चौदह सात इकइस, तीन लोक बनाय चौखानि बानी खोजि देखौ, थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥ खण्डो ब्रह्मखण्ड खोजि षट् दर्शन, ये छूटे नाहिं । साधु संग बिचारि देखौ, जीव निसतरि जाहिं ॥ ६ ॥ ससि सूर निस दिन संधि, औ तहँ तत्त्व पांचौ नाहिं । काल अकालौ परलय नहीं, तहँ संत बिरले जाहिं ॥ ७ ॥ तहँके विछुरे बहु कल्प बीते, परे भूमि भुलाय । साधु संगति खोजि देखौ, बहुरि उलटि समाय ॥ ८ ॥ तेहि झूलवेको भय नहीं, जो होय संत सुजान । कहहिं कवीर सत सुकृत मिलै तो, फिरि न झूले आन ॥ ९ ॥

हिंडोला दूसरा २ ॥

बहु विधि चित्र बनाइके, हरि रच्यो है क्रीडा रास । जाहि न इच्छा झूलवेको, अस बुद्धि केहि पास ॥ १ ॥ झूलत २ बहु कल्प बीते, मन न छोड़ै आस । रच्यो रहस हिंडोलना, निसि चारिउ जुग चौमास ॥ २ ॥ कबहुक ऊंचे नीचे कबहुंक, सरग भूलौ जाय । अति भरमित भरम हिंडोलना, नेकु नहीं ठहराय ॥ ३ ॥ डरपत हो यहि झूलवेको, राखु जादव राय । कहै कवीर गोपाल विनती, शरन हो तुम पाय ॥ ४ ॥